Sunday, November 24, 2013

पहला सौदा


सुबह के छ: बज रहे थे। चिडियों के चहचाहने की आवाज आने लगी। सर्दियों के दिन, अभी अंधेरा ही था। धर्मपाल रजाई ओढ कर खर्राटे भर रहा था। खर्राटों की आवाज में तेजी से पत्नी ने बिस्तर ही छोड दिया। सुबह हो गई है, सर्दियों में बिस्तर मरीज हो जाता है, हर आदमी। उठने का समय हो ही रहा है, यह सोच कर वह उठी और फ्रेश होने बाथरूम चली। पत्नी दया बाथरूम में ही थी, कि फोन की घंटी बजी।
ट्रिन, ट्रिन, ट्रिन......
दया बाथरूम से निकल नही सकती थी और धर्मपाल खर्राटे भर रहा था। फोन की घंटी सुन कर धर्मपाल की नींद खुली। कच्ची पक्की नींद में उसने फोन उठाया।
हेल्ल्लइयो
धर्मफोन पर दूसरी ओर दौलतराम था।
दौलत की आवाज सुन कर धर्म ने पूछा। क्या हुआ। आधी रात को फोन कर रहा है।
सत्तू मर गया, बिस्तर छोड। फटाफट अस्पताल पहुंच। आधी रात नही है, बिस्तर छोड कर देख, दिन निकल आया है।
क्या बोल रहा है।
मरने की झूठी बात क्यो बोलूंगा। मैं भी अस्पताल जा रहा हूं, वहीं मिलते हैं।
दौलतराम ने फोन रख दिया। धर्मपाल ने रजाई छोडी। आंखे मल कर नींद खोली।
किसका फोन था?” दया ने बाथरूम से बाहर आते पूछा।
सत्तू सेठ मर गया। चाय बना दे। फटाफट निकलना है।कह कर धर्मपाल बिस्तर से फुर्ती से निकला और फ्रेश होने बाथरूम में घुसा।
सेठ सत्यपाल अनाज मंडी के बादशाह थे। मंडी में जब भी माल पहुंचता था, पहला सौदा सेठ सत्यपाल ही करते थे। यहां तक बात थी, कि अनाज का पहला ट्रक सेठ सत्यपाल के गोदाम में आता था। सेठजी की इतनी धाक थी, बाकी व्यापारी औपचारिक तौर पर पहला सौदा नही करते थे। सेठजी के हाथों ही पहला सौदा खुलता था। पिछले तीस वर्षों से वे अनाज मंडी के प्रधान थे। कोई उन को प्रधान के पद से हटा नही सका। मंडी में पीठ पीछे सब सेठ सत्यपाल को सत्तू कह कर चिढाया करते थे। करीब चालीस वर्ष पहले सत्तू ने अनाज मंडी में दलाली करनी शूरू की, फिर धीरे धीरे सफलता की सीडियां चढते चढते दस साल बाद मंडी में अपनी धाक जमा दी। एक बार प्रधान बने तो कोई उन के बराबर नहीं पहुंच सका। जब सेठ जी दलाली करते थे, तब सत्तू दलाल के नाम से मशहूर थे। प्रधान बनने पर मुंह पर तो नही, परन्तु पीठ पीछे सत्तू कह कह गालियां निकाल कर अपनी भडास निकालते थे। आज एक लम्बी बीमारी के बाद सेठ सत्यपाल का निधन हो गया। पिछले एक महीने से अस्पताल में भरती थे। सुबह छ: बजे राउंड पर आए डाक्टर ने सेठ जी को मृत्य घोषित किया। डाक्टर की घोषणा के बाद फोन पर फोन, सभी नजदीकियों को सूचना दी गई। कुछ ही देर में मंडी के हर व्यापारी, दलाल को सेठ सत्यपाल की मौत का समाचार मिल चुका था।
धर्मपाल और दौलतराम सेठ सत्यपाल के दूर के रिश्तेदार है और अनाज मंडी में छोटे दुकानदार हैं। सेठ सत्यपाल ने दुकानदारी शूरू करने में मदद की और इसका अहसान हमेशा सेठ सत्यपाल दोनों पर जताते थे। दोनों सेठ जी को सलामी करते थे, मेहनत करते हुए तरक्की के रास्ते पर अग्रसर थे, इसीलिए दोनों सेठ जी का कद्र करते थे, कभी कभी सेठ जी दबाते भी बहुत थे, फिर भी शिकायत नही करते थे। एक ही बात करते थे, कोई बात नही, एक रास्ता दिखाया था सेठ जी ने, अग्रसर हैं। रास्ता दिखाने का कर्ज चुकाना है, चुका रहे हैं।
