Wednesday, May 23, 2018

अंत

"नयना क्या बात है फिर से सो गई?" नवीन ने सुबह की सैर से वापस आ कर नयना को बिस्तर पर लेटे देख कर पूछा।
"नवीन बदन टूटा सा लग रहा है। उठने की हिम्मत नही हो रही है।" बंद आंखों के साथ नयना ने हौले से कहा।
"ठीक है आराम कर लो। डॉक्टर दस बजे मिलेगा। दवा लोगी ठीक हो जाओगी।" कह कर नवीन नहाने गुसलखाने चला गया।

दस बजे नवीन नयना को डॉक्टर के क्लिनिक ले लेगा। डॉक्टर ने जांच करके दवा लिख दी। दो दिन बाद नयना की तबियत में कुछ सुधार हुआ और नयना घर के कामों में व्यस्त हो गई।

अभी दो महीने पहले नवीन सेवानिवृत हुआ। उम्र साठ वर्ष औऱ पत्नी नयना अब अकेले ही जीवन व्यतीत कर रहे हैं। दोनों लड़कियों का विवाह हो गया है। वे अपने परिवार के साथ प्रसन्नतापूर्वक रह रही हैं।

कुछ दिन बाद नयना की तबियत फिर से सुस्त रहने लगी। डॉक्टर को दिखाया। डॉक्टर ने लगभग सभी टेस्ट करवाए। नतीजा कुछ नही निकला। टेस्ट सामान्य रहे फिर भी तबियत में सुधार नही हुआ।
"नयना बाहर चलें। मन बहल जाएगा। तबियत भी सुधर जाएगी।"
"तबियत ठीक है नही। मैंने कहीं नही जाना। अपने घर में सही बैठे है। बाहर तबियत बिगड़ गई तब मुश्किल होगी। यहां तो डॉक्टर पास में है। मैंने कहीं नही जाना।"
"डॉक्टर से पूछ लेते हैं। दवाइयां साथ होंगी। घबराने की कोई आवश्यकता नही है।"
डॉक्टर ने भी पहाड़ पर कुछ दिन व्यतीत करने की सलाह दी। पहाड़ों में मौसम आजकल सही है। अधिक ठंड भी नही आरम्भ हुई है। अक्टूबर के महीने में आपको स्वास्थ्य लाभ होगा। बाहर जाने से मन बहलता है और स्वास्थ्य लाभ भी जरूर होगा।

नवीन और नयना अपनी पसंद के हिल स्टेशन मसूरी के लिए निकले। अक्टूबर के महीने में दिन में गुलाबी ठंड और रात को मध्यम ठंड थी। दिन में बादल आते औऱ खिड़कियों से अंदर आकर भाप में परिवर्तित हो जाते। कैमल बैक रोड पर घूमते हुए दोपहर के समय एक बेंच पर नवीन और नयना बैठ गए। नवीन के कंधे पर सर टिका कर सामने पहाड़ पर पड़ती धूप को देखते हुए बोली।
"नवीन कितने वर्षों बाद घर से बाहर निकले है?"
"नयना दस वर्ष हो गए होंगे शायद?"
"हां बच्चों के विवाह के कारण इतने व्यस्त हो गए थे कि कहीं बाहर की सोच ही नही सके। आज अच्छा लग रहा है पुरानी जगह पर घूम कर यादों को ताजा करते हुए। नवीन कैमल बैक रोड पर हाथ मे हाथ डाल कर घंटो घूमते थे फिर थक कर बेंच पर बैठ जाते थे। प्राकृतिक सौंदर्य को निहारते थे।"
"कैमल बैक रोड अब भी पहले जैसा है। कुछ नही बदला। वैसा ही शांत वातावरण।"
"मॉल रोड पर दुकाने अधिक हो गई हैं। पहले मॉल रोड से दून घाटी नजर आती थी और रात में देहरादून की झिलमिलाती बत्तियां नजर आती थी। बादलों में छुप जाती थी। बादल बत्तियों को अपने अंदर छुपा लेते थे और फिर जाते हुए बत्तियों को हमारे हवाले कर देते थे पर अब मॉल रोड पर खाली स्थान ही नजर आता कि देहरादून की बत्तियां देखने बेंच पर बैठें।"
थोड़ी देर तक नवीन और नयना पुरानी यादें ताजा करते रहे। धूप ढलने के बाद ठंडक बढ़ी और दोनों ने होटल की ओर प्रस्थान किया।

नवीन और नयना एक सप्ताह मसूरी में रहे और सुबह और फिर दोपहर के समय घूमते। घर की दिनचर्या से दूर दोनों खुशनुमा माहौल में हाथ में हाथ डाले घूमते। मसूरी से देहरादून और ऋषिकेश में दो-दो दिन रुक कर हरिद्वार आ गए।

हर की पौड़ी पर नयना अपने पैरों को गंगाजी में डाल कर सामने चंडीदेवी की पर्वत श्रृंखला को देखती हुई नवीन से बोली "नवीन गंगाजी में समा जाने को दिल कह रहा है।"
नवीन ने नयना का मुख को अपने दोनों हाथों में लिया और नयना की आंखों में झांकते हुए "क्या कह रही है तू?"
"एक दिन तो गंगाजी में प्रवाहित करोगे मुझे। आज मैं स्वयं गंगाजी में समा जाती हूं।"
"पागल हो गई है तू, क्या बक रही है?"
"नवीन तुम मानो या नही मानो, शरीर ने संकेत देने आरम्भ कर दिए है। तबियत भी ठीक नही रहती है। मुझे अपना अंत दिखाई देने लगा है।"
"नयना दुनिया भर के टेस्ट करवा लिए। किसी में कुछ भी नही निकला। कोई बीमारी नही है। बेकार की मत सोच। दवाई चल रही है। तुम चिंता मत करो। सब ठीक है।"
"तुम कहते हो तो ठीक मान लेती हूं परन्तु तुम मेरी एक बात सुनो कि कुछ तो अवश्य है चाहे टेस्ट भी उनको पकड़ने में सफल न रहे हों।"
"तू इस तरफ नही सोचेगी। अपनी खोपड़ी में से उल्टे विचार बाहर कर। सकारात्मक सोच नयना।"
"चलो तुम्हारी बात मान ली। अब गंगा स्नान तो कर लो।"
"ठंड है। पानी भी ठंडा है, मैं मुंह धो लेता हूं।"
"बिल्कुल नही नहाना तो पड़ेगा। अक्टूबर का महीना है और धूप भी अच्छी निकली हुई है। अपनी जवानी याद करो और डुबकी लगाओ। ठंड नही लगेगी।"
"मेरा हाथ पकड़ कर नहाना।"
"तुम्हारी बात मान रही हूं। आज गंगाजी में नही समाउंगी। चलो एक साथ डुबकी लगाते हैं।"
नवीन ने तीन-चार डुबकी लगाई और घाट की सीढ़ियों पर बैठ गया। नयना चार-पांच डुबकी लगाती फिर घाट की सीढ़ियों पर बैठती। दो-चार मिनट के बाद फिर डुबकी लगती। नवीन नयना पर नजर रखे हुए था और नयना की मनोदशा पर विचार कर रहा था कि आखिर क्यों नयना अपने अंतिम समय की बात कर रही है जब डॉक्टरों ने तमाम टेस्ट कर के देख लिया कि कोई बीमारी नही है।
"तुम डरपोक हो, दो डुबकी लगा कर किनारे बैठ गए। कितना मजा आया नहाने में। तृप्त हो गई आज गंगा स्नान करके। वर्षो बाद गंगा स्नान हुआ। चलो नाश्ता करके भवन चलते है फिर सारा दिन आराम।"
"एक तो नहाने के लिए कपड़े नही लाये। पहने हुए कपड़ो के साथ नहा लिए। मेरे कपड़े तो धूप में सूख गए हैं। पहले दस मिनट धूप में बैठ कपड़े सुखा। बदन से चिपके हुए गीले कपड़े अच्छे नही लगते।"
पांच मिनट में गीले कपड़े सूख गए। ढाबे में नाश्ता करने के पश्चात भवन में आराम किया।
नवीन नयना की मनोदशा पर विचार करने लगा।
"पंखे की ओर टकटकी लगाए क्या सोच रहे हो?"
"जो तुम हर की पौड़ी में कह रही थी।"
"दिमाग पर बोझ मत डालो। एक दिन अंत आना है, जो परमसत्य है। खुशी से उसको स्वीकार करते है हो सकता है अधिक तकलीफ न हो। आराम से चले जाएं।"
"जाना तो सबसे एक दिन है लेकिन तुम इस विषय पर अधिक सोच रही हो।"
"नवीन हम घूमने आए हैं। अच्छा लग रहा है। मन दूसरी तरफ लग जाता है और हम कुछ पलों के लिए अपने दुख भूल जाते है। घर पहुंच कर फिर उन्ही चक्करों में बंध कर जीते हैं। मैं तुम्हे यहां प्रसन्न दिख रही हूं लेकिन अंदर-अंदर मेरी तबियत ठीक नही है। लगता है कि कुछ हो जाएगा।"
"ऐसा मत सोच मैं तेरे साथ हूं।"
"ठीक है अब तुम भी मत सोचो और कल वापिस दिल्ली चलो।"

दिल्ली आने के बाद नयना की तबियत बिगड़ गई। डॉक्टरों और अस्पतालों के चक्कर कटने लगे। खामोश नयना के होठों पर मंद मुस्कान रहती। एक दिन डॉक्टरों ने नयना को कैंसर घोषित कर दिया।
"पिछले एक वर्ष से चेकअप हो रहा है। कमाल है कि आज कैंसर का पता चला?" नवीन ने आश्चर्य से पूछा।
"नवीन जी कई बार कैंसर का पता देर से चलता है और वह बढ़ चुका होता है। ऐसा कुछ नयना की बीमारी पर हुआ।" डॉक्टर ने स्पष्टीकरण दिया।
"डॉक्टर साहब हमने कोई टेस्ट नही छोड़ा। आप फ़ाइल की मोटाई देखिए। एक साल में टेस्ट ही टेस्ट। मुझे यकीन नही होता कि कैंसर अधिक बढ़ गया है?" नवीन आश्चर्य से शून्य में ताकता हुआ डॉक्टर को देखता रह गया।
डॉक्टर नवीन की मनोदशा समझ गया और धीरज से नवीन और नयना को इलाज की जानकारी दी।

