Tuesday, December 25, 2012

जय से दोस्ती

नये सत्र में स्कूल का आज दूसरा दिन, जय अब पांचवी कक्षा में पहुंच गया। नये सत्र के पहले दिन बस दुर्घटना के कारण छुट्टी हो गई थी। सुबह प्राथना सभा के बाद नई कक्षा में सभी बच्चों ने अपनी अपनी सीटों पर बैठना शुरू किया। सभी छात्रों ने पिछली कक्षा के अनुसार सीटों का चुनाव किया। मैडम सहगल ने कक्षा में प्रवेश किया।
गुड मॉर्निंग मैम।
गुड मॉर्निंग स्टूडेन्टस। आज से आपका नया सत्र शुरू हो रहा है और आपका सीटिंग आपके रिजल्ट के हिसाब से बनाया गया है। जिन बच्चों के अधिक नंबर आए है, उनके साथ कम नंबर वाले बच्चों की सीटिंग की गई है।
सभी बच्चों को इस नए क्रम में बिठाया गया। रक्षित के साथ सीट खाली रही। रक्षित सोच में डूब गया, क्या वह अकेला बैठेगा। दो दो बच्चों की जोडी अच्छी रहती है। बच्चों में दोस्ती बनती है। आपस में पढाई से खेल कूद तक सभी में साझीदार बनते है।
मैम मेरे साथ कौन बैठेगा।रक्षित ने उदास हो कर पूछा।
रक्षित तुम्हारे साथ नया छात्र जय बैठेगा। वह एक होनहार और प्रतिभाशाली विद्यार्थी है। इसी सत्र में उसका दाखिला हुआ है।
तभी जय ने कक्षा में प्रवेश किया और मैडम सहगल ने उसे रक्षित के साथ बिठाया। जय रक्षित की उम्र का, लेकिन कद में थोडा लम्बा और बदन गठीला। एक पहलवान की तरह शरीर जय का। लंच अंतराल में रक्षित और जय में बातचीत हुई। दोनों ने अपने टिफिन खोले और नाश्ता करते हुए बाते करते रहे।
रक्षित – तुमने नया एडमिशन लिया।
जय – हां, कल में आया था, लेकिन छुट्टी हो गई थी।
रक्षित – तुम्हे पता है, कल बस दुर्घटना के कारण छुट्टी हुई थी। जिस बस में मैं आता हूं, उस बस का भी।
जय – अच्छा, तुम्हे चोट आई क्या?”
रक्षित – मुझे सुबह उठने में देर हो गई थी, मेरी बस छूट गई थी। पापा ने कार में स्कूल छोडा। यहां आया तो मालूम हुआ, कि बस दुर्घटना के कारण छुट्टी हो गई।
जय – देर से क्यों उठे। 
रक्षित – मेरे सपने में शेरां वाली मां आई थी, कहने लगी, कि पापा की कार में स्कूल जाना। मेरे साथ बहुत देर तक बाते करती रही, और इस कारण देर से आंख खुली। स्कूल बस छूट गई और मैं पापा की कार में स्कूल आया। शेरांवाली मां ने मुझे ऐक्सीडेन्ट से बचा लिया।
जय – तुमने सपना देखा होगा। शेरावाली तुम्हारे सपने में कैसे आ सकती है।
रक्षित – सच्ची बोल रहा हूं। मेरे सपने में आई थी, मेरे से बहुत देर तक बाते करती रही। शेरांवाली ने मुझे बचाया है।
जय – तुम सच कह रहे हो।
रक्षित – एकदम सच। मैं झूठ कभी नही बोलता।
लंच अंतराल के बाद पढाई शुरू हो गई। स्कूल छुट्टी के बाद रक्षित रूट नंबर 5 की बस में बैठा। जय भी उसी बस में बैठा।
रक्षित प्रफुल्लित हो कर – जय तुम भी। कहां रहते हो।
जय – मैं सेक्टर 13 में रहता हूं।
रक्षित – मैं भी 13 सेक्टर में रहता हूं।
जय – कौन सी सोसाइटी में रहते हो।
रक्षित – मैं पिंक सोसाइटी में रहता हूं।
जय – में सूर्या सोसाइटी में रहता हूं।
रक्षित – वो देखो मेरी छोटी बहन रक्षा, तीसरी कक्षा में पढती है।
रक्षा अपने दोस्तो के साथ बाते करती आ रही थी और रक्षित के पीछे वाली सीट पर बैठ गई।
रक्षित – पहले कौन से स्कूल में पढते थे।
जय – मैं पहले बरेली में रहते था। मेरे पापा बैंक में काम करते है। अभी दिल्ली में हस्तांतरण हुआ है। तुम पहले कहां रहते थे।
रक्षित – मैं तो नर्सरी से इसी स्कूल में पढ रहा हूं।
बातों बातों में घर घर आ गया। सभी बस से उतरे। घर में घुसते ही रक्षित ने मां सारिका को जय के बारे में बताया, कि वह उसका देस्त बन गया है, तो रक्षा ने भी बताया, कि उसकी क्लास में वृन्दा ने नया एडमिशन लिया है और वह भी सेक्टर 13 में सवेरा सोसाइटी में रहती है। सारिका ने दोनों को कहा – पहले हाथ मुंह धो कर खाना खा लो, फिर अपने दोस्तों के बारे में बताना। तुम दोनों बहुत उत्तेजित हो, अपने नए दोस्तों से मिल कर।
क्योंकि मैडम ने हमें एक ही सीट में बिठाया है। रक्षित और रक्षा दोनों एक ही स्वर में एक साथ बोले। 