दोनों अस्पताल पहुंचे। सेठ जी का पूरा परिवार थोडी देर में एकत्रित हो गया। दोनों परिवार के हर सदस्य की बात सुन कर सारे काम करने में वय्स्त हो गए। सेठ जी के बेटे रमाकांत और उमाकांत हुक्म चला रहे थे और दोनों फटाफट अपने आका का हर हुक्म पूरा करने में वय्स्त थे। तभी मंडी के कुछ व्यापारी भी अस्पताल पहुंचे। दोनों को भागमदौड करते देख एक ने कहा – सत्तू ने सालों को बंधुआ मजदूर बना रखा है। अपना तो दिमाग लगाते ही नही।
दूसरा व्यापारी – दिमाग हो तो लगाए न।
कह कर मंद मंद मुसकाने लगे।
उनकी बाते सुन कर धर्मपाल और दौलतराम चुप रहे। धर्मपाल ने दौलतराम के कंधे पर हाथ रख कर कहा – अभी चुप, यह समय नही है, कुछ कहने का। बाद में देखेंगे।
दोनों धर्मपाल और दौलतराम काम में व्यस्त भी थे, साथ ही साथ उन दोनों के चार कान सभी रिश्तेदारों और व्यापारियों की बातों पर भी थे।
मृत्य देह को अस्पताल से घर लाया गया। विचार विमर्श के बाद दोपहर तीन बजे दाह संस्कार का समय तय हुआ। सेठ जी की कोठी पर मंडी के दूसरे पदाधिकारियों ने चार दिनों के शोक की घोषणा की, कि कोई सौदा नही होगा। दुकानों के शटर डाउन रहेंगें। मंडी सेठ जी के चौथे की रसम के बाद ही खुलेगी। थोडी देर में सभी वयापारी रूकसत हुए। रमाकांत ने धर्मपाल और दौलतराम को हिदायत दी की वो मंडी की हर गतिविधी पर उन को अवगत कराते रहे। उन दोनों को कोठी से अधिक मंडी की हर गतिविधी पर नजर रखने के काम पर लगा दिया।
भाई उन दोनों को तुम ने मंडी भेज दिया। यहां काफी काम हैं।उमाकांत ने बडे भाई को अपनी नाराजगी जाहिर की।
काम तो घर के नौकर कर लेंगें। हम मंडी जा नही सकते। हमारी गैरमौजूदगी में मंडी के बाकी व्यापारी फायदा उठाने की कोशिश करेंगें। चावलों की नई खेप आज कभी भी आ सकती है। मैनें फतेह सिंह की ड्यूटी गोदाम पर लगा दी है। ट्रक ड्राईवर का फोन था, दोपहर तक वह ट्रक गोदाम में लगा देगा। पहला ट्रक हमारा ही आएगा। ड्राईवर का इनाम दुगना देना है। पिता जी नही हैं तो क्या हुआ। उन की हर बात को हमने आगे बढाना है। आज तक नए माल का पहला सौदा सेठ सत्यपाल ने किया था, आज भी यह परमपरा निभाई जाएगी। उन के बेटे उन की परमपरा को जीवित रखेगें।रमाकांत ने उमाकांत के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
भाई हम तो मंडी चार दिन तक जा नही सकते। कैसे करेगें।छोटे भाई उमाकांत ने आशंका जताई।
दौलत और धर्म किस काम आएगें। नाम उम दोनों का होगा, परन्तु पहला सौदा हमारा ही होगा, तभी उन दोनों को मंडी की टोह लेने भेजा है। यदि पहला सौदा हमारा नहीं हुआ तब लानत है हम पर और हमें सेठ सत्यपाल की औलाद कहने का कोई हक नही। रमाकांत ने फोन की घंटी बजने पर बात समाप्त की।

