Sunday, April 28, 2013

Prayer (Mrtyunjaya Mantra - मृत्युन्जय मन्त्र)



मृत्युन्जय मन्त्र

ओम त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम पुष्टिवर्धनम
उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात

तीन नेत्रो वाले, सुगन्ध से युक्त तथा उत्तम स्वास्थय प्रदान करने वाले शिव जी की हम पूजा करते हैं। जैसे ककडी जो पकने के पश्चात बेल से स्वत: ही अलग हो जाती है उसी प्रकार हमें मृत्यु के बंधन से मुक्त करवा कर अमरत्व प्रदान करें।

Mrtyunjaya Mantra

Om! (O, God)
We worship Lord Shiva having three eyes, who is full of fragrance and who gives good health to all. May He liberate me from death granting me immortality just as the ripe fruit cucumber (kakri) is severed automatically from its creeper.

Friday, March 29, 2013

नवगांव


नवगांव

नाम नवगांव, सुनने में ऐसा प्रतीत होता है, कि जैसे कोई आधुनिक सुख सुविधायों से लैस गांव होगा, लेकिन नाम में क्या रखा है। नाम नवगांव सिर्फ नाम ही है, किसने रखा होगा, क्या सोच कर रखा होगा, किसी को नही पता होगा। एक छोटे से गांव का कौन इतिहास रखेगा। मुख्य राष्ट्रीय राजमार्ग से कटती पतली सी सडक आगे जा कर छोटी छोटी पहाडियों में से गुजरती हुई कच्ची सडक में बदल जाती है। लगभग लगभग पांच वर्ष पहले चुनावों के समय की बात है, कि सेठ द्वारका नाथ की बदौलत पक्की सडक बनी थी, फिर किसी ने बेचारी सडक रानी की सुध नही ली। सेठ द्वारका नाथ दो साल पहले स्वर्ग सिधार गए, उससे पहले बीमारी के चलते नवगांव आ नही सके। बरसातों में सडक की हालात बिगडते रहे और आज टूटी फूटी हाल सिर्फ इतिहास के पन्ने की कहानी बन गई, कि कभी पक्की सडक होती थी, जहां सेठ जी की मोटर कार दौडा करती थी।

छोटी पहाडियों के नीचे नवगांव है, कुल इक्कासी मकान। सडक के दोनों ओर छोटे छोटे, कुछ पक्की छत के साथ, तो कुछ कच्ची छत के साथ मकान। सडक के दाई तरफ तीस मकान, सभी हिन्दुऔ के, तो दूसरी और बाई तरफ पचास मकान मुसलमानों के। जहां सडक समाप्त होती है, वहीं सेठ द्वारका नाथ की दो एकड में बनी कोठी। सभी बाशिंदे शहर वालों की कोठी के नाम से जानते और पुकारते हैं। कोठी के बाद गांव समाप्त, न कोई सडक, न कोई पगडंडी।

गांव के अधिकतर लोगों का पेशा दूध बेचना, कुछ के छोटे, छोटे बगीचेनुमा खेत, जहां सब्जियां उगती है। गाय, भैंस लगभग सभी के पास हैं। सुबह, शाम दूध निकालते है, अपनी खपत का दूध रख कर बाकी सहकारी समिती को बेचा जाता है। सेठ द्वारका नाथ ने गांव वालों को सहकारी समिती का मेंबर बनवाया, जिसकी गाडी हर रोज सुबह, शाम दूध ले जाती है। शहर से आढती सब्जियां खरीदता। सभी गांव वाले सेठ द्वारका नाथ को भगवान का दर्जा देते थे, जिन्होने गांव वालों के लिए उनके दरवाजे पर ही आमदनी का प्रबंध करवाया, नही तो उनको दूर शहर जाना पढता था। सभी खुशहाल है, अमीर तो नही, गुजारे लायक सभी के पास पैसे थे, छोटे से गांव में कुछ सौ बाशिदों इसी में खुश रहते हैं और सेठ जी को दुयाएं देते नही थकते। हर बात पर सेठ जी की मिसाल देते नही थकते हैं। आखिर करने को क्या है, पूरे दिन, सुबह से शाम तक। सुबह दूध निकाल कर सहकारी समिती की गाडी को देना है, फिर गाय, भैंस की देखभाल। सारा दिन कुछ और काम नही। कुछ इधर की, कुछ उधर की गपशप। घरों के आगे चारपाई डाल कर बैठ कर हुक्का, बीडी पीते हुए समय व्यतीत होता है। पढाई लिखाई से किसी को कोई सरोकार नही। पास के गांव में स्कूल है, जो बच्चा, जब तक पास होता है, पढता रहता है, फेल होते ही स्कूल क्या होता है, किसी को कोई सरोकार नही। दो बच्चे पढ गए, शहर रहने चले गए। गांव में सोच गहरी बैठ गई, बच्चों को अपने से दूर करना है, तो ज्यादा पढाऔ। शाम को सहकारी समिती की गाडी ने फिर आना, दूध लेना। सब्जी आढती सप्ताह में दो बार आकर सब्जी ले जाता था।