Sunday, December 16, 2012

तैयारी

शहर से दूर प्रकति की गोद में छोटी छोटी पहाडियों के बीच एक छोटा सा गांव, जिसका नाम नवगांव। गांव के अंतिम छोर पर छोटे छोटे मकानों की पंक्तियों के बाद एक कोठी शहर वालों की कोठी के नाम से मशहूर, जिसके गेट पर द्वारकानाथ अंकित है। शहर के धनी सेठ द्वारकानाथ ने शहर से दूर नवगाव में आराम के लिए एक कोठी का निर्माण करीब तीस वर्ष पूर्व किया। जब बच्चे बढे हो गए, व्यापार संभाल लिया, तब द्वारकानाथ ने अपना निवास नवगांव में कर लिया। आज द्वारकानाथ नही है, उनके स्वर्गवास को दो साल हो गए, तब से कोठी लगभग वीरान ही है। द्वारकानाथ के पौत्र सुधीर कभी कभी एक दो दिन के लिए आते थे। कोठी की देखभाल पुराने नौकर बब्बन करते है। बब्बन वहीं नवगांव के निवासी को नौकर कहे या केयरटेकर, कुछ भी कह सकते हैं। द्वारकानाथ के स्वर्ग सिधारने के बाद शायद ही किसी ने नवगांव की कोठी की सुध ली हो।

प्रकृति से प्यार करने वाले ही नवगांव की कोठी की परख कर सकते थे। दो एकड के क्षेत्रफल में फैली कोठी को सेठ द्वारकानाथ ने बडे लगन, चाव और मेहनत से बनवाया था। आठ फुट ऊंची दीवारों के ठीक बीचों बीच साधारण किन्तु सभी सुविधायों से युक्त रहने के लिए चार बेडरूम के साथ बाथरूम, एक बडी बैठक, एक मेहमानों के लिए कमरे के साथ रसोई। मेन गेट से सीधे कोठी के लिए मोटर का पक्का रास्ता। कोठी के एक तरफ खूबसूरत बगीचा और दूसरे तरफ खेत में सब्जियां। चारदीवारी के साथ साथ फलदार वृक्ष। पपीता, केला, जामुन, अमरूद के वृक्ष फलों से लदे हुए एक अदभुद अनोखी सी छटा प्रदान करते है।