उधर मंडी में व्यापारी अलग अलग लामबंद हो चुके थे। सभी की निगाहें चावलों की नई खेप के आने पर टिकी थी। हर किसी की कोशिश थी कि पहला ट्रक उनका आए और पहला सौदा भी उनका हो। विभिन्न रणनितियां बनाई जा रही थी। धर्मपाल और दौलतराम दोनों अपनी ड्यूटी मुसतैदी से निभा रहे थे। पल पल की खबर रमाकांत को दी जा रही थी। दोपहर एक बजे चावलों का ट्रक सेठ सत्यपाल के गोदाम में पहुंच गया।
ड्राईवर को तिगुना इनाम दो, किसी को खबर नही लगनी चाहिए, कि चावलों की पहली खेप हमारी है। ड्राईवर की खूब खातिर करो। ड्राईवर पहले सौदे के बाद ही गोदाम से बाहर आएगा।रमाकांत ने फतेह सिंह को हिदायत दी और धर्मपाल, दौलतराम को कोठी पर पहुंचने का कहा।

रमाकांत के चेहरे पर कुटिल मुस्कान थी। जिस धर्रे पर सेठ सत्यपाल ने काम किया, आज रमाकांत उसी ओर चल रहा था। पहला सौदा हमारा ही होगा।

ठीक तीन बजे सेठ सत्यपाल के मृत्य देह को नगर के सबसे बडे शमशान लाया गया। अंतिम संस्कार की सभी तैयारियां पूरी हो गई थी। शमशान में मंडी के सभी व्यापारी एकत्रित थे। रिश्तेदार एक ओर जमा थे और व्यापारी अपना अपना गुट बना कर मंडी की बातों पर चर्चा कर रहे थे। कुछ मन की भडास निकाल रहे थे।
एक व्यापारी – भई, सत्तू में जो बात थी, उस के लौडों में नही है।
दूसरा व्यापारी – भई, ठीक कह रहे हो, साले सत्तू ने लौडों को अपने पल्लू में बांध कर रखा था, कभी आगे आने नही दिया। शर्त लगा ले, बादशाहत खत्म समझो।
तीसरा व्यापारी – कितने की लगा रहे हो। हजार की मेरी भी लगा लो।
दूसरा व्यापारी – साले, तू जिन्दगी भर टुच्चा रहेगा। सत्तू पर हजार की चाल, लानत है। शर्म कर। कम से कम लाख की बात कर, तो लगाता हूं।
तीसरा व्यापारी – इतना मत एतराऔ। चाल उलटी न पर जाए।
चौथा व्यापारी – साले, तू छोटा है, छोटी बात ही करेगा। यहां बादशाहत की बात हो रही है, अगला बादशाह कौन?”
तीसरा व्यापारी वहां से खिसक कर दूसरे दल के पास गया।
पांचवा व्यापारी – तुम तो सब बच्चे हो। हमने तो सत्तू को उस जमाने से देखा है, जब दलाली करता था। आज बादशाह कहलाता है। साला पक्का व्यापारी था। पढे लिखों की छुट्टी करता था। कभी स्कूल नही गया, पर चाणक्य नीति पूरी जानता था। साम, दंड, भेद से मंडी को अपने वश में कर रखा था।
छटा व्यापारी – देखते है, अब लौडे क्या करते है, मंडी का पहला सौदा किसका?“
सातवां व्यापारी – सुना है, वर्मा और शर्मा इस बादशाहत को तोडने की पूरी तैयारी करे बैठे हैं।
पांचवा व्यापारी – सुना तो है, पर देखते हैं।

एक कोने में वर्मा और शर्मा अपने चेलों के साथ रणनीति में मशगूल थे।
वर्मा – अपना ट्रक कब तक आ जाएगा?”
शर्मा – रात तक आ जाएगा।
वर्मा – कल पहला सौदा अपना ही होगा।
शर्मा – कोई शक नही। इस बार पहला सौदा अपना है।
कुछ व्यापारी – पहले सौदे में कुछ हिस्सा मिल जाए, तो सोने पर सुहागा। बरकत होती है, पहले सौदे में। चाहे एक बोरी मिल जाए। पूरा सीजन लाभ का होता है।
वर्मा और शर्मा एक स्वर में – हां, हां, बिल्कुल, हर किसी को हिस्सा दिया जाएगा। हमें क्या सत्तू समझ रखा है? साला सारा हडप जाता था।
एक व्यापारी – सेठ जी मजा आ जाएगा, अब की बार।

