Sunday, December 26, 2010

ब्लू टरबन

टीवी पर न्यूज देखते हुए न जाने अचानक बचपन की यादें ताजा हो गई। समाचार पत्र में भी वोही न्यूज कुछ दिनों से सुर्खियों में चल रही थी। औफिस की भागादोडी में सुबह घर से जल्दी निकल कर रात को देर से आना रूटीन बन गया था। यह मार्च का बहुत ही जालिम होता है, अकांउन्टेंटों के लिए। दम भर की फुरसत नही मिलती, सच कहा जाता है, कान खुजाने का भी समय नही होता। 31 मार्च को वितीय वर्ष समाप्त होता है, सारा पेंङिग काम पूरा करना है. मैनेंजमेंट को प्रोफिट लोस अकाउन्ट और बैलेंस शीट बना कर देनी है। मैनेंजमेंट ने तो कह दिया, कंमप्यूटर है, देर किस बात की। कौन समझाए कि काम तो आदमियों ने करना है। कम स्टाफ में इधर उधर के काम भी करने है, और अकाउन्टस का भी। समय पर कैसे हो काम। खैर छोङिए हर औफिस की यही कहानी। एक अप्रैल को काम समाप्त कर बैलेंस शीट मैनेंजमेंट को दी, शाबासी तो कौन सुसरा देता है, बातें सुननी पङी, एक दिन लेट हो गए, पूरी रात काम करते, तो 31 मार्च को तुम बैलेंस शीट बना सकते थे, लेकिन रात को सोना जरूरी भी है न। एक दिन धर नही जाते तो क्या हो जाता। जान तो नही चली जाती। तुम अकाउन्टेटों को यही बीमारी है, काम समय पर खत्म नही करते। लटका कर रखने की बीमारी है। कौन जानता है अकाउन्टेटों का दर्द। पिछले दस दिनों से घर नही गए, औफिस में ही कुर्सी पर पसर कर आधा एक घंटा आराम किया न किया, एक बराबर। बाईस बाईस घंटे काम किया, जिसका परिणाम सिर्फ डांट। खैर बैलेंस शीट सौंप कर दो टूक कह दिया, अब तीन दिन की छुटी चाहिए, शरीर ने जवाब दे दिया है। चाहे मैनेंजमेंट छुट्टी ही कर दे, लेकिन शरीर को भी आराम चाहिए। चौबीस घंटों मशीन, कंमप्यूटर भी चले, तो वो सुसरे भी हैंग हो जाते हैं। आदमी इस बात को नही समझता। उसका बस चले तो दिन के चौबीस घंटों में अडतालीस घंटे काम करवाए।

घर आ कर जो बिस्तर पर लेटा, तो चौबीस घंटे बाद भी नींद नही खुली। आंखें थोडी खुलती, लेकिन शरीर जवाब नही देता। पूरे छतीस घंटों बाद भी अलसाई सी हालात में उठा, टूथबस्र लेकर बाथरूम गया, दातों को साफ करने के बाद सोचा, नहा लिया जाए, तभी फ्रेस हुआ जा सकता है, वरना तीन दिन की छुट्टी तो नींद में ही गुजर जाएगी। वाकई नाहने के बाद एक दम तरो ताजा हो कर कमरे में आया, जहां श्रीमती जी पहले से ही विद्यमान थी। चाय का कप एक हाथ में था, और दूसरे हाथ में एक बिस्कुट। चाय की धीमी सी चुस्की लेकर मन्द मुस्कुराहट के साथ कुछ व्यगंयात्मक अंदाज में बोली, “नींद से जाग ही गए, कुंभकरण के खानदान से ताल्लुक रखने वाले।“

“भारतीय पत्नियों की मानसिकता कभी बदल नही सकती।“ मैंने कुर्सी खींच कर बैठते हुए कहा।“

“इसमें भारतीय पत्नियों की बात कहां से आ गई। दो दिन खर्राटे मारते हुए कुंभकरण की नींद सोए, मैंने न तो आपको जगाया, न ही तंग किया।“

“ताना मार कर भारतीय पत्नी की मानसिकता तो दर्शा ही दी। यह न सोचा, बीस दिन रात की थकान कम से कम दो दिन आराम के बाद ही तो खुलेगी।“

“ऐसी नौकरी का फायदा, जो घर की शक्ल ही भुला दे। जीनत अमान ने रोटी कपडा और मकान में बिल्कुल सही गाना गाया था, तेरी दो टकिया दी नौकरी, मेरा लाखों का सावान जाए। छोड तो ऐसी नौकरी, ढूंढ लो कोई दूसरी नौकरी। चाहे कम पैसे मिले, चैन तो हो, जब हम तुम दो पल सुकून से बैठ कर बातें कर सके।“

“कार लोन की किश्त अगले साल खत्म हो जाऐगी, तब दूसरी ढूंढूगा। सर पर बोझ नही होगा।“

“अभी से ढूंढना शुरू करो, तब अगले साल तक मिल जाऐगी, वरना मेरा अकेले इस मकान में दम घुट जाएगा। ये तो भारतीय पत्नियों का शुक्र करो, जो ऐसे पतियों के साथ जन्म जन्म का साथ निभाती हैं। अगर अमेरिका या यूरोप में रह रहे होते तो कब का तलाक हो गया होता।“ पत्नी ने मुस्कुराते हुए कहा।

मैं थोडा खीझ सा गया। “अब इस बात में अमेरिका, यूरोप किधर से आ गए।“

“बस आ ही जाते हैं, जब पत्नियां चारों तरफ से हाताश हो जाती हैं, और कुछ भी नजर नही आता है। तब सोचना ही पढता है और अमेरिका, यूरोप की पत्नियों की याद आ जाती है।“

मैंने इस टॉपिक को बंद करना ही बेहतर समझा और बात घुमाते हुए पूछा “चाय मिलेगी या उसके लिए अमेरिका, यूरोप जाना पढेगा।“

“क्या हसीन सपने आ रहे थे, अमेरिका, यूरोप के। सारे तोड दिये। चलो भारतीय पत्नी धर्म निभाते हैं।” कहते हुए पत्नी रसोई की तरफ चल पडी।

पत्नी के रसोई जाने पर मैंने अखबार उठाया और टीवी पर न्यूज चैनल लगाया। मुख्य पृष्ठ पर कुछ पाकिस्तान से आए सिख परिवारों की थी, जो स्वात घाटी, जहां तालीबान के कहर से बचने के लिए अमृतसर आ गए और भारत सरकार से भारत में बसने के लिए अनुरोध कर रहे ङैं। टीवी न्यूज चैनल पर भी यही खबर दिखाई जा रही थी। अपना घर छोड कर विस्थापितों की दशा मैं अच्छी तरह समझ सकता था। अपना घर, अपना व्यापार छोड कर दूसरी जगह बसना कोई आसान काम नही हैं, फिर भी हालात ऐसै हो जाते हैं, मजबूरी में घर छोड कर कहीं दूर अनजान जगह बसना पडता है। विस्थापित परिवार गुरूद्वारे में शरणार्थित बने रह रहे थे। खबर सुन और पढ कर अपना बचपन याद आ गया। उम्र उस समय लगभग पांच या छः वर्ष रही होगी, लेकिन घटना अभी भी मस्तिषक पटल पर अंकित है। वजह, कि माता पिता से बचपन में अनगिनत बार उस घटना को सुन चुका हूं। साथ कुछ रह रह कर घटना मस्तिषक के किसी कोने से बार बार निकल आती है। जब भी ऐसी कोई खबर सुनता हूं, तो वो घटना खुद ही ताजा हो जाती है।