बब्बन को आज कान खुजाने की भी फुरसत नही थी। कोठी की साफ सफाई में पूरी तरफ व्यस्त। गांव के कुछ नौजवानों को भी काम पर लगा रखा था।

बब्बन मियां थका दिया आपने। मालिक आपके आ रहे है, थका हमें दिया। दोपहर हो गई। खाना तो खिलाऔ, मियां। अब तो खाना खा कर आराम करेगें। बाकी काम कल करेगें। सुजाद की यह बात सुन कर बब्बन भडक गया। कल के छोकरे दो मिन्टों में थक जाते हैं। कामचोर हो। जरा सा काम बता दो, बहाने निकालते हैं। ढेर सारा काम क्या तुम्हारा बाप करेगा। बब्बन गुर्राया।
बब्बन की बात पर सुजाद ने भी फिकरा कस दिया - बाप से ही करा लो। मैं तो चला। कह कर सुजाद उठा और आवाज लगाई, चलो शमशाद, कबीर और मुस्तफा, चलो। बब्बन मियां सठिया गए है। भोजन करने नही दे रहे है। भूखे पेट भजन नही गौपाला। मियां बब्बन अपने आप कर लेगें।

सबको उठता देख बब्बन थोडा नरम हुए। सुजाद का हाथ पकड कर बोले – बच्चे के बच्चे रहोगे। बडे कभी मत बनना। काम को क्या कह दिया, रोटी याद आ गई। खुदा गवाह है। बब्बन ने कभी किसी को भूखा नही रखा है। अगर हिसाब लू तो रोटी भूल जाऔगे। पेडों से कितने अमरूद, पपीते, केले और जामुन तोड तोड कर खाए हैं।
सुजाद कौन सा कम था। बब्बन पर रौब डालने लगा – मियां बब्बन, तोते चोंच मार कर खराब कर दे, वो अच्छा, हमने दो, चार क्या तोड लिए। हिसाब करने लगे।
सुजाद को गर्म देख बब्बन ने कहा – आधे घंटे की मोहलत देता हूं, सुजाद, खाना यहीं बन रहा है। चलो आधा घंटा आराम और फिर खाना गरमा गरम। लेकिन याद रहे, काम आज ही खत्म करना है। कल की बात नही सुनुगा।
पूरी रात लगा देगें, मियां बब्बन लेकिन एक शर्त है, रात को एक एक पउआ मिलना चाहिए। सुजाद ने बब्बन के कान में कहा।
तौबा तौबा, कल के पैदा हुए लौंडे बाप समान बब्बन से पउआ मांगते है। अपने बाप से मांग जाकर। बब्बन ने एक लात सुजाद को लगाई।
सुजाद थोडा नरम हो गया – बाप की उम्र के हो, इसलिए छोड देता हूं, लेकिन पउआ लूगां जरूर।
तौबा तौबा। लौंडे बिना पउए के मानेगें नही – बब्बन ने एक लात सुजाद को और लगा दी।
कितनी लातों के बाद पउआ दोगे – कह कर सुजाद टांगे पसर कर वही लंबा लोट गया।
कुछ मिन्टों बाद बब्बन ने आवाज लगाई – उठ सुजाद और अपने लौडों को भी कह, खाना खा ले।
खाना तो खाना ही है, पहले पउए का पक्का कहो – लेटे लेटे ही सुजाद बोला।
भूत छोडे, पिशाच छोडे, मगर बिना पउए के तू ना छोडेगा। तौबा, तौबा – कानों को हाथ लगा कर बब्बन ने कहा, ले लेना पउए के पैसे।
यह सुन बिजली की तेजी जैसी फुर्ती सुजाद के बदन में आई और आवाज लगाई – उठो लौडों, खाना खा कर कमर कस लो, काम शाम से पहले पूरा नही किया, तो खाल में भूसा भरवा दूंगा।