तभी मुखाग्नि दी गई। यह इशारा था, धर्मपाल और दौलतराम के लिए। दोनों वर्मा और शर्मा के ग्रुप के समीप खडे हो गए।
धर्मपाल – सेठजी पहले सौदे का रेट लगा रहा हूं। बोलो कौन ले रहा है।
धर्मपाल के मुख से पहले सौदे के रेट सुन कर सब सतब्ध रह गए।
शर्मा – क्या कह रहे हो?”
दौलतराम – सही सुन रहे हो, सेठ जी। चावलों की पहली खेप गोदाम एक बजे ही पहुंच गई थी। आप सेठ सत्यपाल के बेटो को कम मत आंको। रेट सुना दिया है। हम धर्मपाल और दौलतराम बेच रहे हैं। क्या कहते हो?”
शर्मा और वर्मा सकते में आ गए। पहला सौदा हो गया। व्यापारियों झट से पाला बदला, जो वर्मा और शर्मा के पाले में थे, झट से दल बदल कर धर्मपाल और दौलतराम के दल में शामिल हो गए। सबने सौदा बुक कर लिया।
मृत्य देह अभी ठंडी भी नही हुई थी कि पहला सौदा हो चुका था। रमाकांत छोटे भाई उमाकांत के साथ वहां से गुजरे। एक नजर वर्मा और शर्मा पर डाली और आगे बढ गए। धर्मपाल और दौलतराम ने ईशारा किया कि पहला सौदा आपका ही हुआ है।

उधर पंडित ने अंतिम विधी की और सबको चौथे की सूचना दी। सुबह सात बजे शमशान में फूल चुने जाएगें और उठाला शाम चार से पांच सांई मंदिर के परिसर में। परिवार के सभी सदस्य एक तरफ खडे हो जाए और बिरादरी शोक प्रकट करते हुए अपने घरों को प्रस्थान करें। बिरादरी रूकसत होने लगी। शर्मा और वर्मा रमाकांत, उमाकांत के सामने शोक प्रकट करते गए। उनका सिर हार से झुका हुआ था और रमाकांत, उमाकांत के चेहरों पर हर्षल्लास था। 

Monday, November 04, 2013

Hindu marriage हिन्दू विवाह

हिन्दू विवाह में सात फेरों और सात वच्नों का महत्व

Mangal phere are  the foundation stone to enjoy a content and complete married life:- Seven small circles are made with white rice paste by the bride and groom around the sacred fire to seek blessing for:-
Dharma:- righteousness and nourishment in life. Artha:- wealth and prosperity in life. Moksha:- spiritual strength and self-restraint in life. Vrata:- loyality to each other in life. Sarvasukh:- the good of all creatures. Oorja:- achievement and success in life. Karma:- physical fulfillness, sharing family and domestic responsibilities in life

मंगल फेरे एक संतुष्ट और संपूर्ण विवाहित जीवन का आनंद लेने के लिए नींव का पत्थर हैं। सफेद चावल के पेस्ट के साथ दूल्हे और दुल्हन के द्वारा पवित्र अग्नि के चारों ओर सात छोटे हलकों के साथ इन के आशीर्वाद के लिए जाते हैं


धर्म: - जीवन में सच्चाई, पवित्रता और पोषण
अर्थ: - धन और जीवन में समृद्धि
मोक्ष: - जीवन में आध्यात्मिक शक्ति और आत्म - संयम
वर्त: - जीवन में एक दूसरे के लिए निष्टा. 
सर्वसुख: - सभी प्राणियों के अच्छे
ऊर्जा: - जीवन में उपलब्धि और सफलता
कर्म: - शारीरिक संपूर्णता, साझा परिवार और जीवन में घरेलू जिम्मेदारियां


Saath Vachan
1.       Consult each other for all the major decisions, like cultural, social, financial, spiritual, religious etc.
2.       Care for one another and family, by developing a deep understanding while being good friends.
3.       Respect each other, each other’s parents and families.
4.       Be faithful to one another.
5.       Be guided by family and social traditions.
6.       Maintain harmony between their families.
7.       Stay strong and calm during times of crises and sickness.