पिताजी किसान थे। भारत पाकिस्तान सीमा के नजदीक गांव था। 1971 की जंग से पहले माहौल बहुत गर्म था, हांलाकि सर्दियां शुरू हो चुकी थी। धम्म घम्म धम्म धम्म की चारो तरफ से आवाजे आने लगी। साथ ही अडो़स पडोस से आवाजे आई कि भागौ, बम गिर रहे हैं। रात का समय था, लगभग आठ बजे का आसपास समय रहा होगा। रात का भोजन समाप्त कर चुके थे। घर के बरामदे मे मैं खाट पर बैठा हुआ आसमान में तारे निहार रहा था और माता पिता का इन्तजार तक रहा था, कि वे भी घर का काम निबटा कर आ जाए तभी सोने के लिए खाट पर लेटुंगा। अकेले सोने पर डर लगता था। नींद तो आ रही थी, लेकिन सो नहीं रहा था। पांच साल की उम्र में घबरा गया, लेकिन अवाज नहीं निकल पा रही थी। धम्म घम्म की आवाज के साथ ही बहुत धुंआ उठा, शायद आस पास ही बम गिरा था। बिना किसी देरी के फटाफट मम्मी पापा तेजी से घर से निकल कर मेरा हाथ पकड़ कर खाई की तरफ भागे और बिना किसी देरी के पास की खाई में छुप गये।

“गोलू डर मत” मम्मी ने मेरा हाथ पकड़ कर कहा।

तभी हमारे पडो़सी भी खाई में आ गए। सात आठ बंदों को देख कर कुछ हिम्मत हुई।

“कोई बात नहीं, मम्मी. आप साथ हैं तो डर नहीं लगता है।“ मैंने कहा।

युद्ध के बादल मंडरा रहे थे, इसीलिए गांव में कई स्थानों पर खाईयां बनाई गई कि संकट के समय खाईयों में सुरक्षा के लिए छुप जाए। तभी मशीनगनों से लगातार गोलियों की धन धना धन आवाजे आने लगी.

पड़ोसी को संमबोधित करते हुए पापा ने कहा “कुलजीत लगता है कि हमारे जवानों ने फाईरिंग शुरू कर दी है, अब जल्दी ही बमबारी खत्म होगी।“

“खांमखा हम निहत्ठों पर बम फेंकते है, हमारे जवानों के जवाबी हमले पर डर के मारे भाग जाते हैं।“ कुलजीत ने गुस्से से जवाब दिया।

लेकिन उस रात फाईरिंग खत्म नहीं हुई। पूरी रात जबरदस्त फाईरिंग होती रही। बीच बीच में दोनों तरफ से तोपों से बम वर्षा भी होती रही। पूरी रात कोई नहीं सो सका। लगता था जैसे कान के परदे फट जाएगें। हमने और पडो़सी कुलजीत के परिवार ने खाई में छुप कर रात गुजारी। सुबह के समय फाईरिंग बंद हुई। लेकिन काफी देर बाद ही हम लोग खाई से बाहर निकले। खाई से निकलने के पश्चात पापा मुझे और मां को घर छोड़ने के बाद गांव की चोपाल के लिए रवाना हुए। गांव के सारे पुरूष चोपाल पर रात की दिल दहलाने वाली गोलीबारी पर चर्चा कर रहे थे। शुक्र था, कि कोई हताहत नहीं हुआ। इतने में फौज के दो अफसर आए। रात की भंयकर गोलीबारी के बाद सीमा पर तैनात बटालियन ने गांव खाली कराने का निर्णय किया। बडे़ अफसर ने बच्चों और औरतों को फौरन गांव छोड़ने की सलाह दी। सेना के दो ट्रक इस कार्य के लिए लगा दिये, ताकि शाम से पहले सुरक्षित स्थान पर पहुंच सके। पुरूषों को सलाह दी गई कि वे जरूरी सामान के साथ जितनी जल्दी संम्भव हों, गांव खाली कर दें।

फौजी ट्रक में गांव के सभी औरतों और बच्चों को बिठाया गया। मां के साथ जब मुझे ट्रक में बिठाने लगे, तब में रोने लगा, कि मैं पापा के साथ जाउगा।

“गोलु बेटे, तुम मां के साथ जाऔ, मैं पीछे पीछे अपनी बैलगाडी़ मे घर का सामान ले कर आता हूं।“ पापा मुझे पुचकारते हुए कहने लगे।

“नहीं मैं आपके साथ जाउंगा।“ कहते हुए मैं पापा से चिपक गया।

“गोलु जिद्द नही करते, देखो, मैं तुम्हारे साथ साथ चलुंगा, तुम मुझे ट्रक में बैठ कर देखना।“. कह कर पापा ने फटाफटा घर का जरूरी सामान बैलगाडी़ मे रखना शुरू किया। फौजी ट्रक रवाना होने मे थोडी़ देर हो गई, तब तक पापा ने बैलगाडी़ में सामान रख लिया था। फौजी ट्रक रवाना हुआ और पापा ने पीछे पीछे बैलगाडी़ रवाना की। पापा ने नीली पगड़ी पहनी हुई थी। गांव की कच्ची सड़क पर धीरे धीरे ट्रक आगे बढ़ने लगा। पीछे फीछे पापा बैलगाडी़ में आ रहे थे। मैं पापा को देखते हुए हाथ हिलाता रहा। थोडी़ देर में ट्रक और बैलगाडी़ की दूरी बढ़ने लगी। पापा की शक्ल धुधंली दिखने लगी, लेकिन उनकी नीली पगडी़ देख कर मैं हाथ हिलाता रहा। पापा की नीली पगड़ी मुझे दिलासा देती रही, कि पापा मेरे आसपास हैं। धीरे धीरे ट्रक और बैलगाड़ी के बीच दूरी बढने लगी और पापा की नीली पगड़ी भी दिखाई देना बंद हो गई। ट्रक अब पक्की सडक पर फर्राटे लगाने लगा। दिन ढल चुका था, रात की कालिमा छा चुकी थी। मेरा मन अभी भी पापा की सूरत देखना चाहता था, कि कहीं से पापा की नीली पगड़ी दिखाई दे जाए। लेकिन फासला काफी हो चुका था। एक रात फाईरिंग की वजह से और दूसरी रात पापा की जुदाई से सो नहीं सका था। बार बार उचक उचक कर देखता कि कहीं से चाहे दूर ही हो, पापा की नीली पगड़ी एक बार नजर आ जाए।