नयना धीरज से नवीन को देखती रही और डॉक्टर की बात सुनती रही। उसे पहले से अहसास हो चुका था और ईश्वर की मर्जी समझ कर शांत रही। नवीन की आंखों में आंसू देख नयना ने डॉक्टर से प्रश्न पूछा। "डॉक्टर साहब इलाज कब से शुरू करना है?"
"आप निर्णय लीजिए। हम तुरंत इलाज आरम्भ कर देंगे।"
"ठीक है डॉक्टर साहब हम दो चार दिन में निर्णय करके आपसे मिलते हैं।"
घर आकर नयना ने नवीन से कहा "मुझे किसी गंभीर बीमारी का अहसास हो गया था क्योंकि जब तबियत ठीक नही थी और टेस्ट भी बीमारी को पकड़ने में असफल रहे। अब अंत कभी भी हो सकता है। हमें यह तथ्य स्वीकार कर लेना चाहिए।"
"नयना चमत्कार भी होते हैं। इलाज करवाना है। तुम ठीक हो जाओगी।"
"ठीक है। जब कहो इलाज शुरू करवाते हैं। नवीन कल से ही करते हैं।"
"हां नयना।"

अगले दिन से नयना का इलाज आरम्भ हो गया। बच्चों को सूचना दे दी। बच्चे और नजदीकी रिश्तेदार सभी नयना के इर्दगिर्द एकत्रित हो गए। थोड़े दिन बाद सभी अपने काम, नौकरी और व्यवसाय का वास्ता देते हुए अपने घरों को प्रस्थान हो गए। बच्चे भी वापिस अपने घर चले गए। अब नवीन और नयना अकेले रह गए। कीमोथेरिपी के बीच अपनी और नवीन की जरूरतों को पूरा करती नयना कभी रो देती और कभी हंसती। नवीन नयना को सांत्वना देता कि वह बीमारी से उभर जाएगी लेकिन नयना उभर न सकी। तीसरी कीमोथेरपी के पश्चात नयना को तेज ज्वर हुआ। ज्वर एक सौ पांच से नीचे नही हुआ। अस्पताल के बिस्तर पर लेटी हुई नयना ने अर्ध चेतना में नवीन को पुकारा। गले से बहुत धीमी आवाज निकली। नवीन ने नयना के माथे पर हाथ रखा। ज्वर से नयना का तन झुलझ रहा था।
"नवीन जन्म भी अस्पताल में हुआ और आज मृत्यु भी अस्पताल में। देखो विधाता के नियम।"
"नयना तुम धीरज रखी।" कह कर नवीन ने नर्स बुलाने के लिए घंटी बजाई।
"नवीन डॉक्टर अब कुछ नही कर सकते। मुझे अपनी बाहों का सहारा दो। अंतिम समय तुम्हारी बाहों में रहना चाहती हूं।"
नवीन ने नयना को बाहों में लिया। नयना ने नवीन को देखा और आंखें बंद कर ली। नर्स आई और नयना की हालत देख डॉक्टर को बुलाया। डॉक्टर ने निरीक्षण के पश्चात नयना का अंत घोषित कर दिया।
हरिद्वार में गंगाजी में नयना के फूल विसर्जित करते समय नवीन की आंखों के सामने हर की पौड़ी पर स्नान करती नयना की बात कानों में गूंजने लगी।
"नवीन गंगाजी में समा जाने को दिल कह रहा है।"

Thursday, May 17, 2018

कंजूस की माफी

कंपनी के चार दिन के व्यस्त टूर पर विनोद और विपुल को कान खुजाने की फुरसत नही मिली। सुबह नौ बजे से रात दस बजे तक कमर तोड़ काम करने के पश्चात आज टूर के अंतिम दिन साढ़े बारह बजे दोनों को काम से छुट्टी मिली। रात आठ बजे की फ्लाइट थी। दोनों ने ऑफिस छोड़ कर रेस्टॉरेंट में खाना खाने के बाद थोड़ा बाजार घूमने के लिए एक बजे ऑफिस छोड़ा।

"विनोद इस बार तो काम के बोझ के कारण बदन दुख गया। ऑफिस के कैफेटेरिया का खाना भी एकदम बेकार होता है। गुणवक्ता पर कोई ध्यान नही देता है।" विपुल ने दोनों हाथों को सीधा करते हुए गर्दन का व्यायाम करते हुए विनोद को कहा।
"भाई विपुल तुम ठीक कह रहे हो। काम करने से पीछे नही हटते हम। कम से कम खाना तो सही ढंग का हो। मिलावटी पेट्रोल से गाड़ी चलवा कर गाड़ी खराब करवा रहे हैं कंपनी वाले।"
"कई बार शिकायत कर चुके हैं लेकिन सुनवाई नही है। अब दिल्ली जाकर दो दिन छुट्टी लेकर आराम करूंगा।"
"मैं भी आराम करूंगा।"
"खाना बढ़िया हो तब काम करने की रफ्तार दुगनी तिगनी हो जाती है। चल अब शाम तक छुट्टी है। किसी अच्छे बढ़िया रेस्टॉरेंट में चल कर खाना खाते हैं।"

वातानुकूलित रेस्टॉरेंट में विनोद और विपुल ने मन पसंद खाना खाया। कुछ देर तक बातें करने के पश्चात दोनों रेस्टॉरेंट से बाहर आए।

"विनोद अभी ढाई बजे हैं। फ्लाइट रात आठ बजे की है। साढ़े छ तक हवाई अड्डे पहुंचना है। मैं थोड़ा बाजार घूमता हूँ। बच्चों और श्रीमती जी के लिए कुछ खरीदारी करता हूँ।" विपुल ने घड़ी देखते हुए विनोद से पूछा।
"यार खाम खा बिना बात के जेब ढीली हो जाएगी। मैं नही जाता। चल एयरपोर्ट चल कर बैठते है।"
"यार पक्का कंजूस है। कभी-कभी ऐसे मौके मिलते है।"
"यार घर में सब कुछ है। फोकट में वही चीजों की खरीदारी में कोई फायदा नही। मेरी नजर में फिजूल खर्ची है। मैं नही जाऊंगा। नजदीक मॉल है यहां आराम से बैठ कर आराम करूँगा।"
"ठीक है विनोद तू मॉल जा, मैं बाजार घूम कर आता हूँ।"
"कहां जाएगा विपुल?"
"कोलकता आएं हैं तो न्यू मार्केट जाऊंगा। वहां सही दाम में खरीदारी होगी।"

कुछ सोच कर विनोद भी विपुल के संग न्यू मार्केट चल पड़ा। विपुल ने जम कर खरीदारी की। पत्नी के लिए बंगाली साड़ी, कट वर्क के पेटीकोट, नाइटी, सलवार सूट, बच्चों के कपड़े, खिलौने और घर के लिए कट वर्क की बेड शीट, तकिये के गिलाफ, पर्दे के कपड़े और अपने लिए बंगाली धोती। इतने अधिक समान के लिए विपुल को एक सूट केस भी खरीदना पड़ा।

विशाल न्यू मार्केट घूमने के बाद बाहर निकले। मार्किट के बाहर हाथ से खींचने वाले रिक्शे खड़े थे।
"यार विनोद कोलकता में अभी भी हाथ से खींचने वाले रिक्शे चलते हैं। कमाल है। इनको बंद करना चाहिए। यह अमानवीय है विनोद। सरकार को इन्हें साईकल रिक्शे देने चाहिए। वैसे तो आजकल ई रिक्शे का जमाना है। दिल्ली में तो अब ई रिक्शे चलते हैं। कोलकता में अभी भी हाथ से खींचने वाले रिक्शे चलते हैं।"
"विपुल इनके साथ फोटो खींचते हैं।"
"विनोद मुझे हाथ से खींचने वाले रिक्शे अमानवीय लगते हैं। मैं नही फ़ोटो खिचवाऊंगा।"
"विपुल तू मेरी फोटो खींच।"
"ठीक है।"
विनोद एक रिक्शे में बैठ गया। विपुल ने विनोद की तीन चार फोटो खींची। फोटो खिंचवाने के पश्चात विनोद विपुल के संग जाने लगा तब रिक्शे वाले ने विनोद को आवाज दी। "बाबू पैसे।"
"किस बात के बे?" कंजूस विनोद पैसों की बात सुनकर बिगड़ गया।
रिक्शे वाले ने जवाब दिया "रिक्शे में बैठने के बीस रुपये और फोटो खिंचवाने के पचास रुपये। कुल सत्तर रुपये बनते हैं।"
"सत्तर रुपये सुनकर कंजूस विनोद भड़क गया। "क्या बकवास करता है बंगाली। सत्तर रुपये। दिन दहाड़े शराब पी रखी है क्या?"
"बाबू हमें गाली मत दो। हम मेहनत की खाते हैं।" रिक्शे वाले ने विनोद को पकड़ लिया।
"कौन सी गाली निकाली है बे? कौन सा तेरे रिक्शे पर बैठ कर घूमा हूँ बे?"
"तू तड़ाक मत करो बाबू। चुपचाप सत्तर रुपये दे दो वरना पैसे निकालने हमें भी आते हैं बाबू।"
"नही देता, चल फूट यहां से।" कह कर विनोद ने उसे हल्का सा धक्का दिया। धक्का लगने से रिक्शे वाला गिर पड़ा और उसने शोर मचा दिया। रिक्शे वाले के शोर मचाने से चार-पांच रिक्शे वाले एकत्र हो गए। उन्होंने विनोद को पकड़ लिया। इतने में गिरने वाला रिक्शे वाला उठ कर आया और अपने पैसे मांगे। विनोद को रिक्शे वालों के बीच घिरा देख विपुल बीच बचाव के लिए आया। रिक्शे वालों ने विपुल को झगडे से दूर रहने को कहा।
"बाबू आप दूर रहें। इसको पैसे भी देने पड़ेंगे और माफी भी मांगनी पड़ेगी।"
"पैसे मैं देता हूँ। झगड़ा समाप्त करो। कितने पैसे हैं।" विपुल ने झगड़ा समाप्त करने के इरादे से रिक्शे वालों को कहा।
"बाबू हम आप से पैसे क्यों ले? हम तो पैसे उसी से लेंगे।" रिक्शे वाले भी जिद पर अड़ गए।
इधर कंजूस विनोद जिद पर और उधर रिक्शे वाले जिद पर। झगड़ा देख कर जनता भी मजे लेने लगी और भीड़ एकत्र हो गई।
"फोकट में हमारी फोटो नही खींच सकते बाबू। विदेशी तो फोटो खींचने के डॉलर दे कर जाते हैं। आपसे तो सिर्फ पचास रुपये ही मांग रहे हैं। चुपचाप निकालो सत्तर रुपये। बीस बैठने के और पचास फोटो खिंचवाने के। नही दिए तो पुलिस को बुलाएंगे।"
जनता के बीच खुद को घिरा देख चुपचाप विनोद को सत्तर रुपये देने पड़े।
"माफी भी मांगनी पड़ेगी। रिक्शे वाले के पैर पकड़ कर माफी मांगो।" सभी रिक्शे वालों ने जबरदस्ती विनोद को झुकाया। विनोद को अहसास हुआ कि यदि उसने माफी नही मानी तो रिक्शे वाले उसका गला ही दबा देंगे। आखिर विनोद ने रिक्शे वाले के पैर पकड़ कर नाक रगड़ कर माफी मांगी। विनोद के माफी मांगते मामला शांत हुआ। रिक्शे वालों ने विनोद को छोड़ दिया। जनता की भीड़ ने माफी मांगते विनोद का वीडियो बना लिया।
माफी मांगते भीड़ छट गई।