कम पढे लिखे गांव निवासियों कम आमदनी के बावजूद आत्म संतुष्ट, सुख चैन से जीवन व्यतीत कर रहै हैं। सेठ द्वारका नाथ कैसे नवगांव में बसे। बब्बन जो सेठ जी कोठी का केयर टेकर पिछले बीस सालों से, जब कोठी बनी थी, बहुत चाव से, गर्व से, छाती चौडी करके बताता है, कैसे सेठ द्वारका नाथ ने कोठी बनाई और रहना शुरू किया।

बीस साल पहले बब्बन गरीबी से परेशान शहर में कोई काम तलाशने के लिए गांव से निकला और मुख्य राजमार्ग पर बस की प्रतीक्षा कर रहा था। सेठ द्वारका नाथ की कार बस स्टाप से कुछ पहले पंचर हो गई थी। ड्राईवर कार का पहिया बदलने के लिए कोशिश कर रहा था, लेकिन पहिए के नट जाम होने के कारण वह पहिया बदल नही सका। किसी मदद के लिए बस स्टाप तक आया, जहां सिर्फ बब्बन बस की प्रतीक्षा में सो गया था। ड्राईवर ने बब्बन को झंझोर कर उठाया। बब्बन ने ड्राईवर की मदद की। पहिया बदला गया।

सेठ जी ने बब्बन से पूछा – कहां रहते हो।
बब्बन – थोडा अंदर गांव में रहता हूं।
सेठ जी – क्या नाम है, गांव का।
बब्बन – नवगांव नाम है।
सेठ जी – शाम हो गई है, कहो तो तुम्हे घर छोड दें।
बब्बन – मैं तो शहर जाने के लिए बस की प्रतीक्षा कर रहा हूं। यहां काम है, नही। पैसे की तंगी है। अब्बा कर्ज में डूबे है। काम की तलाश में शहर जा रहा हूं।
सेठ जी – चलो, कार में बैठो। शहर छोड दूंगा।

सेठ जी की पारखी नजरों ने बब्बन की शराफत पहचान ली, अपने कारखाने में उसको नौकरी दी। एक बार सेठ जी की तबीयत खराब हो गई। डाक्टर ने हवा पानी बदलने को कहा। फैमिली डाक्टर गुप्ता थोडा मजाकिया भी थे।

सारा दिन गल्ले पर बैठा रहता है। लक्ष्मी चंचल है। पतली गली से कब निकल कर मेरे पाल आ जाएगी, तुझे पता ही नही चलेगा। थोडा हिल स्टेशन भी घूमा कर। जा मैं तुझे देखने वही मिलता हूं।

सेठ जी ने डाक्टर की सलाह मान कर हिल स्टेशन की ओर प्रस्थान किया। रास्ते में बब्बन ने कहा।