पौ फटने से पहले ट्रक ने हमें एक स्कूल में ला कर उतार दिया। सरकार ने एक स्कूल में सीमा पास गांव वालों को ठहराने का बन्दोबस्त किया था। धीरे धीरे स्कूल में एक मेला सा लग गया. एक के बाद एक करके बहुत से फौजी ट्रक आए, जिनमें हमारे जैसे दूसरे गांवों के औरते और बच्चे थे।

हमारे आने के कारण स्कूल बंद कर दिया था। स्कूल मे दो तरफ लाईन लगा कर कमरे थे और बाकी खाली मैदान।. स्कूल कमपाउन्ड के बाहर भी काफी खाली मैदान था, जहां टैन्ट लगा कर हमारे रहने का इन्तजाम किया गया था। मेरी निगाहें हमेशा स्कूल के गेट पर रहती और पापा के आने की आहट सदा लगी रहती। धीरे धीरे गांव के पुरषों ने भी आना शुरू कर दिया था।

“पापा अभी तक नहीं आए।“ मैं ने मां से पूछा।

“ तू फिक्र मत कर, आ जाएगें, देख कुलजीत के घर वाले भी नहीं आए। एक साथ आएगें।“. मां ने जवाब मे कहा। “बाकी बच्चे बाहर खेल रहे हैं, तू भी उनके साथ खेल। पापा आ जाएगें।“ लेकिन मेरा मन खेलने मे नही लग रहा था। दो दिन बीत गये, पापा नहीं आए। मैं रोने लगा। मां चुप कराने में लग गई, लेकिन मेरा रोना और ज्यादा हो गया। मुझे इतना ज्यादा वयाकुल, अधीर हो रोते देख बहुत सारी औरते आस पास जमा हो मुझे दिलासा देने लगी। एक औरत ने मुझे गोदी मे उठा कर पुचकारते हुए कहा, “तू तो बड़ा बहादुर बच्चा है, क्यों रोता है, देख मेरा गोगी तेरे से कितना छोटा है, बड़े मजे से खेल रहा है, उसके पापा भी अभी नहीं आए।“ लेकिन मेरा रोना बंद नही हो रहा था। “मेरे पापा” कह कर और जोरों से रोने लगा। रोते रोते भी मेरी निगाहें स्कूल के गेट पर टिकी थी, मालूम नहीं, कब पापा आ जाए। तभी स्कूल गेट पर हलकी सी परछाई उठी, नीले रंग की धुधली सी छाया दिखाई देने लगी, मेरी उत्सुकता अधिक हो गई। “पापा की नीली पगड़ी” मैं चिल्ला पडा। हां वो मेरे पापा ही थे। नीली पगड़ी के बाद पापा हल्के हल्के नजर आने लगे। नजदीक आने पर मां ने चिल्ला कर कहा, “गोलु तेरे पापा आ गए।“

पापा ने आते ही मुझे गोद मे ले लिया, “पागल रोता क्यों है।“

“इतनी देर से क्यों आए।“

“बैलगाड़ी ट्रक से रेस थोड़ी कर सकती है। इसलिए देरी हो गई।“ पापा ने संतावना और दिलासा देते हुए कहा।

मैं पापा से चिपक गया था। पापा को पास पा कर ऐसा लग रहा था, जैसे पूरा जहां मिल गया है। उदासी दूर हो गई थी, चित प्रसन्न हो कर छलागें लगाने लगा, कि फटाफटा दूसरे बच्चों के साथ खेलने भाग जाउं।

“पागल कहीं का, मां को परेशान किया। इतने छोटे छोटे बच्चे कितनी मस्ती से खेल रहे हैं। और तूने यहां सबको परेशान कर दिया। अब खेलने नहीं जाएगा।“ पापा ने पूछा.

मैं फौरन पापा की गोदी से उछल कर कूदा और जोर से चिल्ला कर गोगी की तरफ भागा। “गोगी मैं खेलने आ रहा हूं।“

उस उम्र में बस खेल कूद से ही मतलब होता था। खेल कर वापिस घर आए तो मां बाप का साथ। दीन दुनिया से बेखबर।

युद्ध समाप्त होने के बाद अपने गांव लौटे। बमबारी के कारण खेती लायक नहीं रहे थे खेत। जीविका की तालाश में शहर आ गए। गांव में बडा खेत, बडा घर, जहां छलांगें मारते खेला करते थे। शहर के एक कमरे के मकान में दम घुटता था। जीवन का दूसरा नाम शायद यही है, यानी कि संघर्ष। हंसता खेलता पल कैसे संकटों में घिर जाता है, कोई कल्पना नही कर सकता है। अन्शिचता से जीवन का हर पल घिरा रहता है। हंसी जैसे गायब हो गई थी। किसान मां बाप मजदूर बन गए। दो तीन संघर्ष करने के पश्चात गांव की जमीन बेच पाएछ औने पौने दामों में जमीन बेच कर अनाज बेचने का काम शुरू किया। मां की मजदूरी समाप्त हुई। मेरी शिक्षा शुरू हुई। वो गांव का आजाद बचपन शहर की कठोर जिन्दगी में बदल चुका था। दूसरी अन्जान जगह जीवन को दुबारा संवारना कोई आसान काम नहीं है। राजा रंक हो जाते हैं। जब भी ऐसी कोई खबर सुनता हूं तो खुद का बचपन और परिवार की व्यथा याद आ जाती है। आज भी वोही हुआ, पाकिस्तान से आए सिख परिवारों की व्यथा देख कर आंखों में पानी आ गया।

इतने में पत्नी चाय बना कर रसोई से आई। चाय बनाने के चंद पलों में चलचित्र की तरह मेरे मन पटल में यादें छा गई। चाय का कप पकडाते हुए बोली “कुंभकरण के खानदानी जश्ने चिराग, चाय बिस्कुट के साथ हाजिर हैं।“ चाय का कप मैंने हाथों में लिया। उसने मेरी आंखों की नमी देख ली थी। पहले भी कई बार वह मेरी आंखों की नमी देख चुकी थी। सामने टीवी पर न्यूज देख कर वह सब समझ चुकी थी। मैं कुछ कह न सका। वह सब समझ चुकी थी।

Sunday, December 19, 2010

इंटरव्यू

सुबह का समाचारपत्र पढते पढते राजीव की नजरें फिर से नौकरी ढूंठने लगी। पेंसिल से निशान लगा कर समाचारपत्र रख कर नहाने चला गया कि शाम को ऑफिस से वापिस आ कर इन पर गौर करेगा। आजकल अखबार वाला देर से आता है, जिस कारण पढने का समय ही नही मिल पाता है। सिर्फ सुर्खियां पढ कर ही काम चलाया जाता है। शाम को आराम से संपादकीय, दूसरे लेख पढने का समय होता है। राजीव के ऑफिस जाने के बाद रसोई,  घर के काम निबटा कर सोनिया समाचारपत्र पढती थी। समाचारपत्र पर पेंसिल के निशान देख कर शाम को राजीव से पूछा क्या बात है, आज अखबार में तीन नौकरियों पर निशान लगा रखे है, ऑफिस में सब ठीक है न।

