Thursday, October 14, 2010

चले जाऔ

जून महीने की तपती दोपहर सूरज आग का गोला बना हुआ था दो बजे गर्मी अपने पूरे शबाब पर थी लू के थपेडे जान निकालने में कोई कसर नहीं छोड रहे थे भयंकर गर्मी की दोपहर में नवगांव में सन्नाटा छाया हुआ था इंसान तो एक तरफ, कोई परिंदा भी नही नजर आ रहा था अपने आशियाने में सभी छिपे बैठे थे, या फिर यूं कहे कि सुस्ता रहे थे लेकिन अर्चना का मन बैचेन था उम्र सिर्फ तीस साल, जवानी ढल चुकी थी मात्र तीस में ही, हांलाकि इस उम्र में महिलाएं जवानी के दायरे में आती हैं, लेकिन अर्चना प्रोढ हो चुकी थी चेहरे और शरीर को देख कर कोई भी उम्र को पचास ही मापता था शरीर की देख भाल किए एक अरसा बीत गया था किस के लिए बने संवरे, किस के लिए शरीर का ख्याल रखे शरीर को रखना है सिर्फ जीने के लिए, लेकिन ध्यान नही देना है विवाहिता स्त्री अपने पति को केन्द्र बिन्दु मान कर उसके लिए सजती संवरती है उसकी पूरी जिन्दगी पति और बच्चों के इर्द गिर्द ही सीमित रहती है अर्चना की जिन्दगी सिर्फ बच्चों तक सिमट कर रह गई है पति, कहां होगा उसका पति, कब आऐगा, उसे नही मालूम एक आस तो है, लेकिन मन ही मन कई बार सोचती है, कि अब उसका पति न ही आए तो अच्छा ही होगा

आखिर क्यों एैसा वह सोचती है, शायद उसको भी नही मालूम आज सुबह ही ऊंगलियों पर गिन रही थी, पूरे सात साल हो गए है, उसके पति को घर छोडे हुए सात साल बाद तो कोर्ट भी लापता व्यक्ति को मृत घोषित कर देती है, लेकिन अर्चना को ख्वाहिश थी कि एक बार आखिर आमना सामना जरूर हो, चाहे उसके बाद तमाम उम्र जुदाई, उसको मंजूर होगी वह एक बार अपने पति से सिर्फ एक बार शायद अंतिम बार पूछना चाहती है कि क्या कमी थी उसमें जो उसको त्याग कर किसी और के साथ गृहस्थी दूसरी बसा ली भूल तो वह नही सकती वह  पति को, चाहे वो भूल गया हो दो बच्चे हैं उससे बच्चों को देखते ही पति की स्मृति मस्तिषक के किसी कोने से उभर ही आती है एक शरीर किया, सब कुछ न्योछावर किया फिर भी छोड दिया जब खाली समय आता है  तो बातें याद आ ही जाती है

आज बार बार अतीत घुमड घुमड कर अर्चना को परेशान कर रहा है घर में अर्चना बिल्कुल अकेली है, बार बार बिस्तर पर लेटी हुई करवटे बदलती जा रही है पुरानी यादें बार बार आंखों के सामने लहराते हुए एक एक कर के आ रही हैं बेचैनी से करवटे बदल रही है तपती दोपहर में बिजली गुल हो गई पसीने से तर बदर अर्चना की बेचैनी और अधिक हो गई, लेकिन पुरानी यादों के बीच वह बिस्तर से उठने की हिम्मत नही जुटा पा रही है वह आज बारह वर्ष पीछे पहुंच गई केवल अठारह वर्ष की उम्र में उसका विवाह हो गया था एक संपन्न परिवार और चार भाईयों की प्यारी चहेती एक बहन, अर्चना, जिसने जन्म से लेकर अठारह साल तक संपन्नता, वैभवता का जीवन जीया था जिसको चाहा, जितना चाहा, वही पाया विवाह भी एक संपन्न परिवार में हुआ मां बाप, भाई, सभी परिवार जन बेहद खुश थे, कि अर्चना का जीवन सिर्फ अठारह वर्ष में भी सुधर गया मायका और ससुराल दोनों जगह संपन्नता और वैभता हर किसी की यही चाहत होती है