सेठ जी, रास्ते में कुछ देर आराम मेरे गरीब खाने में कीजिए।

सेठ जी ने ड्राईवर ने नवगांव रूकने का कहा। राजमार्ग से मुडते सडक पतली होती गई, फिर कच्ची सडक नवगांव पर समाप्त हो गई। बब्बन के सेठ गांव आए है, पूरा गांव बब्बन के घर एकत्रित हो गया। बब्बन का परिवार गर्व से फूले नही समा रहे थे। सेठ जी के चर्चे पहले ही बब्बन मशहूर कर चुका था। गांव निवासियों के लिए सेठ द्वारका नाथ किसी भगवान से कम नही थे। भीड छटी, सेठ जी घर के बाहर चारपाई पर विश्राम करने लगे।

बब्बन ये छोटी पहाडियां ठलते सूरज की रौशनी में बहुत खूबसूरत दिख रही है, वहां जाने का रास्ता कहां से है।
बब्बन – सेठ जी, गांव के बाद कोई रास्ता नही है। छोटी पहाडियां पर कोई नही रहता है, और न कोई रास्ता है।
सेठ जी – बब्बन, मालूम नही क्यों, ये छोटी पहाडियां देख कर दिल कहता है, यहीं बस जाऊं। रात में यहां मैं क्या रूक सकता हूं। में यहां की सुबह देखना चाहता हूं।
बब्बन – सेठ जी, यह तो हम्हारा भाग्य है, कि कृष्ण सुदामा के घर रहेगें।

पूरा गांव सेठ जी की आवभगत में जुट गया। ठीली सी चारपाई में सेठ जी आराम करने लगे। पौ फटते सेठ जी पहाडियों की ओर चल पडे। उगते सूरज की किरणें पहाडी पर पडती रही, हल्के ग्रे से गुलावी फिर औरेंज, नांरगी रंग से बदलते नजारे ने सेठ द्वारका नाथ को मंत्र मुग्घ कर दिया।

बब्बन से पूछा जहां गांव के मकान समाप्त होते है, वह जमीन किस की है।
बब्बन – पहाडी तक खाली जमीन गांव की है।

बस फिर सेठ द्वारका नाथ ने उस जमीन पर कोठी बनाई और बब्बन को केयर टेकर बना दिया। 

Sunday, March 03, 2013

कल्याण प्रार्थना Welfare Prayer


कल्याण प्रार्थना

असतो मा सदगमय
तमसो मा ज्योतिर्गमय
मृत्योर्माअमृतं गमय
सर्वेषां शान्तिर्भवतु
सर्वेषां स्वस्तिर्भवतु
लोका: समस्ता: सुखिनो भवन्तु
सर्वे भवन्तु सुखिन:
सर्वे सन्तु निरामया:
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कशिचद दुखभाग्भवेत

(हे प्रभु)
मुझे असत से सत की ओर ले चलो
मुझे अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलो
मुझे मृत्यु से अमृत की ओर ले चलो
सब को शान्ति मिले
सब का भला हो
सारे लोक सुखी हों
सब सुखी हों
सब निरोग हों
सब कल्याणमय हो
कोई दुखी न हो

Welfare Prayer

(O, God)
Lead me from non-existent to the existent
Lead me from darkness to the light
Lead me from death to Immortality
Let all be healthy
Let all be bestowed with peace
Let all be blessed
Let all planets be happy
Let all be happy
Let everyone be free from disease
Let all may look for welfare and prosperity
None may suffer

Wednesday, February 27, 2013

प्रार्थना Prayer


गणेशवन्दना

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ
निर्विघ्नं कुरू मे देव सर्व-कार्येषु सर्वदा

हे टेढी सूंड और विशाल शरीर धारी (गणपति महाराज) आप का तेज करोडों सूर्यों के समान है। हे देव (परमेश्वर) मेरे सभी कार्यों को सदा विघ्न (बाधायों) से (कृपापूर्वक) रहित कीजिए।

O, Lord Ganesha! Of curved trunk, of large body and with the brilliance of a million of suns. O God! (Ganesha) ward off obstacles from all ventures that I perform.