चाय की चुस्कियों के बीच राजीव ने कहा, “ऑफिस मे सब ठीक है, लेकिन हमारी कंपनी छोटी है, जिसमें आगे बढ़ने की संभावना कम है, आज आठ साल हो गये नौकरी करते हुए। अकाउन्टेंट लगा था, अब चीफ अकाउन्टेंट बन गया हूं। इसी पोस्ट पर रिटायर हो जाऊंगा।
कंपनी का मालिक आपकी काफी इज्जत करता है, वेतन भी ठीक है।
आजकल मल्टीनेशनल कंपनियों के आने से वेतन का ढांचा ही बदल गया है, आजकल पैकेज का जमाना है, मेरे साथ के दोस्त जब अपने वेतन के साथ सुविधायों का जिक्र करते है, तब जलन महसूस होती है, कि मैं दौड में पिछड गया हूं।
लेकिन आप ही हमेशा कहते है कि पैसा सब कुछ नही है, मान मर्यादा, इज्जत, शांति जो आपको इस ऑफिस में मिली हुई है, आप उसमें खुश हैं।
खुश तो हूं, लेकिन कुछ दिनों से बैचेन हूं कि किसी मल्टीनेशनल या बडी कंपनी में नौकरी मिल जाए।
जैसा आप ठीक समझे।
उस दिन के बाद सोनिया ने भी राजीव के इस काम में हाथ बटाना शुरू किया। अखबार में वह भी नौकरियां ढूंढने लगी। यह मेहनत रंग लाने लगी। राजीव को इंटरव्यू काल्स आने लगी। डिंपल कंपनी से उसे इंटरव्यू काल आई। इंटरव्यू लेने वाले अधिकारी का चेहरा जाना पहचाना सा लग रहा था। काफी गहराई से इंटरव्यू लेने के बाद अधिकारी ने राजीव से कहा, मिस्टर राजीव आपको इनकम टैक्स, सेल्सटैक्स के बारे में काफी अनुभव है। मुझे खुशी है कि आप पिछले आठ वर्षो से एक कंपनी मे काम कर रहे है। हमें आपके जैसे व्यक्ति की जरूरत है। आप इस कसौटी पर पूरे खरे उतरे हो। मैंने आपको सलेक्ट कर लिया है, लेकिन अन्तिम निर्णय कंपनी के मैनेजिंग डारेक्टर सिन्हा साहब करेगे। सभी उच्च अधिकारियों की नियुक्ति सिन्हा साहब ही करते है। उनके साथ आपका इंटरव्यू एक  दो दिनों में हो जाएगा। आप इसे केवल महज औपचारिकता ही समझे। क्योंकि हमारे द्वारा सलेक्ट किसी को भी रिजेक्ट नही किया।
सर एक बात पूछ सकता हूं।राजीव ने झिझकते हुए कहा।
घबराने की जरूरत नही, अवश्य पूछो।
सर मुझे ऐसा लगता है कि मैंने आपके जैसी शक्ल वाले व्यक्ति को इन्कम टैक्स ऑफिस में अक्सर देखा है।
मुस्कराते हुए अधिकारी ने कहा, “मुझ जैसे को नही, बल्कि मुझे ही देखा होगा। मैं वहां कंपनी के काम से जाता रहता हूं। मुझे भी बार बार ऐसा लग रहा था, कि आपको कहां देखा है। आपके इस सवाल पर याद आया कि बार रूम में अक्सर आपको भी अपने वकील साहब के साथ केस डिस्कस करते देखा है। अब डिंपल कंपनी बहुत अधिक विस्तार कर रही है। इन्कमटैक्स के सारे काम मैं अकेले नही कर सकता, इसीलिए आपकी काबलियत देख कर आपको चुन कर अब लगता है, मैं कोई गलती नही कर रहा। मुझे अपने निर्णय पर गर्व है। आप एक तरह से निश्चिन्त रहिए।
बहुत अधिक उत्साह के साथ राजीव घर पहुंचा। इंटरव्यू की पूरी बात सुन कर सोनिया भी बहुत अधिक खुश हुई। जैसा राजीव चाहता था, बडी कंपनी, अधिक वेतन, अधिक सुविधाएं, ऊंची पोस्ट। जिस की ख्वाहिश की, पूरी लगभग होती नजर आ रही थी। दो दिन बाद राजीव को फोन आया कि फाइनल इंटरव्यू के लिए डिंपल कंपनी के मैनेजिंग डारेक्टर सिन्हा साहब आज शाम को मिल सकते हैं, फिर एक सप्ताह के लिए विदेश जा रहे है। राजीव यह मौका नही छोडना चाहता था, वह शाम पांच बजे डिंपल कंपनी के ऑफिस पहुंच गया। इंटरव्यू लेने वाले अधिकारी सुभाष क्वात्रा राजीव को लेकर सिन्हा साहब के केबिन में पहुंचे। सुभाष क्वात्रा ने राजीव के काम, अनुभव की तारीफ की और नौकरी के लिए उपयुक्त बताया। सिन्हा साहब ने कुछ व्यक्तिगत बाते पूछी और कहने लगे, “भई सुभाष जब तुमने चुन लिया है, तब मैं कौन होता हूं, रिजेक्ट करने वाला। इनकी ऐपलिकेशन कहां है, अभी सलेक्ट कर देते हैं। सुभाष क्वात्रा नें राजीव की ऐपलिकेशन आगे बढाई, जिसे देखते ही सिन्हा साहब की माथे की त्योरियां चढने लगी। एक छण पहले जिस व्यक्ति को राजीव में सभी गुण नजर आ रहे थे, उसे राजीव में अब अवगुणों के अलावा कुछ भी नजर आ रहा था। तेज स्वर में बोले, “सुभाष तुम्हारे से यह उम्मीद नही थी। तुमने मलिक कंपनी में काम कर रहे आदमी को कैसे चुना।
सर आप राजीव की काबलियत देखिए।सुभाष ने सफाई देते हुए कहा।
जब मैंने कह दिया, तब वह फाइनल है।, भाड में गई काबलियत। उस पागल मलिक के पास क्या काम करता होगा। एक टुच्ची, कंगाल कंपनी का टुच्चा कर्मचारी। मिस्टर राजीव आप जा सकते है। हम आपको नौकरी पर नही रख सकते है। सिन्हा साहब की बात सुन कर राजीव चुपचाप एक लुटे, पिटे आशिक की तरह चुपचाप केबिन से बाहर आ गया। राजीव की हालत बिलकुल वैसी थी, जैसे एक आशिक की होती है, जो अपनी महबूबा के घर उसके पिता से शादी की बात करने जाता है, लेकिन अपमानित हो कर वापिस आता है। राजीव से किस्सा सुनने के बाद सोनिया ने कहा, “मालिक होंगे अपने घर में, नौकरी दें या नही, यह उनकी मर्जी है, लेकिन उनको इस बात का कोई अधिकार नही है, कि वे किसी की इस तरह से बेइज्जती करें। सुनो राजीव आखिर वो क्या बात हो सकती है, जिस पर सलेक्शन के साइन की जगह रिजेक्शन के साइन कर दिये।
मुझे खुद नही मालूम, लेकिन इसका पता तो लगाना ही पडेगा।
तुम उस अधिकारी से पूछ सकते हो, जिसने तुम्हारा इंटरव्यू लिया था।
मुझे वह इनकमटैक्स ऑफिस में मिलेगा, वही बात करूंगा।
कुछ दिनों के बाद राजीव की मुलाकात सुभाष क्वात्रा से इनकमटैक्स ऑफिस में हुई। राजीव ने पूछा, “सर क्या मैं आपसे अपने रिजेक्शन की वजह पूछ सकता हूं।
अगर मत पूछो तो अच्छा है।
अगर बता दीजिए तो अच्छा है, दुख मुझे रिजेक्शन का नही है। नौकरी तो मुझे कही और भी मिल जाएगी। वह तो जीवन का एक हिस्सा है। हैरानी अचानक व्यवहार में आए परिवर्तन के कारण है। कंपनी का नाम जानते ही मुझे बेइज्जत कर दिया।
दुख मुझे तुमसे ज्यादा है, कि एक काबिल आदमी को नौकरी नही मिली। एक बेकार की वजह ने काबलियत को नही परखा। लेकिन मैं ज्यादा नही बताऊंगा।
धीरे धीरे राजीव इस किस्से को एक बुरा सपना मान कर भूलने लगा, क्योंकि कारण वह मालूम नही कर सका। भूलने मे ही भलाई समझी, लेकिन कुदरत समय आने पर सब भेद खोल देती है। चाहे इसमें कुछ देर हो सकती है। लगभग दो महीने बाद चपरासी ने कुछ फाईलों का एक पुलिंदा राजीव की मेज पर रख कर कहा, “ये फाईलें मलिक साहब नें भेजी है, आप देख ले, जो जरूरी हो, उनको रख कर बाकी बेकार की फाईलों को नष्ट कर देना। उस पुलिंदे में एक फाईल डिंपल कंपनी की थी, जिसे देख कर उसका माथा ठनका। वह फाईल को पढने लगा, हो सकता है, कि जो राज वह जानना चाहता है, शायद मालूम हो जाए। वह फाईल लगभग आठ साल पुरानी थी, वही समय जब राजीव ने मलिक कंपनी ज्वाईन की थी। फाईल पढ कर राजीव को मालूम हुआ कि उस समय डिंपल कंपनी की आर्थिक स्थिती अच्छी नही थी। वह बिकाउ थी। मलिक कंपनी के मालिक मलिक साहब का डिंपल कंपनी खरीदने का ईरादा था। बात लगभग तय भी हो गई थी, लेकिन आखिर सिन्हा की मांगी कीमत कुछ अधिक लगी। सौदा नही हो सका।
तो यह बात है, राजीव बुदबुदाया। अगर सौदा नही हुआ तो उस आठ साल पहले की भडास मुझ पर निकाल कर पूरी की। बीमार मानसिकता।
शाम को सोनिया कारण जान कर मुस्कराई। जो होता है, अच्छे के लिये होता है। अच्छा हुआ कि उस बददिमाग सिन्हा ने नौकरी नही दी। एक बीमार मानसिकता से ग्रस्त आदमी के साथ काम करने से अच्छा है, कि कम पैसों मे चैन की नौकरी करो। मुझे इस बात की खुशी है, कि उस अधिकारी सुभाष ने तुम्हारी काबलियत को परखा। वह सिन्हा पैसो से अमीर हो सकता है, लेकिन निकला एक फर्सटरेडिट गरीब आदमी। पुअर चैप। जिसने अपनी आठ साल की भडास तुम पर निकाली। बट आई लव यू एंड यूअर काबलियत।
आधी हिंदी, आधी अंग्रेजी। राजीव मुस्कराया।