खाना खाने के बाद सभी काम पर जुट गए। शाम तक कोठी की सारी सफाई कर दी। दो साल बाद कोठी चमकने लगी। जाने से पहले सुजाद ने बब्बन को पकड लिया – पउए के पैसे।
बाप से भी पैसे मांगते हो पउए के – बब्बन पैसे देते हुए बोला।
बाप भी तो रोज पीता है। शर्म कैसी। बेटे जवान हो जाते है, तो बाप के साथ बैठ कर पीते हैं। - सुजाद की यह बात सुन कर बब्बन बडबडाने लगा – यह सब फिल्मों की सोहबत है। बिगाड दिया है, फिल्मों के साथ टीवी सीरियलों ने।
बडबडाते बब्बन से सुजाद ने चुटकी ली – कुछ कहा क्या।
तौबा, मेरे बाप की तौबा, कि बरखुरदार आप से कुछ कह दूं। मैं तो सोच रहा था, कि कल क्या करना है। - बब्बन ने बात पलटी।
मन ही मन सुजाद ने कहा – साला बुड्ढा, कुडता है हमारे से। काम करवाना है, तो हमारी माननी पडेगी।


अगले तीन चार दिनों तक जी जां एक कर बब्बन के नेतृत्व में सभी ने कोठी को चमका दिया। दो वर्ष तक धूल चाटती कोठी आज बोलने लगी – मुझे साफ सुधरा रखो, मुझसे बात करो, मैं चार दीवार नही हूं, आपका सदस्य हूं। आपका अंग हूं। आपके संग हूं। नवगांव के सभी बाशिन्दे कोठी को आकर देख रहे थे, जैसी वह किसी शहर की इतिहास से जुडी पुरानी इमारत हो। नवगांव के लिए तो यह किसी किले से कम नही। सभी जुबां पर यही बात थी, कि कोठी में मालिक रहने आ रहे है, यह नवगांव के लिए शुभ खबर है। पहले जब भी सेठ द्वारकानाथ रहते थे, नवगांव की भलाई, तरक्की के लिए कुछ न कुछ करते रहते थे। शहर में बडे अफसरों से मिलते थे। ट्यूबवैल लगवा दिए। सडके बनवा दी। बिजली का काम भी करवाया, यह और बात है, कि चाहे दो घंटे आए। नवगांव का हर नागरिक कोठी में रहने के लिए आने वालों का बेसबरी के साथ स्वागत करने को तैयार था।   