Sunday, February 24, 2013

नन्ही


नन्ही

नवजात शिशु के रोने की आवाज के साथ सीमा लेबर पेन को भूल गई। शिशु के जन्म होते डाक्टर ने नर्स को टाइम देखने को कहा। लडकी हुई है। यही बातें डाक्टर की सुनाई दी। थोडी देर बाद लेबर रूम के बाहर सुधीर प्रतीक्षा कर रहा था। नर्स के हाथों में नवजात शिशु को देख कर सुधीर तन कर खडा हो गया। लडकी हुई है। जहां सीमा लडकी के जन्म पर कुछ मायूस हुई थी, वहां सुधीर का चेहरा खुशियों से दमक गया। जेब से रूपये निकाल कर नवजात शिशु पर न्योछावर कर नर्स, वार्ड बाए, मेड को दिए।

एक राहत की सांस लेकर कुर्सी पर बैठ गया। मस्तिषक कुछ बीते दिनों का विशलेषण करने लगा। जिन्दगी के अजीबो गरीब रंग देख कर आज उसे किसी से कोई नाराजगी नही थी, बस हैरानी थी। उम्र कोई अठाईस साल में ही अनुभवों का खजाना हासिल कर लिया था। परिवार में सब को दौलत, गहनें, संपति मिली, उसे क्या मिला, सिर्फ शहर से दूर लगभग जंगल सी जगह में, एक गांव में जगह। बचपन में दादा जी के साथ नवगाव की कोठी में अक्सर गर्मियों की छुट्टियों में रहने आता था। दादा जी ने शहर से दूर एक छोटे से गांव में कोठी बनवाई थी, एक सैर गाह, आराम की जगह। प्रकृति के समीप सुधीर को बहुत अच्छा लगता था। दादा, पोता में एक सामानता थी, वह प्रकृति से प्रेम। इस कोठी में परिवार को और कोई स्दस्य रहने में रूचि नही दिखाता था। दादा जी एक साथ राशन डाल कर पोते सुधीर और एक रसोईये के साथ पूरी गर्मियों की दो महीने की छुट्टियां बिताते थे। दादा जी मरते समय कुटिया पोते सुधीर के नाम लिख गए, इसलिए सुधीर को एक आशियाना मिल गया। वरना कोई एक पाई भी सुधीर को देने को तैयार हुआ। सारे दोष मढ दिए, व्यापार में सब हिस्सा लेते थे। जब तक मुनाफा होता रहा, सुधीर सबसे अच्छा था, एक दो टेंडर हाथ से क्या निकले, सुधीर को निक्कमा घोषित कर दिया। दादा जी रहे नही, बडे भाई, बहनों ने सारा दोष सुधीर पर मढना शुरू किया, थोडे समय में माता पिता भी उसके विरूध हो गए। कमाऊ पूत सबके प्यारा लगता है। कमाऊ तो आज भी है, क्षमता पूरी है, लेकिन व्यापार में कभी मुनाफा, तो कभी घाटा। नुकसान उसके माथे मढना सुधीर के आत्म सम्मान पर चोट कर गया और उसने परिवारिक व्यवसाय से अलग होना ही उचित समझा। उसके हिस्से कुछ नही आया। खैरात पसन्द न थी। एक बार सोचा, कि मुकदमा कर दे, सबको नानी याद आ जाएगी। भगवान कृष्ण ने अर्जन को यही कहा था। कोर्ट कहचरी में सालों लग जाते है, फैसले आने में, समय और पैसे की बर्बादी अलग। वकील चांदी काटेगें। अगर वह उतना समय और पैसा व्यापार में लगा दें, तो अच्छा रहेगा। माता पिता को कोर्ट में घसीटना नही चाहता था। दूघ का कर्ज मुकदमा नही, नमस्तक हो कर अलग होने में ही है।