लुटा पिता विनोद विपुल के संग टैक्सी में बैठ एयरपोर्ट की ओर चल पड़े।
"विनोद तुम्हे रिक्शे वाले से उलझना नही चाहिए था। उसके साथ फोटो खिंचवाई। मात्र सत्तर रुपये के लिए अपनी बेइज्जती करवा ली। तुम्हे तो मालूम है कि बंगाल में यूनियन बाजी बहुत है बात-बात पर हर मिनट लाल झंडा उठा कर सड़क पर मार पीट पर उतर आते हैं। हम परदेशी हैं। बाहर जगह किसी से उलझना नही चाहिए।"

मान मर्यादा, इज्जत अपने हाथों में होती है। लाखों रुपये हम शादी विवाह, मुंडन पर खर्च कर देते हैं लेकिन मात्र सत्तर रुपये की खातिर विनोद ने अपनी अनमोल इज्जत सरे आम बाजार में लुटवा ली। क्या जरूरत थी उसे उलझने की? सत्तर रिक्शे वाले ने मांगे थे, शायद मोल भाव से दस बीस कम कर देता लेकिन झगड़ा नही करना था।

विनोद कुछ नही बोला बस सिर झुका कर आत्मग्लानि संग आत्मचिंतन करने लगा।
चिड़िया तब तक खेत चुग गई थी। रिक्शे वाले से उसकी माफी का वीडियो सोशल मीडिया पर फैल चुका था। उसे लग रहा था कि एयरपोर्ट पर हर निगाह उसे भेद रही है।

Tuesday, May 15, 2018

काली बिल्ली

पर्वत श्रृंखला के बीच मे से सुबह उगता सूर्य मनमोहक लग रहा था। रात की कालिमा को दूर करता सूर्य अपनी पहली किरणों के संग रात की कालिमा को कुछ ही देर में काले से श्याम और फिर नारंगी रंग में परिवर्तित कर दिया। पक्षियों की चहचहाने का मधुर संगीत कानों में मिश्री घोल रहा था।

एकदम शांत वातावरण में पल भर बाद पर्वत श्रृंखला के मध्य से बादलों का एक झुंड मस्त चाल से विचरण करता हुआ राकेश की ओर आया और पलक झपकते राकेश के चेहरे को भिगो गया। शॉल ओढे राकेश के पूरे शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गई। सूर्य बादलों के पीछे हंसता हुआ छुप गया और उस एक बादल का तेजी से पीछा करते हुए बादलों के झुंड के झुंड आ गए। राकेश मंद-मंद चलते हुए कमरे में वापिस आ गया और दरवाजा बंद करके खिड़की का पर्दा हटा दिया।

"कहां से घूम कर आ रहे हो?" अलसाई रीना ने रजाई से मुंह निकालते हुए पूछा।
"शानदार मौसम का लुत्फ उठाया जा रहा था बेगम श्री।"
"ये शायराना बातें बंद करके मुद्दे पर आओ कि सुबह की चाय मिलेगी या नही।"
"बिस्तर छोड़ कर तरो ताजा हो जाओ। चाय आई ही समझो।"
"अलादीन की चिराग से चाय निकलेगी क्या?"

मसूरी के समीप धनोल्टी में राकेश और रीना कुछ दिन आराम करने प्रकृति का लुत्फ लेने इस बार होटल में नही रुके। एकांत में बनी कोठी में ठहरे। दिल्ली के एक धनी व्यापारी ने एक बड़ी कोठी धनोल्टी में बनवाई। साल में दो-चार दिन के लिए भी मुश्किल से आ पाते हैं। कोठी के रख रखाव के लिए कालूराम अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रहते हैं। कोठी की देखभाल के साथ मेहमानों के लिए खाना बनाना और साफ सफाई कालूराम और उसकी पत्नी करते हैं और उनके बच्चे पास के स्कूल में पढ़ते हैं। दो मंजिल कोठी में दस कमरे हैं। दो कमरे अपने लिए रख कर बाकी कमरों को गेस्ट हाउस में परिवर्तित कर दिया। बहुत बड़ा लॉन और तरह तरह के फूलों की क्यारियां कोठी की खूबसूरती में चार चांद लगा रही थी। कोठी के पीछे छोटे लॉन में सब्जियां बो रखी थी।

उम्र के पचासवें साल में राकेश और रीना एलटीए की  छुट्टी पर एक सप्ताह के लिए निकले। पहले तीन दिन धनोल्टी के बाद एक-एक दिन मसूरी, देहरादून और हरिद्वार के लिए रखे। पच्चीस वर्ष में विवाह होने का एक सबसे बड़ा फायदा है कि पचास की उम्र में बच्चे अपने काम धंधे में व्यस्त हो जाते हैं। राकेश और रीना अब तनाव मुक्त जीवन के दौर से गुजर रहे थे।

सात बजे कालूराम बोनचाइना की क्रोकरी में चाय और बिस्कुट ले कर आया। रीना तब तक ब्रश कर चुकी थी।
"तुम जल्दी चाय पिला सकते हो?" रीना ने कालूराम से पूछा क्योंकि उसे सुबह छ बजे चाय पीने की आदत थी।
"आप बता देते तब छ बजे चाय आपको बना देता। कल सुबह छ बजे चाय आपको मिल जाएगी।" कह कर कालूराम चला गया।

एकांत में समय बिताने के लिए नाश्ता करने के पश्चात राकेश और रीना हाथों में हाथ डाल कर दूर पखडंडिओं पर घने पेड़ों की छांव में टहलते हुए गेस्ट हाउस से बहुत दूर निकल गए। थक कर एक पेड़ के नीचे बैठ कर दोनों एक दूसरे को देख कर मुस्कुराये।
"ऐसे क्या देख रहे हो?"
"ऐसे एकांत के पल एक दूसरे के लिए मिले वर्षों बीत गए हैं।"
"शादी के बाद मुश्किल से छ-सात महीने ही मिले होंगे।" रीना ने राकेश की आंखों में आंखें डालते हुए कहा।
"ठीक कहती हो रीना। उसके बाद बच्चों का जन्म, उनकी परवरिश। पच्चीस वर्ष बाद जो समय मिला है वह पहले क्यों नही मिला।"
"क्यों का जवाब शायद किसी के पास नही है जीवन इसी का नाम है। चलो अब मिला जब मिला उसको खुशी से जिया जाए।"

कुछ पल अतीत और वर्तमान की बातें करते रहे। बीच में एक्का-दुक्का गांव का कोई व्यक्ति गुजर जाता। थोड़ी देर बाद स्कूली बच्चों का दल हंसते खिलखिलाते ऊंची आवाज में बातें करते उन दोनों के आगे से गुजरा तब उनको समय का अहसास हुआ कि आज लगभग तीन से अधिक घंटे आपस में एक दूसरे की आंखों में आंखे डालते बीत गए। दोनों उठे और वापिस गेस्ट हाउस की ओर चल दिये।
"रीना समय का पता ही नही चला।"
"मियां जी पर जवानी का जोश चढ़ा हुआ था।" रीना ने कोहनी मारते हुए कहा।
"संभल कर चलिये, पखडण्डी के अंतिम छोर पर चल रहे हैं आप। जरा सा पैर फिसला नही कि नीचे खाई में लुढकते सीधा ऊपर का टिकट कटेगा।"
इतना सुनते ही दोनों के दिल की धड़कन तेज हो गई। वाकई दोनों एक किनारे चल रहे थे और थोड़ा सा संतुलन बिगड़ने पर सीधा खाई में गिरते। बातों-बातों में उन्हें इस बात का अहसास भी नही रहा कि वे छोटी सी पखडण्डी पर खाई की ओर चल रहे हैं। संभल कर दोनों ने सांस ली और पीछे मुड़ कर देखा। पीछे एक युवती जा रही थी। पहनावे से वो गांव की निवासी नही लग रही थी। उसने बिना बाहों का टॉप और आधुनिकता की देन जगह-जगह से फ़टी हुई जीन्स पहनी हुई थी।
"ज़रा रुकिए।" रीना ने उस युवती को आवाज दी। वह युवती पलटी और सिर्फ मुस्कुरा कर बिना जवाब दिए पखडण्डी से कच्चे रास्ते पर उतर कर आंखों से ओझल हो गई।
"रीना आज उस युवती ने बचा लिया वर्ना न मालूम क्या हो जाता?"
"राकेश तुम ठीक कह रहे हो। वह युवती यहां की स्थानीय नही लगती फिर भी चपलता से कच्चे रास्ते उतर गई। पहाड़ के स्थानीय निवासियों की कद काठी और नैन नक्श से वह युवती बिल्कुल जुदा थी।"
"हां रीना। तुमने शुक्रिया कहा लेकिन वह रुकी नही।"
"जो भी हो राकेश वह हमारे लिए फरिश्ता बन कर आई।"

उस युवती पर चर्चा करते हुए दोनों गेस्ट हाउस पहुंचे। खाना खाने के पश्चात थकान के कारण दोनों नींद में डूब गए। शाम के समय एक बार फिर दोनों भ्रमण पर निकले। सड़क के किनारे पेड़ों के झुरमुट के बीच चलते हुए एक बेंच पर बैठ कर सूर्यास्त देखने लगे। धीरे-धीरे सूर्य की लालिमा कम होने लगी। आकाश नारंगी से स्याह होने लगा। पर्वत के पीछे जाता सूर्य अचानक से कहीं गिर सा गया।