सात वचन

1. सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, आध्यात्मिक, धार्मिक आदि जैसे सभी प्रमुख निर्णयों के लिए एक दूसरे से परामर्श करना।
2. अच्छे दोस्त बन कर, एक गहरी समझ विकसित करके, एक दूसरे के और परिवार के लिए प्रति दायित्व का निर्वाह करें।
3. एक दूसरे का, एक दूसरे के माता पिता और परिवार का सम्मान करें।
4. एक दूसरे के प्रति वफादार रहें।
5. परिवार और सामाजिक परंपराओं से मार्गदर्शित हो।
6. उनके परिवारों के बीच सामंजस्य बनाए रखें
7. संकट और बीमारी के समय के दौरान मजबूत और शांत रहें।

Saptapadi:- with God as the guide
The 1st step is for nourishment and prosperity.
The 2nd step is for strength and success.
The 3rd step is for faithfulness and loyalty.
The 4th step is for source of bliss and happiness.
The 5th step is for progeny.
The 6th step is for nature’s bounty.
The 7th step is for lasting companionship based on sacred illumination of mind.

Saptapadi: - पथप्रदर्शक भगवान के साथ

पहला फेरा पोषण और समृद्धि के लिए है।
दूसरा फेरा ताकत और सफलता के लिए है।
तीसरा फेरा सच्चाई और निष्ठा के लिए है।
चौथा फेरा आनंद और खुशी के स्रोत के लिए है।
पांचवा फेरा संतान के लिए है।
छटा फेरा प्रकृति के उपहार के लिए है।
सातवां फेरा मन की पवित्र रोशनी के आधार पर स्थायी साहचर्य के लिए है।

Saturday, November 02, 2013

धनोलटी

दो टैक्सियां हवेली के दरवाजे पर खडी है। चंपावती ने एक टैक्सी में सामान रखवाया। सामान के साथ दो नौकर मसूरी के पास धनोलटी के लिए रवाना हुई। दूसरी टैक्सी में चंदगीराम, चंपावती, सूरज, सरिता और डाक्टर घोष रवाना हुए। देहरादून के बाद घुमावदार छोटी छोटी पहाडियों के बीच से गुजरते हुए मसूरी होते हुए धनोल्टी पहुंचे। रिजार्ट में एक बंगला बुक था। नौकरों ने सारा सामान पहले ही कमरों में लगा दिया था। एक कमरा चंदगीराम और चंपावती के लिए। एक बच्चों सूरज और सरिता के लिए और एक डाक्टर घोष के लिए।

शाम हो चुकी थी, सफर की थकान के कारण चंदगीराम आराम करने के लिए बिस्तर पर लेट गए। कुछ देर के लिए गहरी नींद आ गई। चंदगीराम को सोता देख डाक्टर ने कहा भाभी जी, चंदगी जितना आराम करेगा, उतना ही अच्छा है, इसी कारण यहां एकान्त में कुछ दिन रहने का कार्यक्रम बनाया। आप चंदगी से बातों बातों में जानने की कोशिश करना, कि किस कारण चंदगी के जीवन में तनाव है। उस तनाव को दूर करना जरूरी है। उस को तनाव नही आना चाहिए। तनाव से तबीयत बिगड सकती है।

रात को आठ बजे के आसपास चंदगीराम की आंख खुली। काफी दिनों के बाद आज चंदगीराम हलका महसूस कर रहा था। शोरगुल से दूर सर्द हवा हलके हलके चल रही थी। शाल ओढ कर चंदगीराम कमरे से बाहर आया। लॉन में डाक्टर घोष ने बोनफायर का प्रबंध कर लिया था। चंदगी को देखते कहा आऔ यारो के यार हमारे हमदम, एक प्याला, एक नवाला, सब आपके लिए ही है।
क्यों शायरी कर रहे हो, मेरी शायरी तो मेरे साथ है, एक बात बता, शायरी तो खूब करता है, शादी क्यों नही की।
लडकी तो बता, शादी तो अभी कर लूं।
बुठ्डे से शादी करके किस्मत को कौन फोडेगा। किसको इंजेक्शन लगाया है, तुमने, जो तुम से शादी करने को तैयार हो जाएगी।  
कल मसूरी के माल रोड पर घूमने जाऊंगा, गर्मियों की छुट्टियों में बहुत खूबसूरत लडकियां मसूरी सैर सपाटा करने आई है। किसी को तो इंजेक्शन लगा ही दूंगा।

