Sunday, November 19, 2017

नाराजगी


हवाई अड्डे पर समय से बहुत पहले पहुंच गया। जहाज के उड़ने में समय था। दुकानों में रखे सामान देखने लगा। चाहिए तो कुछ भी नही था फिर भी समय व्यतीत करने हेतु हर दुकान पर खड़ा हो जाता। खरीदना कुछ भी नही था लेकिन तन्मयता के साथ दुकानों में रखे सामान के दाम देखने लगा, शायद कुछ कम कीमत का सामान मिल जाए जिसकी उम्मीद के बराबर थी।

"हरी, हरी।" आवाज सुन कर गर्दन घुमा कर देखा।
"बहन।" एक लंबे अरसे बाद बहन से मिलना हुआ और आश्चर्य भाव लिए बहन को गले लगाया।
"कहां जा रहे हो?" बहन सरिता ने पूछा।
"वापिस दिल्ली जा रहा हूं।"
"घर मिलने भी नही आये और फोन भी नही किया? बहन से नाराजगी दूर नही हुई अब तक?"
"गलत सोचती हो बहन। नाराजगी कुछ नही है। सुबह कंपनी के काम से आया था और शाम वापस जा रहा हूं। काम समाप्त होने के बाद समय नही मिला।" हरी ने बहन सरिता को स्पष्टीकरण दिया।
"भाई सब बंगलुरु गए हैं। मैं भी वही जा रही हूं। सास की तबीयत ठीक नही है। बड़े भाई साहब के घर हैं। कभी भी अंतिम सांस ले सकती है। तुम्हारे जीजा एक सप्ताह से बंगलुरु में हैं।" सरिता ने हरी को बताया।

आज लगभग दस वर्ष बाद हरी और सरिता मिले। पचपन का हरी और उसकी बड़ी बहन सरिता इकसठ वर्ष की। हरी नौकरी पेशा की आर्थिक स्थिति व्यापार जगत में विशेष स्थान रखने वाली बहन और बहनोई के मुकाबले कुछ नही थी। बच्चों की उच्च शिक्षा और विवाह के लिए धन अर्जन खातिर अपनी इच्छाओं को दबा देता था।

दस वर्ष पहले धनी बहन-बहनोई की बड़ी पुत्री के विवाह पर हरी कुछ अधिक उपहार नही दे सका जिस कारण विवाह समारोह पर सरिता की सास के तानों पर हरी बहन-भाई के नाजुक रिश्ते की अहमियत को ध्यान में रखते हुए चुप रहा लेकिन अपनी सास और दूसरे बड़े-बूढो के आगे सरिता ने भी खरी-खोटी सुना दी कि खाली हाथ आने से अच्छा नही आता तो अच्छा होता। कम से कम उसे ताने तो नही सुनने पड़ते। हरी अपनी हैसियत से अधिक उपहार लेकर गया था लेकिन बहन सरिता की सास और दूसरे बड़े-बूढों की नाक के नीचे नही उतरे। हरी मौके और रिश्ते की नजाकत समझता था और चुपचाप खून का घूंट पी लिया। उस दिन के बाद वह बहन से कभी नही मिला और फोन भी नही किया।

बहन-भाई का रिश्ता टूट गया।

आज दस वर्ष बाद सरिता की सास अंतिम सांस ले रही है। एयरपोर्ट पर दोनों की मुलाकात अचानक हो गई। दस वर्ष की कुट्टी के पश्चात दोनों की मन की खटास खुद दूर हो गई यह कुदरत का करिश्मा ही रहा।
"बहन खड़े-खड़े थक जाओगी। चलो बैठ कर बात करते हैं।" दोनों की फ्लाइट उड़ने में समय था। एक घंटे तक दोनों परिवार की कुशल पूछते रहे और अपने दिल का हाल बांट कर पुराने गिले शिकवे भुलाते रहे। समय ने दोनों को दूर किया और अचानक मिलवा कर नजदीक किया। दोनों ने पिछले दस वर्षों में कभी नही सोचा था कि फिर कभी कहीं इतनी आत्मीयता से मिलना होगा। फ्लाइट का समय हो गया। हरी दिल्ली गया और सरिता बंगलुरु चली गईं।