यही आज की भाषा है, राजीव।कह कर सोनिया हंस पडी।   




Sunday, December 12, 2010

दिल के बादशाह

गर्मियों के दिन, दोपहर का समय, सूरज देवता प्रसन्न मुद्रा में अपने वेग के साथ छाए हुए थे। गर्म हवा के थपेड़े चारो ओर सब जीव जन्तुओ का हौसला पस्त कर चुके थे। जून के महीने में दोपहर के एक बजे सुभाष और सुनील राजस्थान में वातानुकुलित कार में फर्राटे के साथ चले जा रहे थे। दो युवा मार्केटिंग अधिकारी कंपनी के नये प्रोडक्ट के बाजार में उतारने से पहले बाजार का शोध करने हेतु शहरों, कस्बों और गांवों में जुटे हुए थे। मुख्य राजमार्ग से हट कर एक छोटी सी संकरी सड़क पर सुनील ने कार घुमा दी।

“सुनील लगता है कि कार का एसी काम नहीं कर रहा है।” सुभाष ने कहा।

“जनाबेआली बाहर इस समय तापमान 50 डिग्री होगा, कार में चार एसी लगे जाए तब भी गर्मी से छुटकारा नहीं मिल सकता है।” सुनील नें कार चलाते हुए कहा।

“पचास डिग्री यार तुम लम्बी हांकते हो, यह मुमकिन नही है।”

“प्यारे हम राजस्थान में घूम रहे हैं, जून में यहां पचास क्या पचपन डिग्री तापमान भी मामूली बात है।”

“शर्त लगा, पैंतालिस से उपर नहीं होगा।”

“हार जाएगा।”

“लगा तो सही।”

“मैं शर्त कभी नहीं हारता।” सुनील नें आत्मविश्वास से कहा।

“लगता है, बड़ा घमंड है, शर्त जीतने पर, लेकिन मैं भी अनाड़ी नही हूं। एैसी शर्ते बहुत जीती हैं।” सुभाष नें उससे अधिक आत्मविश्वास से पलट कर कहा।

“हो जाए हजार रूपये की।” सुनील नें कहा।

“बिल्कुल हो जाए।” सुभाष नें कहा और दोनों में दोपहर के तापमान पर हजार रूपये की शर्त लग गई। बातों बातों में सुनील भूल गया कि अब राजमार्ग से हट कर एक पतली सड़क पर कार ड्राईव कर रहा है, जो मलाई की तरह चिकनी नही है उल्टे एकदम विपरीत खडढो से भरी हुई थी। कुछ आगे जाकर सड़क का नामोनिशान ही नही था, सिर्फ रेत ही रेत और रेत के नीचे एक खडढे में कार का पहिया आ गया और एक तेज झटके के साथ कार कुछ उछली। सुनील ड्राईव कर रहा था। उसका हाथ कार स्टीरिंग पर था जिसके कारण वह अपनी सीट पर थोड़ा ही उछला लेकिन सुभाष कुछ बेखटके के साथ सुनील से तापमान पर शर्त लगा रहा था, वह सीट पर उछला और उसका सिर कार की छत से जा टकराया। सुभाष की आंखों के आगे तारे नजर आने लगे, एक पल के लिए वह भौच्चका रह गया, सिर पकड़ भन्ना कर बोला। “मार दिया पापड वाले को। कार सड़क पर चला रहा है या पथरीली चट्टान पर, सिर फोड़ कर रख दिया, कार रोक।”