अर्चना भी खुशी से इतराती थी चारों तरफ धन की वर्षा ही वर्षा पति प्रमोद गोरा चिट्टा लंबे कद का, किसी भी फिल्मी हीरो को मात कर दे कालेज की पढाई समाप्त करने के बाद मुंम्बई में चार पांच महीने धक्के भी खाए, असफलता के बाद खानदानी व्यवसाय में पिता के साथ जुट गया विवाह का बाद वह नवयुग सिटी की भव्य कोठी में आई थी प्रमोद तीन भाई, सबकी एक के साथ एक साथ लाइन में तीन कोठियां परिवार का पद, सामाजिक स्थिती, स्टेटस अपने आप खुद ही ब्यान करती थी प्रमोद और उसके दो भाईयों के नाम से अलग अलग कोठियां प्रमोद सबसे बडा, उससे छोटे दो भाई और दो बहनें थोक मंडी में व्यापारियों को लाला शब्द से संमबोधित किया जाता हैं विवाह के बाद दूसरे दिन प्रमोद को लाला शब्द से पुकारने पर अलहड अर्चना जोर से खिलखिला के हंस पडी तो नई दुल्हन के ठहाकों की गूंज पर घर का सारा वातावरण एक छण के लिए शान्त हो गया था हुआ यूं कि दुकान का कर्मचारी कोठी आया और विवाह के खर्चो का हिसाब देने के लिए प्रमोद को लाला के नाम से पुकारा पहले उसने सोचा कि ससुरजी को संमबोधित किया होगा लेकिन वह तो उसके जवान गबरू पति को लाला के नाम से पुकारा गया था उसके अलहडपन को उसके ससुरजी ने माफ किया कि घर के कायदे समझने में बहू को थोडा समय तो दो

विवाह के दो वर्ष के अंदर दो खूबसूरत कन्याऔं रिंकी और मिंकी की मां बनने पर अर्चना तो घर गृहस्थी में इतना रम गई, कि उसको पता ही नही चला कि उसका पति प्रमोद कब उससे दूर चला गया व्यापार के सिलसिले से दूसरे शहरों और विदेश में अक्सर उसके पति प्रमोद को जाना पडता था जब उडती उडती खबरें उसके कानों में आई कि प्रमोद ने चुपचाप छुप के दूसरी शादी कर ली है, एक लडका भी हो गया है और दूसरे शहर में घर भी बसा लिया है, तब तक पानी सिर से ऊपर हो चुका था अर्चना के ससुराल और माएके की तरफ से हर कोशिश असफल हो गई मान, मर्यादा, प्रतिष्ठा धूमिल होती देख प्रमोद को परिवार और व्यापार से बेदखल कर दिया गया प्रमोद ने अदालत जा कर अपने नाम की कोठी का कब्जा लिया और साझेदारी व्यापार का हिस्सा लिया कब्जा लेने के बाद प्रमोद ने कोठी बेच दी, और रकम लेकर अर्चना और बच्चों को अकेला छोड कर दूसरी औरत के साथ दूसरे शहर गृहस्थी बसा ली तो अर्चना टूट गई

नवगांव मे उसके ससुरजी की पुश्तैनी हवेली थी और खेत थे जिसकी देखभाल के लिए एक पुराना वफादार नौकर इदरीस रखा हुआ था ससुरजी ने अर्चना और बच्चों को रहने के लिए पुरानी हवेली भेज दिया  दो छोटे बच्चों को लेकर नवगांव की पुरानी हवेली में आकर अर्चना बस गई आमदनी के लिए खेती का सहारा था

यादों का सिलसिला अचानक से थम गया पसीने से तर बतर अर्चना नें साडी के पल्लू से मुंह पोंछा आज उसे क्या हो गया है, क्यों उसका अतीत परेशान कर रहा है आज क्यों प्रमोद का ख्याल बार बार आ रहा है बिस्तर से उठ कर बाहर बरामदे में आ गई मटके का ठंडा पानी पी कर चारपाई पर बैठ गई  सोचने लगी, कि आज क्या हो रहा है, खाने की भी सुध नही रही तभी उसे अहसास हुआ कि हवेली के दरवाजे पर शायद कोई है एक गजब की फुर्ती के साथ उठी, दरवाजा खोला दरवाजे के सहारे एक शख्स बैठा हुआ था, फटे हुए कपडे, बिखरे बाल, बढ़ी हुई दाढी़ और पैंरों में टूटी हुई चप्पल दरवाजा खुलते ही उस शख्स ने मुंह मोडा देखते ही अर्चना के मुंह से निकला
लाला तुम