सूर्यास्त होते ही राकेश और रीना को एक बिल्ली की मीआउं की आवाज सुनाई दी। दोनों ने दाएं-बाएं देखा। जिस बेंच पर वे दोनों बैठे थे उस से सट कर एक काली बिल्ली बैठी थी। एकदम काले रंग की बिल्ली की भूरी आंखें चमक रही थी। राकेश और रीना के घर में एक भूरी बिल्ली आ कर बैठ जाती थी। वह भगाने से भी नही भागती थी। मीआउं का जवाब मीआउं से देती थी। जब तक उसको कुछ खाने को नही दो तब तक वह हिलती नही थी। उस काली बिल्ली को देख कर राकेश ने उसकी आंखों में देख कर मीआउं कहा। बिल्ली ने भी पलट कर मीआउं कहा।
"राकेश हम मीआउं से अधिक कुछ नही जानते लेकिन जब बिल्ली ने मीआउं का जवाब मीआउं से दिया है तब इसका सीधा मतलब है कि वह हमसे कुछ कहना चाहती है। हमारे घर पर आने वाली भूरी बिल्ली हमसे खाने को कुछ मांगती है। इसको भी कुछ दे दो।"
"रीना बैग में देखो इसके मतलब का कुछ है क्या?"
रीना के बैग में बिस्कुट और चिप्स के पैकेट के साथ जूस के छोटे पैक थे। रीना ने एक बिस्कुट का पैकेट खोल कर बिल्ली के सामने रख दिया। बिल्ली ने दो बिस्कुट खाये।
"राकेश इस बिल्ली ने भी बिस्कुट खा लिए।"
"अच्छी बात है।" राकेश ने अभी इतना ही कहा था कि काली बिल्ली चौकन्नी हो कर खड़ी हो गई और सड़क के एकदम बीच मुस्तैदी से खड़ी हो गई। पहाड़ों पर अधिक चौड़ी सड़क नही होती। वाहन एक-एक करके गुजरते हैं। ओवरटेक की गुंजाइश कम होती है कम से कम सड़क के इस भाग पर बिल्कुल नही थी जहां काली बिल्ली खड़ी थी। तभी वहां एक कार आई और सड़क के बीच खड़ी काली बिल्ली को देख कर वहीं रुक गई। काली बिल्ली के रास्ता काटने को सब अशुभ मानते हैं इसलिए वह कार रुक गई। कार में कौन बैठे हैं यह राकेश और रीना नही देख सके। कार की खिड़की के शीशे बंद थे। काली बिल्ली ने तेज छलांग लगाई और कार के बोनट पर चढ़ गई। काली बिल्ली की इस हरकत से कार में बैठे बच्चों की चीख निकल गई। काली बिल्ली ने कार के शीशे से अंदर झांका और फिर तेजी से छलांग लगा कर बेंच के पास बैठ गई जहां राकेश औऱ रीना बैठे थे। काली बिल्ली ने रास्ता छोड़ दिया था लेकिन कार आगे नही बड़ी। वह सड़क के एक छोर पर खड़ी हो गई। मान्यता के अनुसार काली बिल्ली के रास्ता काटने को वे अशुभ मान रहे थे। रास्ते में कुछ अशुभ न हो जाये इस कारण कार आगे नही बड़ी।

राकेश औऱ रीना दोनों ने बहुत आश्चर्य से यह किस्सा देखा। दोनों के मुख से एक साथ निकला "चलें" और बेंच से खड़े होकर गेस्ट हाउस की ओर चल पड़े।
"काली बिल्ली के कारण यह कार रुक गई औऱ हमारा रास्ता भी उस ओर है। राकेश हमें भी रुक जाना चाहिए। कोई अनहोनी न हो जाए?" रीना ने डरते हुए राकेश को कहा।
"भगवान का नाम लेकर चलते हैं। प्रभु की इच्छा के मुताबिक ही सब होता है। प्रभु रक्षा करेंगे।" राकेश ने रीना का ढाढस बंधाया।

दोनों आगे बड़े। उनके काली बिल्ली के स्थान से आगे बढ़ते ही कार भी आगे बढ़ी और पलक झपकते उनसे आगे निकल गई। सुनसान रास्ते पर राकेश और रीना चल रहे थे औऱ काली बिल्ली उनके पीछे चुपचाप चल रही थी।
"राकेश तुमने काली बिल्ली को देखा था न कैसे वह फुर्ती से छलांग मार कर कार के बोनट पर चढ़ कर कार के अंदर कुछ तलाश रही थी।"
"रीना यह एक अनोखा दृश्य था। रौंगटे खड़े हो गए थे। मालूम नही बिल्ली किसे ढूंढ रही थी और क्या चाहती है।"
बातों-बातों में दोनों गेस्ट हाउस पहुंच गए। काली बिल्ली गेस्ट हाउस के मुंडेर पर चढ़ कर बैठ गई।
तभी रीना की नजर मुंडेर पर बैठी काली बिल्ली पर पड़ी। "राकेश यह वही बिल्ली है न?"
"लगती तो वही है। चल कमरे में बैठते हैं।"

दोनों गेस्ट हाउस के अंदर गए। कालूराम गेस्ट हाउस के गेट पर मिल गया।
"भैया कालूराम मुंडेर पर बैठी बिल्ली को देखो। बहुत अजीब लग रही है।"
मुंडेर पर बैठी काली बिल्ली को देख कर कालूराम ने कहा "साहब जी यह बिल्ली नही भूत है। आप अंदर चलिये।"
"भूत, तुम कैसे कह सकते हो?" राकेश ने कालूराम से पूछा।
"साहब जी यह बिल्ली है इसलिए लड़की का भूत है। लड़कों के भूत बिल्ला बन कर आते हैं।"
"कालूराम हम शहर में रहते हैं सिर्फ भूतों के बारे में सुना है, देखा कभी नही। मेरे मित्र जिनका गांव से संबंध है भूतों पर विश्वास करते हैं। पहाड़ों पर रहने वाले अक्सर बिल्ली में भूत देखते हैं। ये भूत शहरों में क्यों नही आते हैं?"
"वो मुझे नही मालूम कि भूत शहरों में क्यों नही रहते लेकिन भूत होते हैं और यह काली बिल्ली एक लड़की का भूत है। आप सावधान रहें और रात को कमरे से बाहर न निकले।" कालूराम ने उनको चेतावनी देकर सावधान किया।

रात के खाने के पश्चात राकेश और रीना बिस्तर पर लेटे हुए टीवी देख रहे थे।
"राकेश क्या तुम कालूराम की बात को सच समझते हो?" रीना ने टीवी की आवाज को धीमे करते हुए पूछा।
"रीना न तुमने और न मैंने कभी भूत देखा है। हमने सिर्फ किस्से कहानियां सुने है। गांव के लोग अक्सर भूत देखने की बात करते हैं। मैंने जब अपने गांव की पृष्ठभूमि वाले सहपाठियों से पूछा कि क्या उन्होंने भूत देखे हैं तब बहुत विश्वास और दावे के साथ भूत देखने की पुष्ठि करते हैं और जब मैं पूछता हूं कि क्या शहर में देखे हैं तब उनका जवाब होता है कि आदमियों के रहने के लिए शहरों में स्थान नही, भूत कहां रहेंगें।"
"राकेश उस काली बिल्ली की हरकतें आपने देखी। जिस तरह से वह कार पर झपटी थी वैसे होता नही है। वह जरूर कुछ ढूंढ रही थी।"
"रीना तुम ठीक कह रही हो लेकिन क्या वह काली बिल्ली भूत है? मैं कुछ कह नही सकता।"

कुछ देर बाद दोनों सो गए। आधी रात के समय काली बिल्ली की चीखने और रोने की आवाज आने के कारण राकेश और रीना की नींद खुल गई।
"राकेश बिल्ली का रोना अशुभ होता है। बहुत देर से रो रही है। इसको यहां से भगाना होगा।"
"थोड़ा रुक जा। मालूम नही कहां होगी फिर कालूराम की बात याद कर।"
बिल्ली के चीखने की आवाज तेज हो जाती है।
"राकेश जानवरों में किसी अनहोनी के  पूर्वमान करने की शक्ति होती है। शायद वह चेतावनी दे रही हो?"
"हो सकता है तुम ठीक कह रही हो। चलो बाहर चल कर देखते हैं।"
शॉल ओढ़ कर राकेश और रीना कमरे से बाहर आते हैं। चांदनी रात में चांद के प्रकाश से देखने लायक रोशनी थी। मुंडेर पर काली बिल्ली बैठी थी। राकेश और रीना को देख कर काली बिल्ली चुप हो गई और गेस्ट हाउस के पिछले भाग में कूद कर कहां गई यह राकेश और रीना नही देख सके।

कमरे में वापिस आकर दोनों कुछ देर तक काली बिल्ली पर चर्चा करते रहे। सुबह उठ कर उन्होंने कालूराम से रात की बात का जिक्र किया।
"साहब जी वह काली बिल्ली अवश्य एक लड़की का भूत है और किसी से बदला लेकर रहेगी। रात को उसका चीखना इसी बात का संकेत है।" कालूराम की बात में आत्मविश्वास था।

नाश्ता करने के पश्चात पेड़ों की झुरमुट में घूमने राकेश और रीना चल पड़े।
"राकेश आगे जो लड़की चल रही है। मुझे वही लगती है जिसने हमारा हाथ पकड़ कर हमें खाई में गिरने से बचाया था।"
दोनों अपनी रफ्तार तेज करके लड़की के समीप पहुंच गए।
"सुनिए।" रीना ने उस लड़की को आवाज दी।
आवाज सुनकर वह युवती रुक गई और मुड़ कर रीना से कहा। "कहिये आंटी।"
रीना से उस युवती को ऊपर से नीचे तक देखा। सांवले रंग की तीखे नैन नक्श वाली आकर्षक व्यक्तित्व के साथ वह युवती किसी का भी दिल चुरा सकती थी। उसने आज भी हल्के नीले रंग की फटी जीन्स और सफेद टॉप पहना हुआ था।
"आप वही हैं न जिसने हमे कल खाई में गिरने से बचाया था।"
"आंटी आप अंकल के साथ प्रेम की बातों में इतनी मस्त हो गई थी कि आप एक दम सड़क के किनारे खाई वाली छोर पर चल रही थी और जरा सा भी पैर सरकते ही नीचे खाई में गिरती।"
"बहुत शुक्रिया आप ने हमें बचाया। आपका क्या नाम है?"
"आंटी मैं आपके बच्चों की उम्र की हूं। मुझे तुम कहो।"
"क्या नाम है तुम्हारा?"
"रश्मि।"
बातें करते हुए बेंच तक पहुंच गए और तीनों बेंच पर बैठ कर बातें करने लगे।
"रश्मि तुम इतने आधुनिक कपड़े मतलब फ़टी जीन्स पहनती हो, कहां की रहने वाली हो और बड़े आराम से पहाड़ों पर चलती हो?"
"आंटी मैं नीचे गांव की रहने वाली हूं और दिल्ली में नौकरी करती हूं। अभी मैं छुट्टियों में घर आई हूं। मेरा बचपन गांव में बीता इसलिए बडे आराम से पहाड़ी रास्तों पर चलती हूं और रहती दिल्ली में हूं इसलिए आधुनिक कपड़े पहनती हूं। आंटी आप यहां कोठी वाले गेस्ट हाउस में रुके हैं न?"
"हां तुम्हे कैसे मालूम?"
"मैंने आपको वहां देखा है। आप होटल में रुकते तो अच्छा होता।"
"क्यों?"
"इस कोठी का मालिक बुरा इंसान है। यहां सबको मालूम है। अय्याशी का अड्डा बना रखा है। उसने कल रात आना था लेकिन आया नही। आज तो अवश्य आएगा तब देख लेना।"
"हम तो आज रात तक हैं। कल सुबह छ बजे मसूरी के लिए निकल जाएंगे। दिन मसूरी ठहर कर शाम को देहरादून जाना है।"
"आज की रात सावधान रहना।"
"लेकिन क्यों?"
"खुद देख लेना। अच्छा मैं चलती हूं।" इतना कह कर रश्मि उठी और पांच-दस कदमों की दूरी पर एक पेड़ के आगे कच्चे रास्ते पर उतर गई।