सुनील ने कार को रोका, लेकिन रोकते समय एक पत्थर पर कार उछल गई। कार एक दम घूम गई, बडी मुश्किल से कार को संतुलित करके सुनील ने रोका। कार रूकते समय एक बार फिर उसी पत्थर से टकराई। पत्थर दो बार कार के रेडियेटर से टकराया। रेडियेटर लीक हो गया। “क्या रफ कार ड्राईव कर रहा है, बाहर निकल के देख क्या हुआ।”

“सुभाष बाबू हो गया कबाड़ा, रेडियेटर लीक हो गया, कूलन्ट निकल गया, आगे का बम्पर टूट गया।” सुनील ने कार का मुआईना करते हुए कहा।

सुभाष अपना सिर पकड़ कर कार से बाहर निकल कर कार का निरीक्षण करने लगा, कार के बम्पर को हाथ लगाया तो वह नीचे गिर गया। “अब क्या करे। एक तो मेरा सिर फोड़ दिया और दूसरे कार भी गई हाथ से। मुझे नही लगता कि यह रेंगने लायक भी है। तुझे लाइसेंस किसने दिया है।” सुभाष झल्ला कर बोला।

“जिसने तुझे लाइसेंस दिया था, उसी ने ड्राईविंग लाइसेंस दिया है। लेकिन तेरे से अच्छी कार चलाता हूं।”

“क्या खाक अच्छी चलाता है, मेरा सिर और कार दोनों तोड़ फोड़ दिए हैं। अब सोच क्या करे।”

“करना क्या है, मैकेनिक ढूंढना है और कार ठीक करवानी है।”

“कहां मिलेगा मैकेनिक।”

“आजकल हर दो कदम पर मैकेनिक मिलते हैं, ढूंढना पडेगा। हम हाईवे से काफी दूर आ गए हैं, इसीलिए वापिस जाना ठीक नही रहेगा, आगे कस्बा नजदीक है, वही पर मैकेनिक मिलेगा, मैं पहले यहां आ चुका हूं, वहीं चलते है, दोपहर हो गई है, खाना भी वहीं मिलेगा।” सुनील ने कहा। “कार को सड़क के किनारे कर देते है, वरना हो सकता है कि कोई ट्रेक्टर या बस ठुकी हुई कार को और ठोक कर चला जाए।”

दोनों ने कार को सरका कर सड़क के किनारे लगा दी और पैदल कस्बे की ओर चल पड़े। गर्म हवा के थपेड़े बडते जा रहे थे। एयरकंडीशन कार में सफर करने वाले चार कदम चल कर परेशान हो गये। हौसला पस्त होने लगा। थोड़ी दूर जाने के बाद एक गांव आया। कुछ गिने चुके घर सड़क के किनारे बसे हुए थे। दो चार दुकाने भी बनी हुई थी जो बंद थी। दोनों का गला सूखने लगा। प्यास से बेहाल एक दूसरे का मुंह देखने लगे। सोचने लगे कम से कम पानी तो मिलेगा। तभी एक छोटा दस ग्यारह वर्ष का बच्चा घर से निकल कर बाहर दुकान के शटर को आधा खोल कर अंदर घुस गया। बच्चे को दुकान का शटर खोलते देख उन दोनों की जान में जान आई। “गुरू यहां काम बन जाएगा।” सुभाष ने सुनील से कहा। सुनील दुकान के नजदीक जा कर शटर को थोडा ऊपर करके बच्चे को समबोधित करके कहा। “मुन्ने पीने को पानी या ठंडा मिलेगा।” बच्चे जो एक अलमारी से कुछ निकाल रहा था, शटर की आवाज से चौंक गया। पलट के बोला। “कौन हो तुम, शटर क्यों खोला।”

“मुन्ने हमारी कार खराब हो गई है, प्यास लग रही है, कुछ पीने को मिल जाए।” सुनील ने बच्चे से पूछा।

“क्या चाहिए, बोलो, सब मिलेगा। नाम बोलो।” बच्चे ने घूरते हुए पूछा।

“पानी मिलेगा।”

“नही मिलेगा।”

“आधा गिलास पिला दो।”

“सुबह पानी नही आया है, हमने अपने पीने के लिए बचा रखा है, शाम को नल आया तो पिला दूंगा। कुछ और पीना है तो बोलो।” बच्चे ने पलट के जवाब दिया।

“गला सूख रहा है, कुछ भी पिला दो।” सुनील ने विनती की।

“कोक, फैन्टा, बीयर क्या चाहिए, सब मिलेगा।” बच्चे के मुख से बीयर का नाम सुनते ही सुनील उछल पड़ा। गुरू तेरी खुराक का इंतजाम हो गया।” सुभाष को आवाज दी। खुराक के नाम पर सुभाष अपने सिर की दर्द भूल कर तेजी से दुकान के अंदर दाखिल हुआ। “फटाफट दो खोल दे।” सुभाष ने बच्चे को कहा। यह सुनते ही पलट कर बच्चे ने कहा। “बाबू मारेगा, अगर मैंने खोल दी, वो समझेगा मैंनें पी ली।” बच्चे की आवाज सुन कर बच्चे का पिता, जिसे वह बाबू कह रहा था, आकर बच्चे को डांट लगा दी। “अबे इस समय दुकान में क्या कर रहा है, चैन नहीं पड़ता तेरे को। दोपहर की सडी हुई लू में मटरगस्ती करता रहता है।”

“मैं कुछ नहीं कर रहा हूं, तुम्हारी आदत तो हर समय डांटने की है, इन को बीयर चाहिए।” कह कर बच्चा बाप की डांट से बचने के लिए नौ दो ग्यारह हो गया।

बीयर पीते हुए उन्होनों ने कार मैकेनिक के बारे मे पूछा। “आगे कस्बे में मैकेनिक मिलेगा। दो किलोमीटर दूर है। मैकेनिक बहुत बढिया है। कोई भी कार चुटकी बजाते दूर कर देता है।”

“उसका कोई फोन होगा, उसके साथ बात कर लेते है।” सुनील ने पूछा, लेकिन फोन नम्बर उस व्यक्ति के पास नही था। दो किलोमीटर का नाम सुन कर दोनों परेशान हो गए। चलने से पहले बीयर की दो बोतल और खरीद कर रास्ते के लिए रख ली। कुछ कदम चलने के बाद गर्म हवा के थपेडों ने दोनों को फिर से पस्त कर दिया। जो कुछ समय पहले तापमान पर शर्त लगा रहे थे, एक ही सुर में गर्मी से परेशान कहने लगे। “लगता है, तापमान पचास नही साठ डिग्री से अधिक होगा।”