Sunday, November 25, 2012

वो बच्चे


रेड लाईट यानी लाल बती (बोल चाल की भाषा में, जिसे हर व्यक्ति कहता हैं, अनजाने मे मुंह से निकल ही जाता है, चाह कर भी ट्रैफिक सिगनल नही कहा जाता हैं) पर जैसे ही कार रूकी, वैसे ही तरह तरह के भिखारी और सामान बेचने वाले विभन्न कारो की तरफ लपकते हैं। बडा मुश्किल हो जाता है इन भिखारियों से पीछा छुङवाना। जब तक ग्रीन लाईट यानी हरी बती नही हो जाती है और कार आगे नही बढ जाती है, भिखारी आप का पीछा नहीं छोङते हें. अब तो इन के साथ साथ हिजडों ने भी कई ट्रैफिक सिगनल पर परेशान करना शुरु कर दिया है। सबसे अघिक परेशान अब सपेरे करते हैं, यदि गल्ती से खिडकी का शीशा खुला रह जाए, तब सपेरे सांप को आपकी कार के अंदर ही डाल देते हैं। आप चाह कर भी पीछा नहीं छुडा़ सकते हैं। एक तो आपकी धिध्गी ही... बाकी आप खुद ही सोचे कि सांप को देख कर कौन नहीं डरता है, और क्या स्थिती हो सकती है?
कार का शीशा बंद कर लो। मैनें पत्नी से कहा।
गरमी में शीशा बंद करने से घुटन होती है। पत्नी ने कहा.
डेश बोर्ङ पर रखे सामान पर नजर रखना। आंख बचा कर मोबाईल फोन, पर्स चुरा लेते हैं। इन छोटे बच्चों पर भरोसा नहीं कर सकते हैं। अक्सर ही अखबारों में पढ़ते रहते हैं। मैनें कहा
फिर्क मत करो। पत्नी ने कहा।
इतने में एक छोटी सी लड़की कार के दरवाजे से सट कर खडी हो गई और पत्नी से भीख मांगने लगी। जब तक इन्को कुछ दे ना दो या फिर कार आगे नहीं बढा लेते हैं, तब तक मजाल है कि आप का पीछा छूट जाए।
कुछ सोचने के बाद पत्नी ने एक सिक्का निकाल कर उस छोटी सी लड़की को दे दिया। वह लड़की तो चली गई, लेकिन उसके जाने के फौरन बाद ही एक और छोटा सा लड़का पता नहीं कहां से आ टपका और कार से सट कर ऐसे खडा़ हो गया, जैसे कार ही उसकी है। और हम जबरदस्ती उसकी कार में खाम्ह-खव्हा ही बैठे है। 
एक को दो तो दूसरो से पीछा छुड़वाना मुश्किल हो जाता है। जब तक हरी बती नही हो जाती है, इसको कुछ मत देना, नही तो तीसरा बच्चा आ जाएगा।
इससे पहले उससे पीछा छुडवाना मुश्किल हो जाता। हरी बती हो गई और कार स्र्टाट कर के आगे बढ़ गए।
इन छोटे छोटे बच्चों को भीख मांगते देख कर बडा दुःख होता है।. स्कूल जाने की उम्र में पता नहीं क्या क्या करना पड़ता हैं इनकों। बचपन ही खराब हो जाता हैं। पत्नी ने कहा।
यह हम सोचते हैं, लेकिन भीख मांगना इनके लिए तो एक बिजनेस की तरह है। रोज इस सड़क से गुजरता हूं।, ऑॅफिस जाने के लिए, इस लाल बती पर रोज इन्हीं भिखारियों कों सुबह या शाम हर समय देखता हूं। कोई नया भिखारी नजर नहीं आता हैं। हर लाल बती पर वोही परिचित भिखारियों के चेहरे नजर आते हैं। मजे की बात यह कि, भिखारी सिर्फ कार वालों से ही भीख मांगते हैं। लाल बती पर कभी इनकों स्कूटर, बाईक या साईकल वालों से भीख मांगते नहीं देखा है। लाल बती होते ही कारों की तरफ दोड़ते नजर आते है ये भिखारी। आज के जमाने में हम जैसे मिडिल क्लास वाले भी कारों में बैठते हैं। मैनें कहा।. लेकिन भिखारियों की सोच हमसे अलग है। वे तो कार वालों को अमीर और स्कूटर बाईक वालों को गरीब समझते हैं। भिखारियों के साथ साथ अब सामान बेचने वालो से भी सावधान रहना पड़ता है।