राकेश और रीना हैरानी से उसको देखते रहे लेकिन पेड़ के बाद कहीं नजर नही आई।
"रीना यह लड़की कहां से आती है और कहां गायब हो जाती है। मुझे रहस्यमयी लड़की लगती है।"
"हां राकेश जैसे काली बिल्ली रात में चीख रही थी और यह लड़की हमें सावधान रहने को बोल रही है। जरूर कोई गड़बड़ है। हमें कोठी छोड़ कर चले जाना चाहिए।"
"रीना कल सुबह तो जाना ही है। दोपहर का समय हो रहा है अब कहां जाएं। डर मत।"
"राकेश जो माहौल उत्पन्न हुआ है वह डराने के लिए बहुत है। दिन तो ठीक है लेकिन रात डरावनी हुई तब बहुत मुश्किल होगी।"
"कुछ नही होगा। गांव वाले भूतों पर विश्वास अधिक करते हैं।"

दोनों गेस्ट हाउस वापिस आ गए और शाम को बाहर घूमने नही निकले। लगभग सात बजे के आसपास कोठी के मालिक अपने दो मित्रों संग आए। उनके विशेष कमरे कालूराम ने पहले ही दुरुस्त कर रखे थे।
"रीना उस लड़की का कहना सत्य निकला कि कोठी के मालिक कल नही आये तब आज जरूर आएंगे।"
"राकेश हमें सावधान रहना होगा। मुझे बहुत डर लग रहा है। मालूम नही कब अनहोनी हो जाए। अब इस समय कहीं जा भी नही सकते हैं।"
"रीना हिम्मत रख। अब डरने का क्या फायदा।" राकेश ने रीना को धीरज रखने को कहा।
दोनों का टीवी देखने में भी मन नही लग रहा था। काफी देर तक दोनों जागते रहे लेकिन उनको नींद आ गई।
आधी रात के समय कुछ तेज आवाजों के कारण राकेश और रीना की नींद खुली। समय रात के साढ़े बारह बजे थे।
"किसी के झगड़ने की आवाज लग रही है।" रीना ध्यान से सुनने की कोशिश करने लगी।
"रीना आवाजों से ऐसा प्रतीत होता है कि कोई स्त्री और पुरुष के स्वर हैं।"
"बाहर चल कर देखते हैं कि क्या माजरा है?"
"रीना पहले तो डर रही थी अब निडर हो कर बाहर रोमांच का आनंद लेना चाहती हो।"
"चलो राकेश बाहर चल कर देखते हैं।"

राकेश औऱ रीना कमरे से बाहर आते है। ठंड बढ़ गई थी। हवा भी थोड़ी तेज चल रही थी। चारों ओर शांत वातावरण था। राकेश और रीना को बाहर कोई नजर नही आया। तभी मालिक के कमरे का दरवाजा खुला औऱ कोठी के मालिक ने एक युवती को धक्का दिया।
"तेरी यहां आने की हिम्मत कैसे हुई। एक गोली सीने के आर पार और तू सीधा बिना टिकट ऊपर।" कोठी का मालिक मुड़ा औऱ पिस्तौल ले कर आया और लड़की पर तान दी।
लड़की खूब जोर से हंसी। यह क्या लड़की तो रश्मि निकली।
"रीना यह तो रश्मि है।" राकेश के मुख से निकले शब्दो पर रश्मि ने राकेश और रश्मि की ओर मुड़ कर देखते हुए कहा। "अंकल-आंटी मैंने आपको कहा था न इस कोठी का मालिक अय्याश है। दो साल तक मुझसे खेल कर एक रात प्यार का नाटक करते-करते कोठी के पीछे खाई में धक्का दे दिया था। मैं तो बिना टिकट दो वर्ष पहले ही ऊपर पहुंच गई थी। आज बिना टिकट ऊपर पहुंचने की इसकी बारी है।"
"तू उस दिन बच गई तो आज खत्म कर देता हूं।" कोठी के मालिक ने पिस्तौल से गोली चलाई। निशाना चूक कर सामने पेड़ पर लगा। गोली चलने की आवाज सुनकर कालूराम भी बाहर आ गया।
रश्मि पीछे होती गई और कोठी के मुंडेर पर उस भाग की ओर हो गई जिधर खाई थी। कोठी के मालिक ने पिस्तौल से दो गोलियां और दागी लेकिन रश्मि पर कोई असर नही हुआ। एक दम कोने पर पहुंच कर रश्मि गायब हो गई और मीआउं की आवाज के साथ वही काली बिल्ली मुंडेर पर नजर आई। उस काली बिल्ली ने जबरदस्त छलांग लगा कर कोठी के मालिक के मुंह पर अपना पंजा मारा। कोठी का मालिक लड़खड़ा कर गिर पड़ा। नशे में होने के कारण वह मुश्किल से खड़ा हो सका। काली बिल्ली उस पर छलांग मारते हुए उस पर झपटती और मुंह और आंखों पर पंजा मारती। कोठी का मालिक एक दम मुंडेर पर गिरा। काली बिल्ली ने अब अंतिम प्रहार किया औऱ कोठी का मालिक खाई में गिर कर बिना टिकट ऊपर पहुंच गया। काली बिल्ली कालूराम के पैरों से लिपट कर रोई और चुपचाप मुंडेर पर चढ़ कर गायब हो गई।
राकेश और रीना स्तब्ध हो गए। उनको बुत बना देख कालूराम ने कहा।

"साहब जी रश्मि मेरी बेटी थी। मालिक ने दिल्ली के कॉलेज में अपने खर्च पर रश्मि का दाखिला करवाया था। रश्मि दिल्ली वाली कोठी के सर्वेंट क्वार्टर में रहती थी। मुझे नही मालूम कि मालिक ने कब रश्मि को अपने प्रेम जाल में फंसाया। दो वर्ष पहले जब रश्मि गर्मियों की छुट्टियों में आई तब एक दिन रश्मि का रात के समय मालिक से खूब झगड़ा हुआ तब मुझे यह बात पता चली लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। यही मुंडेर के समीप झगड़ा हुआ और रश्मि नीचे गिरी और हमारे बीच नही रही। आज दो वर्ष बाद मालिक आये हैं और रश्मि ने अपनी मौत का बदला ले लिया।"
"कालूराम तुम दो वर्ष तक चुप रहे?" राकेश ने पूछा।
"मैं गरीब क्या कर सकता था। अमीरों के हाथ बहुत लंबे होते हैं। रश्मि काली बिल्ली बन कर आने लगी। मुझे विश्वास था कि वह इंसाफ करेगी। आज मुझे इंसाफ मिल गया। साहब जी आज के बाद रश्मि काली बिल्ली के रूप में कभी नजर नही आएगी। उसे मुक्ति मिल गई।"
कालूराम की आंखों में आंसू थे। राकेश और रीना कुछ नही कह सके।




Saturday, May 12, 2018

भूतिया महल

भूतिया महल

विनोद राय ऑफिस में मीटिंग के बाद मीटिंग में पूरा दिन व्यस्त रहे। शाम के आठ बजे फुरसत मिली और अपने डेस्क पर आए। पेशे से आर्किटेक्ट विनोद राय का अपने क्षेत्र में विशेष स्थान है। घर जाने से पहले अदरक वाली चुस्त चाय की चुस्कियों के बीच लैपटॉप पर ईमेल देखने लगे। एक ईमेल को पढ़ कर फिर से पढ़ा। ईमेल बेल्जियम के प्रसिद्ध आर्किटेक्ट राफेल का था। राफेल ने विनोद राय को यूरोप आर्किटेक्ट अधिवेशन में सम्मलित होने के लिए निमंत्रण पत्र भेजा है। आने-जाने और रहने का खर्च आर्किटेक्ट एसोसिएशन की ओर से है। राफेल की यूरोप के बेहतरीन और प्रसिद्ध आर्किटेक्ट में गिनती होती है। विनोद राय राफेल के साथ दो प्रोजेक्ट पर काम कर चुके थे। राजस्थान की एक पुरानी हवेली को पांच तारा होटल में परिवर्तित करने के प्रोजेक्ट में राफेल मुख्य आर्किटेक्ट थे और विनोद राय ने उस प्रोजेक्ट में एक अहम भूमिका निभाई थी। विनोद राय की काबिलयत देख कर राफेल ने ऑस्ट्रिया में एक पुरानी इमारत के जीर्णोद्धार के प्रोजेक्ट में विनोद राय को अपनी टीम में सम्मलित किया था। विनोद राय की उम्र पचपन वर्ष की हो चुकी थी। राफेल उनसे लगभग पंद्रह वर्ष बड़े थे। उम्र लगभग सत्तर के आसपास। सत्तर की उम्र में भी राफेल एकदम चुस्त और कार्यरत है। विनोद राय को निमंत्रण पर अति प्रसन्नता हुई और फौरन राफेल को अधिवेशन में सम्मलित होने की सहमति भेजी। यूरोप में आर्किटेक्ट अधिवेशन में सम्मलित होना विनोद राय के लिए सौभाग्य और सम्मान की बात थी।