वह शख्स प्रमोद ही था, लेकिन वो कुछ नही बोला बस दरवाजे का सहारा लेकर खडा हो गया
लाला अंदर आऔ
प्रमोद अंदर आकर बरामदे में पडी चारपाई पर बैठ गया
अर्चना ने दरवाजा बंद कर दिया कुछ देर तक सम्पूर्ण शान्ति रही प्रमोद चारपाई पर बैठा अर्चना को देखता रहा और अर्चना खडी खडी प्रमोद को निहारती रही थोडी देर बाद अर्चना बुदबुदाई कितने सालों बाद आए हो, लाला, कुछ खबर है क्या?
शायद सात साल बादप्रमोद धीरे से बुदबुदाया
सात साल मालूम है, कितने होते हैं अर्चना ने वहीं खडे खडे पूछा
प्रमोद ने इसका कोई उत्तर नही दिया, बस धीमे से कहा, ”अर्चना बैठ जाऔ खडे खडे थक जाऔगी
सात वर्ष बीत गए, मैं अभी तक नही थकी, तुम यह कैसे सोचते हो, कि सात मिन्टों में थक जाऊंगी आज जब आए हो, तो यह तो बताना होगा कि सात वर्ष कितने होते हैं सात वर्षो का इंतजार कितना होता है
"कुछ और कहो" प्रमोद बुदबुदाया
"जवाब देना नहीं चाहते हो खैर कोई बात नही यह क्या हाल बना रखा है ढाढी़ भी बढी हुई है, लगता है, काफी दिनों से बनाई नही है, तुम तो एैसे नही थे, लाला, हर रोज शेव बनाते थे"
"बस एैसे ही" प्रमोद बहुत धीरे से बोला
"एैसे को मैं नही मान सकती हूं बोलो क्या बात है कपडे भी मैले हैं, कुछ फटे हुए भी हैं आज सात साल बाद आए हो, वो भी इस हालात में, कुछ तो बताऔ" अर्चना ने उत्सुकता के साथ पूछा
"एैसी कोई खास बात नही हैं प्रमोद फिर धीरे से बोला
"लाला मेरे सब्र का इम्तिहान न लो, सात साल बाद तुम्हे देख रही हूं और वो भी इस हालात में, मुझे चैन नही आ रहा है" अर्चना ने फिर से पूछा
"कुछ और बात कर" प्रमोद ने तेज स्वर में कहा
"लाला मैं तुम्हारा हाल पूछ रही हूं और तुम चिड गए मैं समझ सकती हूं कि तुम कुछ छिपा रहे हो शरीर के ऊपरी हाल तो सही नही लगते है, अंदर पेट के क्या हाल हैं कुछ खाया है या भूखे हो दोपहर का वक्त है, खाना खाऔगे"  
"मेरे लिए क्या बनाऔगी" ऊत्सुकतावश प्रमोद ने पूछा
"आज शायद तुम्हारा इंतजार था, इसलिए मैनें भी अभी तक कुछ नही खाया है"
"झूठ बोल रही हो, क्या, मेरा मन रखने का लिए"
"लाला आज मन बहुत बेचैन था सुबह से घर में अकेली हूं सुबह से तुम्हारी याद आ रही थी और देखो तुम आ भी गए"
"क्यों बाकी सब कहां गए"
"कल शाम की गाडी से रिंकी और मिंकी ननिहाल गए है, गर्मियों की छुट्टी हैं, कुछ दिन वहीं रहेंगें"
"श्याम के साथ गई हैं"
प्रमोद के इस सवाल पर अर्चना भौच्चकी रह गई "श्याम, तुम्हे कैसे मालूम कि वे अपने श्याम मामा के साथ गई हैं"
प्रमोद कुछ नही बोला कुछ देर तक अर्चना भी सोच में डूब गई और फिर प्रमोद से पूछा "लाला मुझे एैसा लगा कि तुम अभी नवगांव आए हो, लेकिन जब तुम्हे श्याम के यहां आने का पता है, तो तुम पहले भी आए होगे श्याम तो एक सप्ताह से यहां था बोलो लाला क्या तुम पहले भी आए थे?"
"जिस रेलगाडी से श्याम आया था, मैं भी उसी गाडी में था स्टेशन पर उतरते उसे देखा, इसलिए पहले नहीं आया कल शाम को बच्चों के साथ स्टेशन जाते देखा, तो आज आया सुबह इदरीश और दूसरे नौकरों को मंडी जाते देखा, इसलिए दोहपर को आया कि एकान्त में तुम मिलोगी"
"एक सप्ताह से तुम नवगांव में हो और तुम्हारा बच्चों से भी मिलने का दिल नही किया मेरी तो छोडो, मुझे तो तुमने सात साल पहले ही छोड दिया था, कम से कम बच्चों से तो मिलने आ जाते, कितने निष्ठुर हो तुम, अभी तक नहीं बदले आखिर हम सब ने हालात से समझोता कर लिया है कम से कम एक सप्ताह ही मेरे साथ नहीं तो बच्चों के साथ ही रह लेते वे एक बार अपने पिता से मिल लेते कहां रहे एक सप्ताह लाला तुम?"
"तुम खाना खिलाने का कह रही थी" प्रमोद ने बीच में बात काटते हुए कहा