छो¨डो़ इन बातो को। पत्नी ने कहा। कभी कभी तरस आता है।
फायदा क्या तरस दिखाने का?” मैनें कहा। जरा ध्यान रखना, फिर से लाल बती आ गई।
अपनी भाषा कभी नहीं सुधार सकते क्या? लाल, हरी बती क्या होती है। ट्रैफिक सिगनल नहीं कह सकते क्या?” पत्नी ने कहा।
फर्क क्या पडता है, बती तो लाल और हरी ही है। मैनें कहा।
बहुत पडता है। मैनर्स का फर्क पडता है। हमेशा सही बोलना चाहिए। अगर तुमहे किसी को ट्रैफिक सिगनल पर मिलना हो, और तुम उसे लाल बती पर मिलने को कहो, और मान लो, यदि ट्रैफिक सिगनल पर हरी बती हो या फिर बती खराब हो, तो आपने उसे सही स्थान नही बताया है। और वह व्यक्ति क्या करेगा, अगली लाल बती पर आप का इंतजार करेगा, जो कि गलत होगा। इसीलिए हमेशा सही शब्दों का प्रयोग करना चाहिए। पत्नी ने कहा।
अब इस बहस को बन्द करते है। फिर से बती लाल हो गई है।
इस बार एक छोटा सा बच्चा मेरी तरफ आया। बच्चा सात आठ साल का रहा होगा.
अंकल, टायर, एक दम नये हैं। सिएट, एमआरएफ लोगे। बच्चा बोला।
मैं चुप रहा।
एक बार देख लो। बच्चा बोला।
मैं फिर चुप रहा।
अंकल सस्ता लगा दूंगा। बच्चा बोला।
नहीं लेना। मैंने कहा।
एक बार देख तो लो। देखने के पैसे नही लगते। बच्चा बोला।
अगर देखने के पैसे नहीं लगते, तब कितने का देगा। मैंने कहा।
मारुती 800 का नया टायर शोरुम में हजार ग्यारह सौं मे मिलेगा। आपके लिए सिर्फ 800 रुपये में। बच्चा बोला।
मेरे लिए सस्ता क्यो? मेरे साथ तेरी कोई रिस्तेदारी लग नहीं रहीं। मैंने कहा।
कितने दोगे। बच्चा बोला।
टायर चोरी का तो नहीं? मैंने कहा।
हम लोगों की कम्पनी में सेटिंग हैं। इसलिए सस्ते मिल जाते हैं।
रीटरीड़ टायर तो नही है। मैंने कहा।
बिलकुल नहीं। बच्चा बोला।
कितने में टायर लाते हो?”
सिर्फ 50 रुपये कमाते हैं।
“50 रुपये में टायर देगा।
नहीं लेना तो मना कर दो, क्यो बेकार में मेरा टाइम खराब कर रहे हो। बच्चा बोला।
टायर बेचने बेटे तुम आए थे। मैं चल कर तुम्हारे पास नहीं आया था। मैंने कहा।
सीधे मना कर दो। बच्चा बोला।
मना किया था, लेकिन फिर भी तुम चिपक गए थे। मैंने सोचा, चलो जब तक लाल बती है, तेरे साथ टाइम पास कर लूं। मैंने कहा।
टाईम पास करना है तो आंटी के साथ करो। मेरा बिजनिस टाईम क्यों खराब कर रहे हो। कह कर बच्चा चला गया।
बात तो बच्चा सही कह गया। मेरे साथ बात नही कर सकते थे। टाईम पास करने के लिए वो बच्चा ही मिला था। ऊपर से जली कटी बातें भी सुना गया। पत्नी ने कहा।
आ बैल मझे मार। चुप रहो तो मुसीबत। पीछा नहीं छोडते, बोलो तो जली कटी सुना जाते हैं। मैंने कहा।    
जब टायर लेना नहीं था, तो उसके साथ उलझे क्यो। पत्नी ने कहा।.
एक बार मना कर दिया था, अब वो खुद ही उलझे तो कोई क्या करे। मैंने कहा।
