Tuesday, January 16, 2018

परिंदे की ऊंची उड़ान

परिंदे की ऊंची उड़ान से जलन होती है
प्रभु ने हमें पंख क्यों नही दिए हैं
सिर्फ ख्वाब में ही उड़ते है हम
हकीकत में धम से गिरते हैं हम
दूर जाकर भी परिंदे लौट आते है
शाम होते अपने घर
दूर बस जाते हैं अपने आशियाने से
कभी नही लौटते हम अपने घर



शौषण


ऑफिस पहुंच कर रोहन को कुछ अजीब लगा। उसे अहसास हुआ कि सारी निगाहें उसकी ओर अजीब सी चुभन के साथ घूर रही है। गुड मॉर्निंग का जवाब भी आधे साथियों ने बेमन दिया। अपनी सीट पर बैठा ही था कि एचआर हेड ने अपने केबिन में बुलवाया।
"रोहन तुम्हारे खिलाफ यौन शौषण की शिकायत है।"
"क्या?" रोहन चौंक गया। "किसने शिकायत की?"
"रायमा ने शिकायत दर्ज की है। जब तक इस शिकायत पर समिति कोई निर्णय नही लेती। आप ऑफिस नही सकते। जांच समिति आपको समय और तिथि बता देगी। समिति के सामने आपको अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिलेगा।"
रोहन की तरह रायमा को भी ऑफिस आने की मनाही थी। रायमा कैसे उस पर इल्जाम लगा सकती है। ऑफिस से निकल कर रोहन ने रायमा से फोन पर बात करनी चाही लेकिन फोन नही मिला। रोहन उसके घर गया लेकिन वह वहां भी नही मिली।
निर्धारित तिथि पर रायमा - "चार दिन पहले ऑफ्फिशल टूर पर कंपनी के गेस्ट हाउस में रोहन ने जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाए।"
रोहन चिल्लाया "यह झूठ है। खुद अपनी मर्जी से मेरे पास आई थी। हमारे शारीरिक संबंध कई बार बन चुके हैं। कभी जबरदस्ती नही हुई।"
एचआर हेड - "कंपनी के ऑफ्फिशल टूर पर कंपनी के गेस्ट हाउस में यह हरकत बर्दास्त से बाहर है। चाहे तुमने आपसी रजामन्दी से शारीरिक संबंध बनाए हो या जबरदस्ती। तुम्हे बर्खास्त किया जाता है।"
बाहर आने के पश्चात लुटे पिटे रोहन ने रायमा से पूछा "ऐसा क्यों किया मेरे साथ?"
"मेरी शादी तय हो गई है और मैं तुमसे छुटकारा चाहती हूं। अब तुम मेरे बारे में सपने में भी नही सोच सकते।"
रोहन चुपचाप सोचते हुए आगे बढ़ गया कि रायमा ने उसका शौषण क्यों किया।



Friday, January 12, 2018

बचपन

वो उन्मुक्त बचपन
वो खेलता बचपन
पतंग उड़ाता बचपन
तितलियां पकड़ता बचपन
पढ़ने के बहाने ढूंढता बचपन
याद आता बचपन
बस अब सबकी सुनते हैं
अपने मन की कहां कर पाते हैं
अफसर की झिड़की पत्नी के ताने
संवारना है बच्चों का जीवन
बूढ़ा होता शरीर सोचता है

वो उन्मुक्त बचपन

Thursday, January 11, 2018

सर्दी

धुंध की चादर ने लपेट लिया
ठंड ने कोहराम मचा दिया
क्यों भूलते हो माघ माह को
सर्दी ने जुकाम लगा दिया


माया

उसको देखा
बहुतों को देखा
सब का रहन सहन देखा
स्वयं को नही देखा
देखा उनको
स्वयं पर क्रोध आया
उन जैसा बन पाया
बस आगे बढ़ना है
यही सोच लिया
पर प्रकृति ने एक
छोटा सा झटका दिया
उठ माया है वो
मत भागम भाग कर
जहां रखा तुझको

संतोष कर

परिंदे की ऊंची उड़ान

परिंदे की ऊंची उड़ान से जलन होती है प्रभु ने हमें पंख क्यों नही दिए हैं सिर्फ ख्वाब में ही उड़ते है हम हकीकत में ...