"औहो, मैं तुमसे मिलने की खुशी में भूल ही गई कि मैंनें खुद तुमसे खाना पूछा और फिर बातों में लग गई लेकिन क्या करूं, आज सात साल बाद पति से मिल रही हूं, खुशी में समझ ही नही आ रहा हैं कि क्या करूं और क्या न करूं" कहते कहते अर्चना रसोई में खाना बनाने लगी उसने खुद भी तो कुछ नहीं खाया था रसोई से उसने आवाज लगाई, "लाला सब्जी बनने में समय लगेगा, आलू की पराठी बना दूं, दही के साथ, लाला तुमको अच्छी लगती है, मुझे मालूम है"
"जब से मैं आया हूं, लाला लाला लगा रखा है, बंद कर लाला कहना" प्रमोद ने कुछ तेज स्वर में कहा
"लाला तुम तो नाराज हो गए अच्छा तुम्हे मालूम है न, शादी के दूसरे दिन, मैं डोली से उतरी थी, सुबह सुबह का समय था, पहले तो दुकान का एक कर्मचारी उसका नाम याद नही आ रहा है, खैर छोड,  हां फिर इदरीश खेतों से फलों और सब्जियों के बोरे तांगे में भर कर लाया था उसने तेज आवाज में कहा था, लाला संभालों ताजे फल और सब्जियां पहले तो मैं सोच में पड गई थी कि लाला ससुरजी के लिए कह रहा हैं, लेकिन जब दुबारा तुम्हे लाला कह कर बुलाया तो मेरी हंसी छूट गई थी, तब से मैं तुम्हे लाला कहती हं कितना प्यारा नाम है, लाला"
अपने गुस्से पर काबू रख कर प्रमोद ने कहा "कहां गई तुम्हारी पराठी"
"बस सब्र करो, बन गई" और प्लेट में दही के साथ आलू की पराठियां लेकर रसोई से अर्चना आई प्रमोद को बैचेनी से चहल कदमी करते देख अर्चना बोली "यह क्या लाला, इतनी बैचेनी किस बात की, तसल्ली से खाना खाऔ"
"तुम नहीं खाऔगी, कह रही थी कि खाना नही खाया" प्रमोद ने पूछा
"सच कहूं लाला, सात साल बाद तुम्हे देख कर भूख खत्म ही हो गई है"
प्रमोद खाना खाता रहा और अर्चना बावलों की तरह टुकुर टुकुर अपने लाला को देखती रही खाना खाने के बाद प्रमोद ने बैग में से कुछ कागज निकाल कर अर्चना से कहा, "इन पर अपने साईन कर दो
बिना पढ़े अर्चना उन कागजों को अपने हाथों में नचाती हुई बोली, "क्या लिखा है इन कागजों में, बताऔ न लाला, कुछ तो कहो, मेरी बेचैनी बढती जा रही है, प्रेम का इजहार किया है क्या, मुंह से नही, लिख कर कहना चाहते हो क्या आज भी मुझे अपने दिल के किसी कोने में बिठा कर रखा है तूने लाला? प्रेम पत्र हैं न लाला, मेरे से नहीं पढ़ा जाएगा, अपने मुंह से कहो तुम्हारे मुंह से सुनना चाहती हूं, लाला"
"अर्चना, ये कोई प्रेम पत्र नहीं है स्टांप पेपर हैं, अपने साईन कर दो, मेरे पास अधिक समय नहीं है"
"यह क्या लाला, समय नहीं है, अभी तो कह रहे थे कि एक सप्ताह पहले श्याम के साथ गाडी में आए थे, एक सप्ताह कहां थे, यह भी नहीं बता रहे हो, और अब कहते हो कि समय नहीं है" अर्चना ने बढे प्यार से लाला के कंधों पर हाथ रखते हुए पूछा
"देख मैं नही चाहता कि कोई यहां आ जाए और झगडा हो, इसलिए अपने साईन कर दो किसी के आने से पहले तुम कागजों पर साईन कर दो और मैं चला जाऊंगा"
"कौन आऐगा यहां लाला बच्चे श्याम मामा के संग गए हैं, अब वे बीस दिन के बाद ही आऐगें मैं घर में अकेली, इतनी बडी हवेली में बिल्कुल अकेली, सिर्फ अपने लाला के संग"
"इससे पहले इदरीश और दूसरे नौकर आए, मैं यहां से जाना चाहता हूं"
"इदरीश को तो रात हो जाऐगी वापिस आने मैं इस बार आम की बहुत अच्छी फसल हुई है लंगडा आम, बडे बडे साइज का बहुत अच्छे रेट मिले हैं मैंनें इदरीस को नवयुग सिटी भेजा है, आम और सब्जियों के साथ अपने देवरों और ननदों के पास तुम्हे मालूम तो होगा, हर साल सबके बच्चे सर्दियों में यहां रहने आते हैं, एक तुम ही नहीं आते और जब तुम सात साल बाद आए हो, तो जाने की जल्दी कर रहे हो अगर तुम्हारा पता मालूम होता तो जरूर भेजती आम अपने हाथों से एक एक लंगडे आम का दाना चुन चुन कर भेजती, लेकिन देवर, ननद तो तुम्हारा नाम भी नहीं सुनना चाहते"
"देख अर्चना जल्दी से साईन कर दे शाम की आखिर गाडी से वापिस लौटना है रात यहां नहीं काटनी" प्रमोद की आवाज में उतावलापन था