दिल्ली की सडकों पर कार को ड्राईव करना एक कला से कम नहीं है। इस सम्पूर्ण कला में माहिर व्यक्ति को ड्राईविंग के अलावा संयम मे भी महारत हासिल करनी पड़ती है वरना ड्राईविंग मे कहीं भी चूक हो सकती है। ऐसे ही बातों बातों मे घर आ गया।    
दिल्ली शहर की भाग दौड़ की जिन्दगी में घर और ऑॅफिस एक रूटिन है। इतनी जल्दी में दिन बीत जाते हैं कि अपने से भी बात करने का समय निकालना मुश्किल हो जाता है और कभी कभी तो सुबह की प्रार्थना भी छूट जाती है। एक दिन लौंग ड्राईव का कार्यक्रम बना कर वृन्दावंन के लिए रवाना हुए। इस बहाने चलो कुछ अघ्यातमिक ही हुआ जाए। भगवान के दर्शन के साथ साथ मन को सुकून भी मिलेगा। सुबह सुबह अपनी कार में रवाना हुए। खुश नुमा मौसम और सुबह के समय खाली सड़के, कार ड्राईव का आनन्द ही निराला हो जाता है। फरीदाबाद की सीमा समाप्त होते ही खुला चौड़ा हाईवे और साफ सुथरा वातावरण से मन और तन दोनों ही प्रसन्न हो जाते हैं। बीच बीच में छोटे छोटे गांव और कस्बों से गुजरते हुए वृन्दावन पहुंचे। कार को पार्किंग में रख कर श्री बांके बिहारी जी के दर्शन, इस्कान मंदिर, निधी वन और दूसरे मंदिरों के दर्शनों के बाद चित प्रफुल्लित हो गया। छोटे बड़े मन्दिरों में दर्शन करने के बाद और बाजार में लस्सी, भल्ला, टिक्की, कचौडी खाने के बाद पार्किंग में पहुचे।
आज के दिन यहीं रूक जाते हैं, गेस्ट हाउस में। मैंने कहा।
इस बहाने थकान भी खत्म हो जाएगी। कल सुबह वापस चलेगें। पत्नी ने कहा।
कार के पास जाने पर जेब से चाबी निकाली। कार का दरवाजा खोलने के लिए चाबी को दरवाजे पर लगाया और चाबी घुमाई, तभी एक छोटा सा बच्चा आ कर दरवाजे से सट कर खडा़ हो गया और बोला
अंकल पैसे।
भिखारियों को मैं कभी पैसे नहीं दिया करता हूं, लेकिन पता नहीं क्यो, मैं खुद नहीं जानता, जेब मे हाथ चला गया और एक रूपये का सिक्का निकाल कर उस छोटे से बच्चे को दे दिया।
वह छोटा सा बच्चा तो चला गया, लेकिन उसके जाने के बाद पता नहीं कहां से छोटे बच्चो का एक झुंङ आ गया और चारों तरफ से घेर लिया.
अंकल पैसे। एक के बाद एक ने कहना शुरू किया.
मैंने एक बार पत्नी की तरफ देखा.
पत्नी ने कुछ नहीं कहा, लेकिन चेहरे का भाव कुछ ऐसे था, कि कह रही हो, अब खुद ही भुगतो।
एक बार जी मे आया कि डांट मार कर सबको भगा दूं। लेकिन पता नहीं क्यो, चारो तरफ शत्रुऔ से घिरा पा कर चुपके से जेब में हाथ डाल कर एक एक सिक्का हर बच्चे को देता गया। किसी बच्चे को एक रूपये का और किसी बच्चे को दो रूपये का सिक्का मिला। किसी के साथ भेदभाव नहीं था। जो सिक्का हाथ मे आया, देता चला गया. यह एक संयोग हुया कि जेब मे दो सिक्के रह गये और बच्चे भी दो रह गये। एक बच्चे को पांच रूपये का सिक्का चला गया और आखरी बच्चे को पचास पैसे का सिक्का मिला।
क्यो अंकल, उसे पांच रूपये और मझे पचास पैसे। और पैसे निकालो।
जितने सिक्के थे, खत्म हो गए हैं, और सिक्के नहीं हैं, अब आप जाऔ।