अधिवेशन के अध्यक्ष राफेल थे। अधिवेशन में राफेल ने विनोद राय के काम और कार्यशैली की भूरी-भूरी तारीफ की और सम्मान पत्र के साथ यूरोप आर्किटेक्ट एसोसिएशन की एसोसिएट मेम्बरशिप प्रदान की। विनोद राय के लिए यह गौरव की बात थी।

अधिवेशन समापन के बाद राफेल ने विनोद राय और कुछ चुने हुए आर्किटेक्ट को शहर से कुछ दूरी पर एक छोटी पहाड़ी पर बने एक महल में रात के डिनर पर आमंत्रित किया। एक मिनी बस में विनोद राय और दूसरे आर्किटेक्ट पहाड़ी पर बसे महल की ओर रवाना हुए। छोटी-छोटी घुमावदार संकरी सड़क के सफर के पश्चात रात आठ बजे महल में प्रवेश किया। राफेल ने उन सब का जोरदार स्वागत किया। राफेल ने टीम को महल दिखाया। लगभग एक घंटा महल देखने मे लगा। राजस्थान के किलों जैसा विशाल नही था। एक हवेली से बड़ा और किले से छोटा महल था। टीम के सभी सदस्य आर्किटेक्ट थे और सभी बारीकी से महल का अध्ययन कर रहे थे। राफेल महल के वास्तु की जानकारी विस्तार से सभी को दे रहे थे। एक बड़े दरवाजे के पास विनोद राय रुक गए और बारीक अध्ययन करने लगे। विनोद राय को उस दरवाजे की बारीक जांच करते देख राफेल रुक गए और विनोद राय से पूछा।
"विनोद आपको इस दरवाजे में क्या खास दिखा जो रुक गए?"
"राफेल ऐसे दरवाजे राजस्थान के किलों और हवेलियों में होते हैं। दरवाजे में छोटा दरवाजा। दरवाजे पर आप जो नक्काशी देख रहे है वो वास्तव में आयते और मंत्र हैं। दरवाजे के बाएं हिस्से पर आयते अरबी भाषा में लिखी है। भाषा अरबी है यह निश्चित है पर क्या लिखा है मुझे नही मालूम क्योंकि मैं अरबी नही जानता। दरवाजे के दाएं हिस्से पर हिंदी में गायत्री मंत्र लिखा है। ऊपर से नीचे तक गायत्री मंत्र लिखा है। हिन्दू धर्म में गायत्री मंत्र का विशेष महत्व है। हर पूजा में इसका उच्चारण किया जाता है। गायत्री मंत्र के बारे में एक बात और कहना चाहता हूं कि इसके उच्चारण के बाद भूत और प्रेत निकट नही आता और सब डर दूर हो जाते हैं। राफेल मुझे लगता है कि महल के निर्माण में अरब और भारत के मजदूरों और शिल्पियों का विशेष योगदान रहा होगा।"
विनोद राय की बात सुनकर राफेल मुस्कुरा दिए। "विनोद राय मैं तुमसे इस बात से सहमत नही कि गायत्री मंत्र भूत, प्रेतों से बचाता है। मैंने आपको यहां आने से पहले बताया नही। बताया इसलिए कि शायद सुनकर आप यहां नही आते। यह महल भूतिया महल है। इस महल को हॉन्टेड कैसल कहते हैं।"

यह सुनकर सभी ने दांतों तले उंगली दबाई कि रात के समय भूतिया महल बुला कर राफेल आखिर क्या करना चाहते हैं। सभी के रौंगटे खड़े हो गए। मन ही मन सभी वहां से शीघ्र रुक्सत लेना चाहते थे। भूत के साथ आमना सामना कोई नही चाहता था। विनोद राय भी सभी की तरह असहज हो गए। रात का समय, शहर से दूर पहाड़ी पर भूतिया महल में डिनर से पहले ही सभी का मन बेस्वाद हो गया। सभी को आशंकित देख राफेल ने हौसला बढ़ाते हुए कहा "चलिए आपने महल देखा अब डिनर करते हैं।"

डाइनिंग हॉल बहुत बड़ा था। बीच मे दो खंभे थे। एक खंभे पर राजा का और दूसरे खंभे पर रानी का चित्र था। बीच मे बड़ी डाइनिंग टेबल जिस पर एक साथ पचास लोग खाना खा सकते हैं। एक दीवार पर शीशे थे और उसके सामने वाली दीवार पर आकर्षक कलाकृतियां थी। तीसरी दीवार पर बहुत बड़ी खिड़की थी। खिड़की से पहाड़ का सुंदर दृश्य दिखाई देता था और पहाड़ी के नीचे बसे नगर की झिलमिलाती बत्तियां अतुलनीय लग रही थी। चौथी दीवार पर वही बड़ा दरवाजा था जिस पर आयते और गायत्री मंत्र लिखे हुए थे।

सभी डाइनिंग टेबल पर बैठ गए। राफेल ने महल का इतिहास बताना आरम्भ किया। यह महल करीब दो सौ वर्ष पुराना है। यहां राजा अपने परिवार के संग रहते थे। जनता नीचे नगर में रहती थी। महल के पिछले हिस्से में नौकर रहते थे। भारत मे अंग्रेजो का शासन था और गुलामो की तरह बहुत मजदूर अंग्रेजो ने दुनिया के विभिन्न हिस्सों में ले गए। मैं विनोद राय की बात से सहमत होता हूं कि उन हिंदुस्तानी मजदूरों ने गायत्री मंत्र को दरवाजे पर अंकित किया होगा। वो दौर राजाओं का था और आपसी रंजिश और अपने राज्य के विस्तार के लिए खून-खराबा और लड़ाई होती थी। ऐसी एक लड़ाई में इस महल के राज परिवार को कैद कर लिया। यातनाएं दी और फिर मार डाला। राज परिवार खत्म हो गया सिर्फ नौकर बचे थे। नौकर के वंश बताते हैं कि राज परिवार के सदस्य आज भी भूत बन कर इसी महल में रहते हैं।"

सभी आर्किटेक्ट बहुत ध्यान से राफेल की बातें सुन रहे थे और साथ में कुछ हद तक डरे हुए थे। राफेल ने उनका डर दूर करते हुए कहा।
"मित्रो डरने की कोई आवश्कयता नही है। आप पूरी तरह सुरक्षित है। आपको यह भूतिया महल दिखाने का मकसद है कि सरकार इस भूतिया महल को पर्यटन के लिए खोलना चाहती है। यह भूतिया महल बहुत पुराना है और इसको एक नए तरीके से संवार कर पर्यटक स्थल बनाना है और मुझे आप जैसे मंझे हुए आर्किटेक्ट की जरूरत है। आप मेरी टीम का हिस्सा बनिये और इस हॉन्टेड कैसल को विश्व का सबसे जुदा पर्यटक स्थल बना कर अपनी कला को विश्व के सामने प्रस्तुत कीजिये।"

राफेल कुछ पल के लिए शांत हो गया फिर उसने डाइनिंग हॉल में बैठे अपने साथियों के लिए डिनर की अनुमति मांगी। विनोद राय अचंभित हो गया।
"राफेल सर आप किसके साथ बात कर रहे हैं। मुझे यहां कोई नजर नही आ रहा है।"
"आप दो खंभो पर राजा और रानी के चित्र देख रहे है। वे इस महल के वास्तविक राजा और रानी के चित्र हैं। जब इनका कत्ल हुआ, कहते हैं उसके बाद ये भूत बन कर महल में ही घूमते हैं। बिना उनकी अनुमति के यहां कोई नही आ सकता। सामने शीशों में राजा और रानी थे जिनसे मैं आपके डिनर की अनुमति ले रहा था। वे आम व्यक्तियों को नजर नही आते। इन्होंने डिनर की अनुमति दे दी है अब डिनर कुछ ही पल में आपके सामने होगा। राजा से बातचीत वोही कर सकता है जो राजा की कुर्सी पर बैठता है। मैं जिस कुर्सी पर बैठा हूं वह राजा की है।"

विनोद राय का दिमाग सुन हो गया। राफेल भूतों से बात कर रहा है। भूतों के बहुत किस्से विनोद राय ने सुने थे लेकिन ऐसी रहस्यमयी स्थिति से पहली बार सामना हुआ। कड़ाके की ठंड में पसीना महसूस होने लगा। विनोद राय समझ नही सका कि वास्तव में राफेल भूत से बात कर रहा था या अभिनय कर रहा था। सच क्या था विनोद राय को नही मालूम। वह उस भूतिया महल से जल्द से जल्द निकलना चाहता था।

भूख विनोद राय की खत्म हो गई थी। डिनर में न के बराबर थोड़ा सा लिया।

रात के ग्यारह बजे राफेल ने सबके साथ मिनी बस में भूतिया महल से रुक्सत ली। विनोद राय चुपचाप बस की खिड़की से बाहर दूर टिमटिमाती बत्तियों को देखते हुए सोचता रहा क्या गायत्री मंत्र की शक्ति ने भूत को दूर रखा। विनोद राय हर रात सोने से पहले गायत्री मंत्र का जाप करता है और उसका विश्वास है कि रात को बुरे सपने नही आते। होटल पहुंच कर राफेल ने सबसे इस प्रोजेक्ट में जुड़ने की फिर विनती की।

अगले दिन विनोद राय ने भारत आने की फ्लाइट पकड़ी और भूतिया महल के किस्से को एक बुरा सपना मान कर भूलना ही बेहतर समझा।

कुछ दिन बाद राफेल की ईमेल आई। राफेल ने प्रोजेक्ट से जुड़ने की सहमति मांगी। विनोद राय ने अपनी असहमति की ईमेल लिखी।

Tuesday, May 08, 2018

मौसा जी की जय




मौसेरी बहन की मुम्बई में शादी के दो दिन पश्चात रमाशंकर औऱ उमाशंकर ने भी परिवार समेत दिल्ली के लिए प्रस्थान किया। अन्य रिश्तेदारों के संग सभी राजधानी एक्सप्रेस से मुम्बई से दिल्ली के लिए रवाना हुए। कुल चालीस जनों के दल का आरक्षण दो अलग कोच में हुआ। मौसा जी ने बहुत मिन्नत की, शादी में हलवाई लगे हुए हैं, घर का खाना साथ ले जाओ। रेल का खाना बेकार होता है। स्वादिष्ट खाना छोड़ कर बेकार बासी खाना क्यों खाते हो? लेकिन सब ने मना कर दिया कि पहले ही सामान बहुत है, चालीस आदमियों के खाने के डिब्बे कौन संभालेगा।