प्रमोद की जल्दबाजी को देख कर अर्चना ने कागज खोल कर पढ़ने शुरू किए, जैसे जैसे पढ़ती गई, उसके माथे की त्यौरियां चढती गई जहां अभी प्यार से कंधे पर हाथ रखा था, वहीं जोर से प्रमोद को झटके के साथ धक्का दिया
"यह क्या लाला, सात साल बाद तुम सिर्फ मेरे पास मेरे मुंह से निवाला छीनने आए हो लानत है तुम पर तुम पर क्या मेरे खुद को लानत है, सात साल बाद भी तुम्हे भुला नहीं पाई और तुम मुझसे रोटी और रहने की छत छीनने आए हो लाला क्या सोच कर आए हो यहां मैं चुपचाप भारतीय नारी की तरह इन कागजों पर साईन कर दूंगीं अगर मैं यूरोप, अमेरिका में होती तो जिस दिन तुम मुझे छोड कर उस के पास चले गए थे दूसरी गृहस्थी बसाने के लिए, मैं भी दूसरी क्या, तीसरी, चौथी गृहस्थी बसा लेती लेकिन भारत में आज भी यह संभव नही है आज मैं ससुरजी की दूरदर्शिता की दाद देती हूं कि उन्होने तु्म्हारी तरह मझधार में नहीं छोडा नवगांव के खेत उसी दिन मेरे नाम कर दिए थे, जिस दिन तुम नवयुग सिटी का मकान बेच गए थे, ताकी मेरा और दोनों बच्चों की कम से कम रोटी का तो जुगाड हो सके  नहीं करूगीं इन कागजों पर साईन, मेरी दो बेटियां हैं उनको स्वावलंभी बनाऊंगी ससुरजी ने तीन कोठियां तुम तीन भाईयों के लिए बनवाई थी और यह हवेली मेरे और तुम्हारी दो बहिनों के नाम है मेरा तो तीसरा हिस्सा है, लाला, नहीं दूंगी दो हिस्से बहिनों से ले सको तो ले लो, लाला अपना हिस्सा नही दूंगी"