पुरानी यादों का सिलसिला दस मिन्टों बाद नर्स ने तोडा। आप रूम लीजिए, थौडी देर में रूम में शिफ्ट करेगें। रिसेप्शन में जाकर कमरा अलॉट करवाया। रूम में आकर गिलास उठाया, फ्रिज में से पानी की बोतल निकाली। पानी के दो गिलास पिए और फिर से कुर्सी पर धम से बैठ गया। फिर यादों में खो गया। निकम्मा है, सुधीर, कोई हक नही है, घर में सके रहने का। जब बटवारा हो गया, तो कहो इसे घर से जाए। देर किस बात की। रहने को अलग घर दे तो दिया है। बडे भाईयों की बात पर मां बाप ने भी सहमति जताई और कहा, कि प्रस्थान का समय आ गया है।

पापा, अठाईस साल आपके साथ रहा हूं, दो तीन महीने और रहने की अनुमति चाहता हूं। सीमा गर्भवति है, बच्चे के जन्म तक रहने की इजाजत चाहता हूं, बच्चे के जन्म के बाद मैं चला जाऊंगा।

भाई बहने तो उसे उसी समय रूकसत कराने पर तुले थे, पर सुधीर ने दो टूक कह दिया कि जोर जबरदस्ती से वह डरने वाला नही है। जब सबका एक तरफा नाइंसाफी का फैसला स्वीकार कर लिया है, वो भी यह स्वीकर कर लें। सुधीर के तेवर देख कर सब चुप हो गए।

आज सुबह अस्पताल आए। सीमा ने लक्ष्मी जैसी लडकी को जन्म दिया। सुधीर के सीने से एक चट्टान का बोझ उतर गया, कि आज के बाद एक स्वत्रंत जीवन व्यतीत होगा। आजाद पंक्षी की तरह आकाश में विचरण होगा। किसी के आधीन काम नही करना होगा, जो निर्णय होगा, उसका परिणाम, फल उसको मिलेगा। अच्छा, बुरा, नफा, नुकसान उसी का होगा। वह तो परिवार के साथ रहना चाहता था, लेकिन सब खिलाफ हो गए। खैर, जो प्रभु की इच्छा।

Tuesday, December 25, 2012

जय से दोस्ती


जय से दोस्ती


(यह कहानी 14 अक्टूबर 2012 को ब्लाग में प्रकाशित "रक्षा" से आगे निरंतरता में है)