“गुरू पैदल यात्रा कब तक करवाऔगे, कोई सवारी भी नही नजर आ रही है।” सुनील झुंझला के बोला।

“पता नही कहां फंस गये, इस रेत के जंगल में, पानी नही मिला, बीयर मिल गई। वाकई देश तरक्की पर है। इसे कहते हैं इकोनोमी बूम। इसी तरह चलता रहा तो अमेरिका को पछाड़ देगें।”

“अमेरिका को गोली मार, वापिस उसी गांव चलते है, शायद कोई सवारी मिल जाए।” दोनों वापिस पहुंचे। एक ऊंट गाड़ी वहां आकर रूकी। दोनों खुशी से उछल पड़े। “सुनो गाड़ी वाले कस्बे तक छोड़ दो, पीछे हमारी कार खराब हो गई है, मैकेनिक तक हमें पहुंचा दो।” दोनों की बात सुन कर गाड़ी वाला बोला। “पीछे सड़क पर जो टूटी कार खडी़ है, उसी की बात कर रहे हो।”

“हां भई हां।”

“इस गर्मी में मैं कहीं नही जाऊंगा। शाम को जब सूरज ढल जाएगा, छः बजे के बाद छोड़ दूंगा।”

“आपको जितने पैसे चाहिए, दे देंगें, प्लीज कस्बे में मैकेनिक तक छोड़ दो।”

“अपनी जान ज्यादा प्यारी है, अगर लू लग गई, तब इलाज कौन करवाएगा। न बाबा न। हमारा नियम है, सेहत पहले, सेहत होगी, पैसे कमा लेंगें।” कह कर वह घर के अंदर चला गया। दोनों आश्चर्य से एक दूसरे को ताकने लगे।

“क्या जमाना आ गया है, पैसे लेकर दर दर की ठोकरें खा रहे है, कोई सवारी नही मिल रही है।” सुभाष झुंझला कर बोला।

“गुरू यही दोपहर काट लेते हैं। दो किलोमीटर इस तपती दोपहर में जाना खतरनाक हो सकता है, अगर लू लग गई तो आफत में आ जाएगें।” सुनील ने सलाह दी।

“दोपहर अगर काटी तो रात कस्बे में काटनी पडेगी। कार ठीक करवानें में भी समय लगेगा।” सुभाष ने कहा। “पद यात्रा करने में ही भलाई हैं। शोध कब करेगें।”

“जीवन की कटु सच्चाई पर शोध होगा। आज तो मार्किट के बारे में कुछ नही सूझ रहा है।” कह कर सुनील बेमन सुभाष के साथ पद यात्रा पर निकल पड़ा। गर्म हवा के थपेडों को सहते किसी तरह हिम्मत करके आगे बढ़ते रहे। प्यास के साथ भूख लगने लगी। सुभाष ने एक बीयर की बोतल सुनील को दी। उस्ताद प्यास बुझा।”

“गुरू नहीं पीनी, पहले कुछ खाऊंगा।” सुनील ने ताना देते हुए कहा।

“मेरा भेजा मत खा, बाकी बात कर।” सुभाष ने बोतल मुंह से लगा कर कहा। एक दूसरे को कहते सुनते कस्बे की ओर पद यात्रा शुरू की। गिरते लुडकते दो किलोमीटर का सफर तय करते ऐसा लग रहा था कि एक जन्म बीत गया फिर भी कस्बा और अधिक दूर होता जा रहा है। पसीने से लथपथ बेजान टांगों के ऊपर जिस्म का बोझ जैसे तैसे लाद कर जब कस्बा आया तो एक ढाबे की चारपाई पर सुनील धम से बैठ गया। मुख से कोई शब्द नही निकाल पाया, हाथ के ईशारे से ढाबे वाले को बुला कर पानी का ईशारा किया। गर्म पानी के चार गिलास गटक के पूछा, खाने को क्या मिलेगा। “साब जी जो कहो बना देते है। पराठों के साथ आलू गोभी, पनीर की सब्जी खाईये, अंगुलियां चाटते रह जाऔगे।” भूख से हाल बेहाल हो रखा था, दोनों का। खाने के बाद सुनील की जान में जान आई। “भाई मजा आ गया, खाना बहुत अधिक स्वादिष्ट था। अब कार मैकेनिक का पता बताऔ।”

“साब जी, आप भूख से बेहाल हो रखे थे, आप देख नही सके। दो दुकान छोड़ कर जहां ट्रैक्टर खड़ा है, वही मैकेनिक की दुकान है। मैकेनिक ट्रैक्टर ठीक कर रहा है।”

“गुरू जी आप जा कर बात करो, मैं चारपाई पर जरा दस मिन्ट सुस्ता लूं।” सुनील सुभाष को मैकेनिक के पास भेज कर चारपाई पर पसर गया।

सुभाष ने मैकेनिक को समबोधित करके कहा, “उस्ताद जी, कार खराब हो गई है, ठीक करवानी है।”

“क्या खराबी है।” मैकेनिक ने ट्रैक्टर ठीक करते हुए बिना सुभाष की तरफ देखे कहा।

“रेडियेटर लीक हो गया है।”

“कार कहां खडी है।”

“लगभग ढाई किलोमीटर पीछे। चल कर देखना होगा। आगे का बम्पर भी निकल गया है।”

“भाई साब वहां जाना मुश्किल है, शाम को जब सूरज ढल जाएगा, तभी जा सकते है। अभी आप गर्मी का प्रकेप देख रहे है। वहां अभी नही जा सकता हूं।” मैकेनिक ने साफ मना कर दिया।

“उस्ताद जी, आप पैसे की चिन्ता न करे, जितना कहेगें, डबल दूंगा।” सुभाष ने चापलूसी करते हुए कहा। “सुना है, आप का हाथ लगते ही कार ठीक हो जाती है।”

“वह तो ठीक है, लेकिन मैं इतनी गर्मी में वहां नही जाऊंगा। अपनी सेहत पहले देखनी है, पैसे के पीछे स्वास्थ्य से खिलवाड़ कभी नहीं करूंगा। आप शाम तक यहां आराम कीजिए।” मैकेनिक किसी भी कीमत पर जाने को तैयार नही हुआ। थक कर सुभाष ढाबे पर आ गया और ढाबे वाले से पूछने लगा कि कोई और मैकेनिक मिलेगा। तभी सुनील ने कहा, “यही इकलोता मैकेनिक है, अब कम से कम दो घंटे आराम कर, काफी थक गये है।”

“यह देश कभी नही सुधरेगा।” सुभाष ने दो गालियां निकाल कर कहा।

“गुरू जब रेत के जंगल में बीयर मिल गई, तब तो यही देश अमेरिका से आगे निकल गया था, जब मैकेनिक ने मना कर दिया, तब देश पिछड़ गया, यह सोच गलत है।” सुनील ने ताना कसते हुए कहा।