मौसा जी ने किसी की नही सुनी और खाना का एक बड़ा कार्टन भी सामान के साथ रेल में खुद अपनी देख रेख में रखवाया। चार तरह की सब्जी, दाल, चावल, पूरियां, रोटियां, चटनी, आचार और मुरब्बा सभी भरपूर मात्रा में रखवाए।
"रमा उमा खाना देसी घी में बना है। चार दिन तक खराब नही होगा। सफर की थकान हो ही जाती है रेल में नही खाओगे तब घर जाकर खाना। कल खाना बनाने की छुट्टी।" कह कर मौसा जी ने किसी की नही सुनी और सभी जनों को रेल में तसल्ली से बिठा कर रेल के प्लेटफार्म छोड़ने पर ही स्टेशन से बाहर आए।

रेल चल पडी। बच्चे एक स्थान पर एकत्र होकर अंताक्षरी खेलने लगे। महिलाएं एक साथ बैठ गपशप करने लगी। रमाशंकर और उमाशंकर सामान को सीटों के नीचे ढंग से रख रहे थे। सीटें दो कोच में आरक्षित थी लेकिन बैठे एक साथ एक ही कोच में थे। दूसरे कोच में सिर्फ उमाशंकर अपनी पत्नी उर्मिला संग खाली सीट पर पसर कर लेट गए कि टिकट चेकर को टिकट भी दिखानी हैं। टिकट चेकर को सोलह टिकट चेक करवा दी।
"यात्री कहां हैं?"
उमाशंकर ने स्थिति स्पष्ट की चौबीस सीट दूसरे कोच में हैं और सभी वहीं हैं। रात में सोने के लिए सभी सीटों पर आएंगे तब तक यहां और वहां आना जाना रहेगा।
दूसरे कोच में जहां पूरा परिवार बैठा था, वहां का टिकट चेकर दूसरा था और खड़ूस भी। चौबीस टिकट पर पैंतीस जनों को देख बिगड़ गया।
"आप चौबीस टिकट पर पैंतीस जन सफर नही कर सकते। आपको मालूम नही है कि बिना टिकट राजधानी एक्सप्रेस में सफर नही कर सकते। आप सब को अगले स्टेशन पर उतारता हूं और बिना टिकट सफर के जुर्म में केस दर्ज करवाता हूं।" टिकट चेकर रमाशंकर से रकम ऐंठने के चक्कर मे था।
"जनाब पूरे चालीस जन की चालीस टिकट हैं। चौबीस इस कोच में और सोलह दूसरे कोच में। हम एक परिवार के हैं और शादी के बाद दिल्ली वापिस जा रहे हैं। दो महीने पहले टिकट आरक्षण करवाया था। यहां एक साथ बैठे हैं। थोड़ी देर में सभी अपनी सीटों पर चले जायेंगे। आप पूरे टिकट देखिए।" रमाशंकर ने बात स्पष्ट की।

टिकट चेकर दूसरे चक्कर में था वह अगले स्टेशन पर उतार कर केस करने की धमकी देने लगा तब रामशंकर और उमाशंकर का पारा ऊपर चढ़ गया।
"देखिए जनाब दूसरे कोच में वहां के टिकट चेकर को टिकट दिखा दिए है उनको कोई आपत्ति नही है तब आपको किस बात की आपत्ति है?"
"मुझे अपनी ड्यूटी करने दो। आप पर पुलिस केस बनेगा। अगले स्टेशन पर पुलिस बुलवाता हूं।"
यह सुन उमाशंकर ने टिकट चेकर की कमीज का कॉलर पकड़ लिया। "अब तो साले तू पुलिस क्या मिलिट्री बुला ले। हम भी तेरी शिकायत करेंगे। रिश्वत मांगने के जुर्म में तेरे को अंदर करवाएंगे। पुलिस तो रेल में होगी उसको हम बुलाते हैं।" कह कर उमाशंकर टिकट चेकर को एक जोर का झापड़ रसीद करने वाला ही था कि रमाशंकर ने उसे रोक लिया।
"ठीक है रमा तू पुलिस लेकर आ। हर रेल में पुलिस होती है। किसी किसी कोच में अवश्य होगी।"

तू तू मैं मैं सुन कर कोच में सफर कर रहे दूसरे मुसाफिर भी बीच बचाव में गए। रमाशंकर पुलिस के दो सिपाही ले कर आया। हंगामा बढ़ता देख और पुलिस के आगे टिकट चेकर शांत हो गया और सब अपनी सीटों पर चले गए।

उमाशंकर की पत्नी उर्मिला जम्हाई लेती हुई सीट पर लेट गई। "कमबख्त ने सारा मूड खराब कर दिया। अच्छी भली गपशप चल रही है। नाशपीटे ने रंग में भंग दाल दिया।"
"तू मूड खराब कर, सब थोड़ा आराम कर ले। मैं भी ऊपर वाली सीट पर लेट कर सुस्ता लूं। कमबख्त ने दिमाग खराब कर दिया।" कह कर उमाशंकर समेत सभी अपनी सीटों पर आराम करने लगते हैं।
राजधानी एक्सप्रेस के किराए में खाने का मूल्य सम्मलित होता है अतः किसी ने मौसा जी का खाना नही खोला। रेल का खाना खाने के पश्चात सभी सो गए।

रात के सन्नाटे में तेज गति से रेल दौड़ी जा रही थी। बीच बीच मे तेजी से गाड़ी हिलती भी थी।
"अरे सुनो सो गए क्या?" उर्मिला ने लेटे हुए उमाशंकर को आवाज दी।
"सोने दे, क्यों नींद खराब कर रही है?" उमाशंकर ने करवट बदलते हुए जवाब दिया।
"कमाल है रेल में तुम्हे नींद जाती है? यहां खटर पटर रेल चल रही है साथ में हिल भी रही है। हिलती रेल में तुम कैसे सो सकते हो? मैं नही सो सकती।"
"रेल तो कुछ नही कह रही। अलबता तू नही सोने देगी।" कह कर उमाशंकर ऊपर की सीट से नीचे उतर कर उर्मिला संग बैठ गया।
"अब तूने जगा दिया, क्या करूं?"
"नाराज हो गए?"
"नाराज हो कर कहां जाऊंगा?"
उनकी बातें सुनकर उमाशंकर की छोटी बहन वृंदा जाग गई। "भाभी नींद नही रही क्या?'
"तेरा भाई सोने दे तब न।" उर्मिला ने ठिठोली की। ननद भाभी दोनों हंस दी। उनको हंसता देख उमाशंकर बोला "जब दो महिलायें एक हो जाएं तब चुपचाप कंबल से मुंह ढक कर सो जाना चाहिए।
"भैया आप तो नाराज हो गए। नींद नही रही है, ताश निकालो। रेल में समय व्यतीत करने का सबसे अच्छा साधन ताश है।"

उमाशंकर, उर्मिला और वृंदा की बातें सुन और रिश्तेदार उठ जाते हैं। सबकी शिकायत कि तेज रफ्तार से चलती गाड़ी उससे दुगनी रफ्तार से हिल रही है। हिंडोले जैसा प्रतीत हो रहा है। नींद कैसे आएगी। सब ताश खेलने बैठते हैं।
"तीन पत्ती खेलेंगे।"
"दस रुपये पॉइंट।"
"मंजूर है।" सभी एक साथ बोले।
"रात के बारह बजे ताश खेलने का आनंद ही कुछ अलग है।" उर्मिला ने पत्ते फैटते हुए कहा।
"बिलकुल अलग है भाभी। हिलते हुए खेलना कोई आसान बात नही है।" वृंदा ने चाल चलते हुए कहा।
"रमा एक पेग बना। मूड नही बन रहा है।" उमाशंकर ने रमाशंकर को व्हिस्की की बोतल खोलने को कहा।
"उमा भाई पता नही किस सूटकेस में रखी है। सूखे खेलो, मुझसे सारे बोरी बिस्तर रात के समय मत खुलवाओ।"
रमाशंकर की बात सुन कर उमाशंकर ने पैक किया। "पेग मिलता तब बेकार पत्तों के साथ भी ब्लाइंड खेल जाता। तुम खेलो।" कह कर उमाशंकर ऊपर की सीट पर जाकर कंबल ओढ़ सो गया। बाकी जन दो घंटे तक ताश खेलते रहे। उर्मिला जीत गई।
"भाभी पक्की जुआरण हो। सबकी जेब खाली करवा ली।" वृंदा सबसे अधिक हारी थी।
"तेरे भाई ने सिखाया है। शादी से पहले तो ताश मेरे लिए काला अक्षर भैंस बराबर था।" उर्मिला ने जम्हाई ली औऱ कंबल ओढ़ लिया।
धीरे-धीरे सबको नींद गई। सुबह की चाय पर सबकी नींद खुली। भरतपुर पार करने के बाद रेल रुक गई। रेल भरतपुर और मथुरा के बीच रुकी हुई थी। गाड़ी क्यों रुकी किसी को नही मालूम था।
"पता करो गाड़ी क्यों रुक गई है?" उर्मिला ने उमाशंकर को कहा।
"भई सुबह का समय है। चलती गाड़ी में हिलते हुए हल्का होने में बहुत दिक्कत होती है इसलिए मुसाफिरों को जंगलपानी करवाने के लिए गाड़ी रुकी है।" उमाशंकर के इतना कहते सभी ने ठहाका लगाया।
"ग्लास या मग दूं, किसने जाना है?" उर्मिला ने चुटकी ली।
उर्मिला के कहते ही रेल धीमी गति से आगे बढ़ने लगी।
"यार यह राजधानी एक्सप्रेस है या पैसेंजर। इससे तेज तो मालगाड़ी चलती है।" निराश हो कर रमाशंकर ने कहा।
"भैया गाड़ी शर्तिया लेट होगी।" वृंदा ने जले पर नमक लगाया।
"बहन शुभ-शुभ बोल।" उमाशंकर ने कहा।

रेल धीमी गति से मथुरा स्टेशन पहुंची। गाड़ी सिर्फ दो मिनट नाश्ता चढ़ाने के लिए रुकती है लेकिन आधे घंटे रुकी रही। सबका नाश्ता हो गया। मुसाफिरों ने प्लेटफार्म पर मथुरा के पेड़ों की जम कर खरीदारी की। स्टेशन पर उपलब्ध सभी पेड़े बिक गए। गाड़ी फिर धीमी गति से बढ़ी।
"आज तो पेड़ों के लिए गाड़ी रुकी थी।" उर्मिला ने कहा।
"भाभी पांच किलो तो तुमने भी खरीदे हैं।" वृंदा ने कह कर उर्मिला को कोहनी मारी।
"सब के लिए एक-एक डिब्बा लिया है। याद करेंगे।"