नये सत्र में स्कूल का आज दूसरा दिन, जय अब पांचवी कक्षा में पहुंच गया। नये सत्र के पहले दिन बस दुर्घटना के कारण छुट्टी हो गई थी। सुबह प्राथना सभा के बाद नई कक्षा में सभी बच्चों ने अपनी अपनी सीटों पर बैठना शुरू किया। सभी छात्रों ने पिछली कक्षा के अनुसार सीटों का चुनाव किया। मैडम सहगल ने कक्षा में प्रवेश किया।
गुड मॉर्निंग मैम।
गुड मॉर्निंग स्टूडेन्टस। आज से आपका नया सत्र शुरू हो रहा है और आपका सीटिंग आपके रिजल्ट के हिसाब से बनाया गया है। जिन बच्चों के अधिक नंबर आए है, उनके साथ कम नंबर वाले बच्चों की सीटिंग की गई है।
सभी बच्चों को इस नए क्रम में बिठाया गया। रक्षित के साथ सीट खाली रही। रक्षित सोच में डूब गया, क्या वह अकेला बैठेगा। दो दो बच्चों की जोडी अच्छी रहती है। बच्चों में दोस्ती बनती है। आपस में पढाई से खेल कूद तक सभी में साझीदार बनते है।
मैम मेरे साथ कौन बैठेगा।रक्षित ने उदास हो कर पूछा।
रक्षित तुम्हारे साथ नया छात्र जय बैठेगा। वह एक होनहार और प्रतिभाशाली विद्यार्थी है। इसी सत्र में उसका दाखिला हुआ है।
तभी जय ने कक्षा में प्रवेश किया और मैडम सहगल ने उसे रक्षित के साथ बिठाया। जय रक्षित की उम्र का, लेकिन कद में थोडा लम्बा और बदन गठीला। एक पहलवान की तरह शरीर जय का। लंच अंतराल में रक्षित और जय में बातचीत हुई। दोनों ने अपने टिफिन खोले और नाश्ता करते हुए बाते करते रहे।
रक्षित – तुमने नया एडमिशन लिया।
जय – हां, कल में आया था, लेकिन छुट्टी हो गई थी।
रक्षित – तुम्हे पता है, कल बस दुर्घटना के कारण छुट्टी हुई थी। जिस बस में मैं आता हूं, उस बस का भी।
जय – अच्छा, तुम्हे चोट आई क्या?”
रक्षित – मुझे सुबह उठने में देर हो गई थी, मेरी बस छूट गई थी। पापा ने कार में स्कूल छोडा। यहां आया तो मालूम हुआ, कि बस दुर्घटना के कारण छुट्टी हो गई।
जय – देर से क्यों उठे। 
रक्षित – मेरे सपने में शेरां वाली मां आई थी, कहने लगी, कि पापा की कार में स्कूल जाना। मेरे साथ बहुत देर तक बाते करती रही, और इस कारण देर से आंख खुली। स्कूल बस छूट गई और मैं पापा की कार में स्कूल आया। शेरांवाली मां ने मुझे ऐक्सीडेन्ट से बचा लिया।
जय – तुमने सपना देखा होगा। शेरावाली तुम्हारे सपने में कैसे आ सकती है।
रक्षित – सच्ची बोल रहा हूं। मेरे सपने में आई थी, मेरे से बहुत देर तक बाते करती रही। शेरांवाली ने मुझे बचाया है।
जय – तुम सच कह रहे हो।
रक्षित – एकदम सच। मैं झूठ कभी नही बोलता।
लंच अंतराल के बाद पढाई शुरू हो गई। स्कूल छुट्टी के बाद रक्षित रूट नंबर 5 की बस में बैठा। जय भी उसी बस में बैठा।
रक्षित प्रफुल्लित हो कर – जय तुम भी। कहां रहते हो।
जय – मैं सेक्टर 13 में रहता हूं।
रक्षित – मैं भी 13 सेक्टर में रहता हूं।
जय – कौन सी सोसाइटी में रहते हो।
रक्षित – मैं पिंक सोसाइटी में रहता हूं।
जय – में सूर्या सोसाइटी में रहता हूं।
रक्षित – वो देखो मेरी छोटी बहन रक्षा, तीसरी कक्षा में पढती है।
रक्षा अपने दोस्तो के साथ बाते करती आ रही थी और रक्षित के पीछे वाली सीट पर बैठ गई।
रक्षित – पहले कौन से स्कूल में पढते थे।
जय – मैं पहले बरेली में रहते था। मेरे पापा बैंक में काम करते है। अभी दिल्ली में हस्तांतरण हुआ है। तुम पहले कहां रहते थे।
रक्षित – मैं तो नर्सरी से इसी स्कूल में पढ रहा हूं।
बातों बातों में घर घर आ गया। सभी बस से उतरे। घर में घुसते ही रक्षित ने मां सारिका को जय के बारे में बताया, कि वह उसका देस्त बन गया है, तो रक्षा ने भी बताया, कि उसकी क्लास में वृन्दा ने नया एडमिशन लिया है और वह भी सेक्टर 13 में सवेरा सोसाइटी में रहती है। सारिका ने दोनों को कहा – पहले हाथ मुंह धो कर खाना खा लो, फिर अपने दोस्तों के बारे में बताना। तुम दोनों बहुत उत्तेजित हो, अपने नए दोस्तों से मिल कर।
क्योंकि मैडम ने हमें एक ही सीट में बिठाया है। रक्षित और रक्षा दोनों एक ही स्वर में एक साथ बोले।    