प्रमोद ने अर्चना को मजबूती से पकड कर कहा, "साईन कर दे"

अर्चना ने उससे दुगनी शक्ति के साथ प्रमोद को धक्का दिया और खूंखार आवाज में कहा, "लाला, पांच करोड़ रुपये की कोठी बेची थी, व्यापार में से भी पांच करोड़ रुपये मिले थे, क्या किया दस करोड़ का उस गद्धी पर लुटा दिए"
"तमीज से बात कर वह मेरी ब्हायता है"
"ब्हायता तो मैं कौन हूं बोल लाला, चुप क्यों हो इस परी को छोड कर उस गद्धी के पास चला गया तू लाला, उफ नहीं की आंखे बिछा कर इंतजार करती रही तुम्हारी जुदाई ने लाला मुझे उम्र से पहले बूढी कर दिया, जब ब्याह कर आई थी, सब मुझे परी कहते थे लाला तुमने परी को छोड गद्धी के साथ जीवन बिताना चाहा, मैं चुप रही लोग सही कहते हैं जब गद्धी पर दिल आ जाए तो परी क्या चीज है लेकिन अब नही लाला, एक तेज स्वर में लाला चले जाऔ, यहां से अब मत रुको यहां" इसके साथ जोर से धक्का दिया प्रमोद को अर्चना एक खूंखार शेरनी की तरह प्रमोद पर झपटी और धकेलती हुए हवेली के दरवाजे तक आ गई स्टांप पेपर फाड कर प्रमोद के मुंह पर फेंके "चले जाऔ लाला, चले जाऔ"

अर्चना के धक्के से प्रमोद दरवाजे से जा टकराया, तभी बाहर ट्रैक्टर के रूकने की आवाज आई अर्चना जान गई कि इदरीश जल्दी वापिस आ गया है अर्चना ने जोर से आवाज लगाई, "इदरीश" इदरीश दूसरे नौकरों के साथ हवेली के अंदर आ कर कुछ देर तक प्रमोद को देखते रहे
इदरीश ने प्रमोद को कहा "लाला तुम कब आए"
"इदरीश लाला को कहो, यहां से चला जाए"
इदरीश के कुछ कहने से पहले ही प्रमोद तेजी से निकल गया
अर्चना ने जोर से चिल्ला कर कहा, "लाला, जाने से पहले अपना पता बताते जाऔ, तलाक के कागज मैं खुद तुम्हे भेज दूंगी, लेकिन हवेली और खेत पर नजर मत रखना, लाला सब कुछ लुटा कर मेरे पास सिर्फ रुपयों की खातिर आए लाला इससे अच्छा तो मत आते, लाला मत आते लाला मैंनें तेरी आस क्यों लगाई लाला?"

प्रमोद जा चुका था अर्चना दरवाजे की चौखट पकड कर पता नही कब तक रोती रही शाम का अंधेरा बढ़ने लगा इदरीश ने रौशनी की और अर्चना को कहा,"बीबी, कब तक रोऔगी, अंदर आ जाऔ तुम फ्रिक मत करो, लाला तुम पर अंगुली भी नही रख सकता बेफ्रिक रहो मैं श्याम मामा को खबर करता हूं अच्छी खबर लेंगें लाला की"

धीरे धीरे गुमसुम सी अर्चना कमरे में आ गई

जगमग

दिये जलें जगमग दूर करें अंधियारा अमावस की रात बने पूनम रात यह भव्य दिवस देता खुशियां अनेक सबको होता इंतजार ...