ऐसे कैसे चला जाऊ। बच्चे ने कहा।
और पैसे मैं नहीं दूंगा। सारे सिक्के अब खत्म हो गए हैं, कार के दरवाजे से हटो। मैंने कहा।
मतलब ही नही जाने का। फटाफट पैसे निकालो। दूसरे बच्चे दूर चले गए हैं। उन्हें भाग कर पकड़ना हैं। जायदा टाईम नहीं है, मैंरे पास। अंकल तेरे पास पैसे खत्म हैं तो आंटी के पास होंगे पैसे। अब बच्चे ने पत्नी की तरफ देखते हुए कहा। आंटी पर्स से फटाफट पैसे निकालो।
मैं और मेरी पत्नी दोनों एकदम अवाक और एक दूसरे की शक्ल देखने लगे।
हम दोनो का चेहरा एक दम पीला, जैसे कोई चोरी करते पकडे गए हो।
पत्नी ने चुपचाप पर्स से एक पांच रूपये का सिक्का निकाल कर उस बच्चे को दिया।
पांच रूपये का सिक्का पा कर छोटा बच्चा फौरन नौ दो ग्यारह हो गया।
जाते जाते बच्चा कहता गया। इतनी बडी कार ले कर घूमते हैं. पैसे देने को एक धंटा लगा दिया।
मारूती 800 कार कब से बडी हो गई?” मैंने कहा।
अब छोडो इस बात को। यमदूत से पीछा छूटा, शुक्र करो। पत्नी ने कहा।
फटाफट कार मे बैठ कर कार को स्टार्ट किया।
देर मत करो। सोचने का टाईम नहीं है। जल्दी चलो।पत्नी ने कहा।
अब जल्दी से नौ दो ग्यारह ही हो जाते हैं। मालूम नहीं और बच्चे टपक न पडे़। मैंने कहा।
गेस्ट हाउस पहुंच कर कमरे में बिस्तर पर लेटे लेटे सामने दीवार पर टक टकी लगा कर कुछ सोचते देख पत्नी ने पूछा। क्या बात है, कुछ सोच रहे हो।
उस छोटे बच्चे की बात ही मन में बार बार आ रही है, एक तो भीख दो, उपर से जली कटी बातें भी सुनो. सोच रहा हूं कि दया का पात्र मैं हूं या वो छोटा बच्चा। दया की भीख मैं उनसे मांगू या उनको भीख दूं। कुछ समझ नहीं आ रहा है कि भिखारी कौन है। आखिर सुकून की जिन्दगी कब और कहां मिलेगी। कहीं भी चले जाऔ, सारा मजा किरकिरा कर देते है, चाहे धार्मिक स्थल हो, ऐतहासिक स्थल या फिर आपके घर के समीप पार्क। घर में रहो तो बाहर जाने को मन करता है। बाहर जाऔ तो ये लोग चैन से बाहर भी नहीं रहने देते। घर वापस आने की जल्दी करनी पड़ती है।
चलो इस किस्से को अब भूल जाऔ और हम दोनो ही प्रण लेते हैं कि आज के बाद कभी भी किसी को भीख या दान नहीं देगें, चाहे वह व्यक्ति कितना ही जरूरत मंद क्यों न हो।
करे कोई, भरे कोई।
किसी के चेहरे पर लिखा नहीं होता कि वह जरूरतमंद है।
सही बात है. हमे खुद अपने आप को देखना है, दूसरो की चिंता मे अपना आज क्यों खराब करे। खुद को तनाव से मुक्त रखने का सही इलाज है। अब आराम करते है. कल सुबह दिन निकलने से पहले दिल्ली के लिए रवाना होना है, ताकि ठंडे समय मे घर पहुंच जाए।

(यह कहानी 2006 में सरिता में प्रकाशित हुई। यह अनअडिटिड वर्जन है।)

(आज से लगभग 15 साल पहले वृन्दावन में इन छोटे बच्चों से मुलाकात हुई थी।  मुलाकात आज भी ताजा है। बाकी पात्र तो रोज सडकों पर मिल जाते हैं।)  

जगमग

दिये जलें जगमग दूर करें अंधियारा अमावस की रात बने पूनम रात यह भव्य दिवस देता खुशियां अनेक सबको होता इंतजार ...