Sunday, December 16, 2012

तैयारी

शहर से दूर प्रकति की गोद में छोटी छोटी पहाडियों के बीच एक छोटा सा गांव, जिसका नाम नवगांव। गांव के अंतिम छोर पर छोटे छोटे मकानों की पंक्तियों के बाद एक कोठी शहर वालों की कोठी के नाम से मशहूर, जिसके गेट पर द्वारकानाथ अंकित है। शहर के धनी सेठ द्वारकानाथ ने शहर से दूर नवगाव में आराम के लिए एक कोठी का निर्माण करीब तीस वर्ष पूर्व किया। जब बच्चे बढे हो गए, व्यापार संभाल लिया, तब द्वारकानाथ ने अपना निवास नवगांव में कर लिया। आज द्वारकानाथ नही है, उनके स्वर्गवास को दो साल हो गए, तब से कोठी लगभग वीरान ही है। द्वारकानाथ के पौत्र सुधीर कभी कभी एक दो दिन के लिए आते थे। कोठी की देखभाल पुराने नौकर बब्बन करते है। बब्बन वहीं नवगांव के निवासी को नौकर कहे या केयरटेकर, कुछ भी कह सकते हैं। द्वारकानाथ के स्वर्ग सिधारने के बाद शायद ही किसी ने नवगांव की कोठी की सुध ली हो।

प्रकृति से प्यार करने वाले ही नवगांव की कोठी की परख कर सकते थे। दो एकड के क्षेत्रफल में फैली कोठी को सेठ द्वारकानाथ ने बडे लगन, चाव और मेहनत से बनवाया था। आठ फुट ऊंची दीवारों के ठीक बीचों बीच साधारण किन्तु सभी सुविधायों से युक्त रहने के लिए  चार बेडरूम के साथ बाथरूम, एक बडी बैठक, एक मेहनानों के लिए कमरे के साथ रसोई। मेन गेट से सीधे कोठी के लिए मोटर का पक्का रास्ता। कोठी के एक तरफ खूबसूरत बगीचा और दूसरे तरफ खेत में सब्जियां। चारदीवारी के साथ साथ फलदार वृक्ष। पपीता, केला, जामुन, अमरूद के वृक्ष फलों से लदे हुए एक अदभुद अनोखी सी छटा प्रदान करते है।

बब्बन को आज कान खुजाने की भी फुरसत नही थी। कोठी की साफ सफाई में पूरी तरफ व्यस्त। गांव के कुछ नौजवानों को भी काम पर लगा रखा था।

बब्बन मियां थका दिया आपने। मालिक आपके आ रहे है, थका हमें दिया। दोपहर हो गई। खाना तो खिलाऔ, मियां। अब तो खाना खा कर आराम करेगें। बाकी काम कल करेगें। सुजाद की यह बात सुन कर बब्बन भडक गया। कल के छोकरे दो मिन्टों में थक जाते हैं। कामचोर हो। जरा सा काम बता दो, बहाने निकालते हैं। ठेर सारा काम क्या तुम्हारा बाप करेगा। बब्बन गुर्राया।

बब्बन का बात पर सुजाद ने भी फिकरा कस दिया - बाप से ही करा लो। मैं तो चला। कह कर सुजाद उठा और आवाज लगाई, चलो शमशाद, कबीर और मुस्तफा, चलो। बब्बन मियां सठिया गए है। भोजन करने नही दे रहे है। भूखे पेट भजन नही गौपाला। मियां बब्बन अपने आप कर लेगें।

सबको उठता देख बब्बन थोडा नरम हुएष सुजाद का हाथ पकड कर बोले – बच्चे के बच्चे रहोगे। बडे कभी मत बनना। काम को क्या कह दिया, रोटी याद आ गई। खुदा गवाह है। बब्बन ने कभी किसी को भूखा नही रखा है। अगर हिसाब लू तो रोटी भूल जाऔगे। पेडों से कितने अमरूद, पपीते, केले और जामुन तोड तोड कर खाए हैं।

सुजाद कौन सा कम था। बब्बन पर रौब डालने लगा – मियां बब्बन, तोते चोंच मार कर खराब कर दे, वो अच्छा, हमने दो, चार क्या तोड लिए। हिसाब करने लगे।

सुजाद को गर्म देख बब्बन ने कहा – आधे घंटे की मोहलत दे दे, सुजाद, खाना यहीं बन रहा है। चलो आधा घंटा आराम और फिर खाना गरमा गरम। लेकिन याद रहे, काम आज ही खत्म करना है। कल की बात नही सुनुगा।