उर्मिला के शब्द "याद करेंगे" सत्य हो गए। मथुरा के पेड़े तो नही बल्कि यह सफर सभी को भूलने वाला सफर हो गया। रेल बैलगाड़ी की रफ्तार से चल रही थी। मुसाफिरों का सब्र टूटता जा रहा था। मथुरा से आगे छत्ता स्टेशन पर रुक गई। अब स्थिति साफ हो गई कि आगे दिल्ली से चेन्नई जाने वाली गाड़ी का एक्सीडेंट हो गया है। दो कोच दूसरी पटरी पर गिर गए हैं। सुबह के समय हुई रेल दुर्घटना के कारण रेलों का आवागमन बाधित हो गया है और सभी रेलें जहां तहां रुकी पड़ी हैं। जान-माल का जबरदस्त नुकसान हुआ है। युद्धस्तर पर बचाव कार्य हो रहा है।

अब रेल कब चलेगी इसका उत्तर किसी को नही मालूम था। मथुरा से दिल्ली का सफर राजधानी एक्सप्रेस डेढ़ घंटे में तय करती है लेकिन आज कब पहुंचेगी, किसी को नही मालूम। मुसाफिरों का सब्र का बांध टूटने लगा। दो घंटे बाद रेल की बत्तियां बंद कर दी गई और एयरकंडीशनर भी बंद हो गए। अब मुसाफिरों ने चिल्लाना शुरू कर दिया।
"अरे अंधेरे कोच में बिना एयर कंडीशनर के भुन जाएंगे। राजधानी एक्सप्रेस में सफर कर रहे है कोई मालगाड़ी में नही कि अंधेरे में बैठे रहेंगे।"

कोई दूसरा चारा नही था। गाड़ी कब बढ़ेगी इसका उत्तर रेल विभाग के पास भी नही था। एकल मुसाफिर जिनके पास सामान कम था उन्होंने रेल छोड़ दी और पैदल हाईवे की ओर चल पड़े कि आती जाती रोडवेज की बस पकड़ कर दिल्ली दो-तीन घंटे में पहुंच जाएंगे। यहां मालूम नही कितना समय लग जाए। आधे घंटे में बहुत सारे मुसाफिर गाड़ी छोड़ कर हाईवे की ओर रवाना हुए। हाईवे रेलवे स्टेशन से थोड़ी दूर पर था। गाड़ी रुकने औऱ मुसाफिरों का हाईवे पर जाने की खबर सुनते ही रिक्शे और तांगे स्टेशन पर लग गए। छोटे परिवार वाले मुसाफिरों ने भी गाड़ी छोड़ हाईवे की ओर रवानगी की।

"भाई रमा हम भी चले क्या?"
"उमा भाई हमारी समस्या अलग है। हम चालीस जने हैं। औरतें और बच्चे हैं। साथ में गहने, रकम और जोखिम का सामान भी है। हमें तो पूरी बस चाहिए। उचित यही है कि हम शांति से गाड़ी चलने की प्रतीक्षा करें।"
"रमा अंदर कोच में बैठ नही सकते हैं। ऐसा करते हैं कि जोखिम वाला सामान हम यहां प्लेटफॉर्म पर अपने साथ रखते हैं। बाहर गर्मी अवश्य है लेकिन दूसरा उपाय भी नही है।"

उमाशंकर की बात मान कर सभी अपना कीमती सामान के साथ प्लेटफार्म पर बैठ गए। एक छोटे से रेलवे स्टेशन पर मुश्किल से दो-तीन बेंच थे। एक बेंच के पास फर्श पर चादर बिछा कर सब गपशप करने लगे। बच्चों को खुला मैदान खेलने और धमा चौकड़ी के लिए मिल गया।

उमाशंकर और रमाशंकर को देख कर गाड़ी में सफर कर रहे दूसरे परिवार भी प्लेटफार्म पर उतर गए। वीरान प्लेटफार्म क्रीड़ा स्थल बन गया। रेलवे पटरी पर पड़े पत्थर उठा कर पिट्ठू बना लिया और अपनी गेंदे निकाल कर पिट्ठू खेलने लगे। बड़े ताश खेलने में व्यस्त हो गए।

राजधानी एक्सप्रेस में मथुरा पर नाश्ता देने के बाद खाने का कोई प्रबंध होता है क्योंकि साढ़े नौ बजे दिल्ली पहुंच जाती है। रेलवे स्टेशन पर चाय के स्टाल पर धड़ाधड़ बिक्री होने लगी। चाय और पकोड़े बिकने लगे और सारा स्टॉक समाप्त हो गया।
"मजा नही आया पकोड़ों में, पता नही कौन से तेल में बनाये हैं। इससे बढ़िया तो अपनी गली के नुक्कड़ वाला बनाता है।" वृंदा बोली
"तेरे को उसके पकोड़े पसंद हैं। मुझे तो रति भर पसंद नही उस मुये के पकोड़े।" उर्मिला ने मुंह बनाते हुए कहा।
"फिर भी खाती जरूर हो।" वृंदा खिलखिलाई।
"तेरा साथ देने के लिए खा लेती हूं। बस यहां देख, सड़ी हुई चाय भी पी ली। कोई स्वाद था। निरी शक्कर पानी मे घोल रख्खी थी।"

उर्मिला और वृंदा की नोंक झौंक देख कर उमाशंकर ने कहा। "अरे भूख लगी है तब मौसा जी का खाना निकालो, वह कब काम आएगा। पूरा कार्टन भर के खाना दिया है।"
"अरे भाई लोगों वो तो हम भूल ही गए। लगता है मौसा जी को पहले ही अहसास हो गया था कि सफर में खाने की सख्त जरूरत पड़ेगी।" उर्मिला ने उत्साहित हो कर उमाशंकर से कहा। "खड़े हुए बातें करोगे या खाने का कार्टन भी निकलवाओगे।"

रमाशंकर ने खाने का कार्टन निकाला। सभी ने खाना आरम्भ किया। मौसा जी ने तीन दिन का खाना पैक कर दिया था। छोले, आलू-गोभी की सब्जी, पनीर, साग, पुलाव के साथ मूंग दाल का हलवा, चटनी, आचार और मुरब्बा भी रखा हुआ था। रमाशंकर के परिवार के चालीस सदस्यों के छक कर खाने के पश्चात भी भरपूर मात्रा में बचे खाने को गाड़ी में सफर कर रहे दूसरे मुसाफिरों ने भी खाया। शुद्ध देसी घी में निर्मित लजीज खाने की सभी मुसाफिरों ने जम कर तारीफ की। संकट की घड़ी में जहां भारतीय रेल ने हाथ खड़े कर दिए, उस संकट की घड़ी में मौसा जी का खाना संकट मोचन बना। मौसा जी ने भी सो सवा सो बंदों का खाना दिया था। मुसाफिरों के साथ स्टेशन मास्टर ने भी जम कर भोजन का स्वाद लिया।
"भाई साहब आपके मौसा जी दूरदर्शी हैं जो खाना आपको दिया। पहले समय में मुसाफिर घर से भोजन साथ लेकर चलते थे। दो-तीन दिन का खाना साथ रखते थे। रेल गाड़ी लेट हो जाए तब खाना-पीना साथ होना चाहिए। हमसे पूछो गाड़ियों में जो खाना परोसा जाता है साफ और बढ़िया नही होता। पता नही किस घी तेल में बनाया जाता है। भगवान जाने लेकिन मौसा जी ने शुद्ध देसी घी में खाना बनवाया है। सुगन्ध बता रही है।" खाना खाने के बाद देसी घी से लबालब हाथ मूछों पर फेरते हुए कहा।

सभी मुसाफिर मौसा जी के खाने की तारीफ करते जा रहे थे। दोपहर के समय तेज धूप से बचने का साधन सिर्फ स्टेशन मास्टर का कमरा था या फिर पेड़ की छांव। स्टेशन मास्टर उमाशंकर के परिवार को अपने कमरे में ले गया। रमाशंकर ने ताश निकाली।
"भाई साहब दो हाथ हो जाएं, दस रुपये पॉइंट।"
जुए के नाम से स्टेशन मास्टर घबरा गया। "जनाब आप फँसवाओगे। ताश खेल लो लेकिन रुपये के साथ नही। किसी ने शिकायत कर दी तो आफत हो जाएगी। ड्यूटी पर जुआ नही।"
"कौन बताएगा जनाब। यहां सभी अपने हैं।" उमाशंकर ने स्टेशन मास्टर को भी खेल में बिठा लिया। मौसा जी के खाने का कमाल था कि मूंछों पर ताव देते स्टेशन मास्टर खेलने लगे।
मास्टर जी खेल के मझे खिलाड़ी थे। उन्होंने उर्मिला और वृंदा जैसी पक्की खिलाड़ियों को मात दे दी। स्टेशन मास्टर ने सब को चित करते हुए दो हज़ार रुपये अपनी अंटी में कर लिए।

शाम के पांच बजे स्टेशन मास्टर के पास संदेश आया कि रेल की पटरी साफ हो गई है। एक्सीडेंट वाली ट्रेन को हटा लिया गया है। आधे घंटे में रेल यातायात शुरू कर दिया जाएगा।
रेल का एयर कंडीशनर चालू कर दिया। मुसाफिर गाड़ी में बैठ गए।
"मौसा जी को हमारा नमस्कार अवश्य कहना।" स्टेशन मास्टर ने गाड़ी में चढ़ते उमाशंकर को कहा।
"जरूर जनाब।"
उमाशंकर और रमाशंकर सोच रहे थे कि जिस खाने पर उनको ऐतराज था कि जब गाड़ी में खाना मिलता है तो साथ उठाने के क्या जरूरत है। लेकिन मौसा जी जिद पर अड़ गए थे कि खाना जरूर देंगे और बहुत प्यार से खाना कार्टन में पैक करवा के गाड़ी में रखवाया था। संकट में उनका खाना सभी के काम आया।
कोच के सभी मुसाफिरों ने जयकारा लगाया। "मौसा जी की जय।"
राजधानी एक्सप्रेस धीरे धीरे आगे बढ़ने लगी। उमाशंकर और रमाशंकर के होंठों पर मुस्कान थी।


अंत

"नयना क्या बात है फिर से सो गई?" नवीन ने सुबह की सैर से वापस आ कर नयना को बिस्तर पर लेटे देख कर पूछा। "नवीन बदन टूटा सा लग ...