समय की व्यस्तता के कारण हरी पत्नी से सरिता के मिलने का जिक्र ही नही कर सका। सुबह जल्दी ऑफिस जाना और रात देर से घर वापिस आना। रविवार की छुट्टी पर हरी ने पत्नी से सरिता के मिलने का जिक्र किया। पत्नी हरिता चुप रही। उसने कोई प्रतिक्रिया नही की। विवाह समारोह में अपने पति का अपमान वह नही भूली थी। हरी ने सरिता को माफ कर दिया था हालांकि बोलचाल दस वर्ष बाद हवाई अड्डे पर हुई लेकिन हरिता ने ननद सरिता और उसकी ससुराल को अभी भी माफ नही किया था। हरिता के मन की दशा भांप कर हरी ने बात आगे नही बड़ाई।

एक सप्ताह बाद रविवार के दिन टेलीफोन की घंटी बजी। हरी बाजार से फल-सब्जी लेने गए थे। हरिता ने फोन उठाया।
"भाभी।" हरिता की आवाज सुन सरिता ने कहा।
हरिता कुछ नही बोली। फोन कान पर लगाये चुप रही। उसकी आंखे नम हो गई। सरिता की सास के निधन का समाचार सुनकर हरिता रो पड़ी।
"भाभी रोते नही हैं। क्या मुझसे अभी भी नाराज हो?" सरिता का गला रुंध गया।
"नही दीदी। कोई नाराजगी नही। उठाला कब है?" हरिता ने पूछा।
"बुधवार को बंगलुरु में है।"
इतना सुन हरिता ने फोन रख दिया। सरिता समझी कि हरिता अभी भी नाराज है। सरिता की सास की मृत्यु  पर हरिता के मन में सभी गिले शिकवे दूर हो गए। गिले शिकवे की जो वजह थी वही चली गई तब किस बात की नाराजगी। सास और दूसरे बुजुर्गों के आगे सरिता बेबस थी। हरिता सब समझती थी। उसकी नाराजगी भाई-बहन के संबंध तोड़ने पर थी। सरिता ने राखी भी भेजनी छोड़ दी थी। बांधने नही आती लेकिन डाक से भेज तो देती। दस साल से सरिता ने हरी को राखी भी नही भेजी थी।

हरी फल-सब्जी लेकर घर आये। हरिता ने सरिता की सास की मृत्यु का समाचार दिया।
"हरी हमें उनके उठाले पर जाना चाहिए। तुम टिकट बुक करवा लो।"
"क्या तुम जाना चाहती हो?" हरी ने हैरत से पूछा।
"गमी के मौके पर हमें अवश्य जाना चाहिए। पूरी उम्र नाराजगी के बोझ के साथ नही जीना चाहिए। कारण चला गया, नाजरगी भी जानी चाहिए।"

हरिता ने अपने आने की सूचना सरिता को दी। सूचना सुन कर सरिता की आंखों में आंसू गए।
सरिता की सास के उठाले पर हरी और हरिता को देख सरिता अति प्रसन्न हुई। गले लगा कर भाई-भाभी का स्वागत किया। जिन बुजुर्गों ने हरी का मजाक सरिता की सास के साथ मिल कर उड़ाया था वे आज चुपचाप दांतों तले उंगली दबा कर हैरानी से देख रहे थे। आज बुजुर्गों की परवाह किये बिना हरी के बहन-बहनोई ने सबके सामने गले लगा कर स्वागत किया। रिश्तों पर दबी बर्फ पिघल गई। हैरान परेशान बुजुर्गों के सामने हरी और हरिता के मुख पर आत्मविश्वास की मुस्कान थी।



नाराजगी

हवाई अड्डे पर समय से बहुत पहले पहुंच गया। जहाज के उड़ने में समय था। दुकानों में रखे सामान देखने लगा। चाहिए तो कुछ ...