पूरी रात लगा देगें, मियां बब्बन लेकिन एक शर्त है, रात को एक एक पउआ मिलना चाहिए। सुजाद ने बब्बन के कान में कहा।

तौबा तौबा, कल के पैदा हुए लौंडे बाप समान बब्बन से पउआ मांगते है। अपने बाप से मांग जाकर। बब्बन ने एक लात सुजाद को लगाई।

सुजाद थोडा नरम हो गया – बाप की उम्र के हो, इसलिए छोड देता हूं, लेकिन पउआ लूगां जरूर।
तौबा तौबा। लौंडे बिना पउए के मानेगें नही – बब्बन ने एक लात सुजाद को और लगा दी।
कितनी लातों के बाद पउआ दोगे – कह कर सुजाद टांगे पसर कर वही लंबा लोट गया।
कुछ मिन्टों बाद बब्बन ने आवाज लगाई – उठ सुजाद और अपने लौडों को भी कह, खाना खा ले।
खाना तो खाना ही है, पहले पउए का पक्का कहो – लेटे लेटे ही सुजाद बोला।
भूत छोडे, पिशाच छोडे, मगर बिना पउए के तू ना छोडेगा। तौबा, तौबा – कानों को हाथ लगा कर बब्बन ने कहा, ले लेना पउए के पैसे।

यह सुन बिजली की तेजी जैसी फुर्ती सुजाद के बदन में आई और आवाज लगाई – उठो लौडों, खाना खा कर कमर कस लो, काम शाम से पहले पूरा नही किया, तो खाल में भूसा भरवा दूंगा।
खाना खाने के बाद सभी काम पर जुट गए। शाम तक कोठी की सारी सफाई कर दी। दो साल बाद कोठी चमकने लगी। जाने से पहले सुजाद ने बब्बन को पकड लिया – पउए के पैसे।
बाप से भी पैसे मांगते हो पउए के – बब्बन पैसे देते हुए बोला।

बाप भी तो रोज पीता है। शर्म कैसी। बेटे जवान हो जाते है, तो बाप के साथ बैठ कर पीते हैं। - सुजाद की यह बात सुन कर बब्बन बडबडाने लगा – यह सब फिल्मों की सोहबत है। बिगाड दिया है, फिल्मों के साथ टीवी सीरियलों ने।
बडबडाते बब्बन से सुजाद ने चुटकी ली – कुछ कहा क्या।

तौबा, मेरे बाप की तौबा, कि बरखुरदार आप से कुछ कह दूं। मैं तो सोच रहा था, कि कल क्या करना है। - बब्बन ने बात पलटी।

मन ही मन सुजाद ने कहा – साला बुड्ढा, कुडता है हमारे से। काम करवाना है, तो हमारी माननी पडेगी।

अगले तीन चार दिनों तक जी जां एक कर बब्बन के नेतृत्व में सभी ने कोठी को चमका दिया। दो वर्ष तक धूल चाटती कोठी आज बोलने लगी – मुझे साफ सुधरा रखो, मुझसे बात करो, मैं चार दीवार नही हूं, आपका सदस्य हूं। आपका अंग हूं। आपके संग हूं। नवगांव के सभी बाशिन्दे कोठी को आकर देख रहे थे, जैसी वह किसी शहर की इतिहास से जुडी पुरानी इमारत हो। नवगांव के लिए तो यह किसी किले से कम नही। सभी जुबां पर यही बात थी, कि कोठी में मालिक रहने आ रहे है, यह नवगांव के लिए शुभ खबर है। पहले जब भी सेठ द्वारकानाथ रहते थे, नवगांव की भलाई, तरक्की के लिए कुछ न कुछ करते रहते थे। शहर में बडे अफसरों से मिलते थे। ट्यूबवैल लगवा दिए। सडके बनवा दी। बिजली का काम भी करवाया, यह और बात है, कि चाहे दो घंटे आए। नवगांव का हर नागरिक कोठी में रहने के लिए आने वालों का बेसबरी के साथ स्वागत करने को तैयार था।