“सुनील बाबू सब तुम्हारा किया हुआ है, इतनी रफ कार चला रहे थे, कि सारे अंजर पंजर तोड़ दिये, कार के भी और मेरे भी। वापसी में कार मैं चलाऊंगा।”

“गुरू पहले कार ठीक करवा लो फिर पूरे रास्ते कार तुम्ही चलाना। मैं पिछली सीट पर आराम से सोता हुआ जाऊंगा।”

“मुझे ड्राइवर समझ रखा है” सुभाष ने गुस्से में कहा।

“ड्राइवर नही, कार चालक गुरू जी।” सुनील ने पलटवार किया। इसी तरह नोक झोंक में शाम हो गई। गर्म हवा अभी भी चल रही थी, तापमान में कोई कमी महसूस नही हो रही थी। छः बजे मैकेनिक ने खुद आकर कहा “भाई साब कार ठीक नहीं करवानी, आप दोनों तो पिछले तीन घंटों से नोक झोंक मे लगे हुए हो। आराम करते तो सारी थकान मिट जाती। रात को ड्राइविंग करते समय नींद आ सकती हैं। रात को सभी तेज चलते हैं, जरा सी आंख लग गई तो दुर्घटना हो सकती है। इसलिए हम तो रात को कभी ड्राइविंग नही करते हैं।”

“आप रात को ड्राइविंग करते नहीं, दोपहर को भी नही करते, तब ड्राइविंग कब करते हैं।” सुभाष नें व्यंग्य में कहा।

“भाई साब हम थंडे समय में काम करते हैं। सुबह चार बजे से काम में लग जाते है, दोपहर बारह बजे से शाम छः बजे तक आराम करते है, फिर शाम को छः बजे से नौ दस बजे तक काम करते है। इतनी गर्मी में जब सूरज आग छोड़ता है, उस समय घर के अंदर आराम करने में ही भलाई है। अपनी सेहत अपने खुद के हाथों में होती है, इसीलिए आप के पैसों को ठुकरा दिया। आप बडे आदमी है, बड़ी कंपनी में नौकरी करते हैं, लेकिन आखिर कहलाऔगे नौकर ही। अपने से बडे आफीसर की डांट जरूर खाऔगे। मौसम का मिजाज नहीं समझते हैं आप लोग, बस पैसा और काम ही आपको नजर आता है। हर चीज को पैसों में तोलते हो आप, लेकिन रहते गुलाम हो। आप हमसे अधिक अमीर हैं, लेकिन दिल के बादशाह हम हैं। आप हम पर रौब नही डाल सकते हो। आप रौब सह सकते हो, लेकिन डाल नही सकते। आप रौब डाल के देखो, हम काम नही करेगें और आप कुछ नही कर सकते, सिर्फ मन ही मन गाली जरूर निकाल सकते हो, लेकिन जुबान पर मत लाना, वरना शहर से मैकेनिक लाना पडेगा।”

मैकेनिक का भाषण सुन कर सुभाष का खून खौलने लगा, मन ही मन कहने लगा, जी चाहता है साले का गला घोंट दूं, लेकिन अपने को नियंत्रित कर के कहा, “कार ठीक करने में समय लग सकता है, फिर अंधेरा हो जाने पर कार रिपेरिंग में दिक्कत आ सकती है।”

“भाई साब पद यात्रा तो करनी नही है, ऊंट गाडी वाले को कहा है, बस आने ही वाला होगा। कार का रेडियेटर बदलना है, दस मिन्ट में बदल दूंगा।” तभी एक ऊंट गाडी आ कर रूकी, मैकेनिक ने अपने औजार और रेडियेटर गाडी में डाले और दौनों के साथ चल पड़ा। सुनील नें गाडी वाले को देख कर कहा, “आप हमें दोपहर को गांव में मिले थे और यहां आने से मना कर दिया था।”

“बिल्कुल सही पहचाना आपने, मैं वही रूक गया था, अब आया हूं, इतनी गर्मी में हम काम नही करते हैं। यह ऊंट मेरी रोजी रोटी है, इस पर मैं अन्याय नहीं कर सकता हूं। मुझे अगर आराम चाहिए तो मेरे ऊंट को भी। अब तरो ताजा हो गए हैं, रात तक काम करेंगें। आप इसे जानवर मत समझिए, परिवार का एक अहम हिस्सा है। जैसे आप अपने परिवार के हर सदस्य का पूरा ध्यान रखते है, वैसे हम अपने परिवार के अहम सदस्य ऊंट का भी ध्यान रखते हैं।”

मैकेनिक और ऊंट गाडी वाले की बातें सुभाष को बेमतलब का भाषण लग रही थी, लेकिन चुपचाप सुनता रहा। थोडी देर में कार तक पहुंच गए। मैकेनिक काफी होशियार था, फटाफट कार का रेडियेटर बदला और कार के बम्पर को ठोक कर पेचो से अपनी जगह लगा दिया। कूलंट डाल कर कार स्टार्ट की। “भाई साब हो गई कार ठीक, अब आप निश्चिन्त हो कर ड्राईव कीजिए।” मैकेनिक ऊंट गाडी में बैठ कर वापिस कस्बे चला गया और सुभाष ने स्टेरिंग संभाला। “जी कर रहा है साले दोनों को गोली मार दूं, नखरे टाटा बिरला से अधिक कर रहे थे। पूरा दिन खराब कर दिया।”

“गुरू जी उनकी बातें में दम था, आखिर हम गुलाम ही हैं, पैसों के और अपने आफिसरों के। क्या हम किसी काम के लिए ना कह सकते है, जिस ढृढता से इन लोगों ने मना किया, काम के लिए। क्या कभी हमने अपने बारे में भी सोचा है।” सुनील की बात बीच में काटते हुए सुभाष ने कहा “संत सुनील जी अब अपनी कथा बंद कीजिए, मेरा सिर इनके भाषणों से चकरा गया है, अब आप प्लीज चुप रहिए। आपको वातानुकुलित आफिस मिला हुआ है, आप दोपहर को आराम नही कर सकते हो।”

“गुरू जी आपकी बात भी ठीक है, लेकिन उनकी बातों में ज्यादा दम है, हम गुलाम है हम अपनी मर्जी से कुछ नही कर सकते है, हमारी लाईफ में सिर्फ भाग दौड है, और वो हैं दिल के बादशाह। हमें भी आखिर उनकी बाते सुननी पडी। अपने आफिस में भी और इनकी भी। गुलामों की तरह सिर झुका कर। वो जो कहते गए, सब सुनते रहे। आफिस में एक ऊंची पदवी मिली हुई है, मैनेजर की, इसी से हम खुश होते रहते है।”

“संत बाबा सुनील कुमार जी की जय।” सुभाष ने जोर से जयकारा लगाया और सुनील धीमे धीमे हंसने लगा।

जगमग

दिये जलें जगमग दूर करें अंधियारा अमावस की रात बने पूनम रात यह भव्य दिवस देता खुशियां अनेक सबको होता इंतजार ...