डाक्टर घोष की बातों पर चंदगीराम खिलखिला कर हंस दिया। पति को बहुत दिनों के बाद हंसते देख चंपावती की चिन्ता दूर हुई, कि डाक्टर का बताया इलाज काम कर रहा है। पति को तनाव से दूर रखने के लिए कुछ पल व्यापार से दूर रखना भी आवश्यक है।

लॉन में बोनफायर के ईर्द गिर्द कुर्सियां बिछा कर सब गपशप में मशगूल हो गए। सूरज और सरिता अंताक्षरी खेलने लगे। बीच बीच में चंदगाराम भी उनका साथ देने लगे। यह देख कर डाक्टर घोष और चंपावती भी अंताक्षरी में शामिल हो गए। धीरे धीरे रात का कोहरा घना होने लगा। आग की ताप से ठंड से राहत मिल रही थी। वहीं रात का खाना समाप्त करने के बाद भी किसी का दिल कमरों मे लौटने का नही था। जब आग की तपिश कम हो गई, तब आधी रात को सभी उठे और सोने के लिए बिस्तरों में दुबके।

सुबह चंदगीराम तरोताजा सवा छ बजे उठ गए। शाल ओढ कर कमरे से बाहर आ कर लॉन में टहलने लगे। डाक्टर के कमरे में दस्तक दी। डाक्टर, सोता रहेगा, या फिर उठेगा।
डाक्टर कमरे से बाहर आकर बोला एक ही रात में शेर हो गए। मेरा नुक्सा काम आ गया। रूक अभी आ रहा हूं।
कैसा महसूस कर रहे हो।
ऐसा लगता है, कि एक ही रात में काया पलट हो गई है। डाक्टर पहले अपना नुक्सा क्यों नही बताया?”
फीस लगती है, मुफ्त में इलाज नही होते। पहले फीस दी होती, तब इस से भी अच्छा बताता, लेकिन देर से आए, लेकिन दुरूस्त आए।
कितनी फीस लेगा।
भई, कोई ज्यादा तो लेनी नही है। सबसे पहले यह मसूरी, धनोल्टी का ट्रिप फ्री। बाकी वापिस सहारनपुर चल के कर लेगें। जल्दी किस को है।
"हां डाक्टर कम से कम मुझे तो जल्दी नही है।
हां, भाई, तेरे को क्यों होगी, फीस जो देनी है।
फिर दोनो जोर से खिलखिला कर हंस दिए। चंपा पति को हंसता, खिलखिलाते देख बेफ्रिक हो गई। जान है तो जहान है। खुद इलायची, अदरक वाली चाय बना कर चंपा लॉन में गई। कुर्सियां खींच कर सभी बैठे। चाय की चुस्कियों के बीच डाक्टर घोष और चंदगीराम की नौक झौंक चलती रही।

धनोलटी की आबोहवा चंदगीराम को रास आई। दो दिनों में वह एकदम भला चंगा नजर आने लगे। हल्की गुनगुनी ठंड में चार दिन कैसे बीत गए, किसी को पता नही चला। दोपहर को पास की छोटी झील के पास बैठ कर प्रकृति को निहारते। दरखतों के बीच से सूरज की छटती किरणों का लुत्फ उठाते गप्प शप्प में काटते चंदगीराम की सेहत तंदरूसती की ओर अग्रसर थी। चंपावती पति की सुधरती सेहत पर खुश थी। बच्चे सूरज और सरिता आराम, सैर और मौज मस्ती में समय व्यतीत कर रहे थे।

आज शनिवार है, चंदगी, कैम्टीफाल चलते है, वहां नहाने का लुत्फ ही कुछ और है।डाक्टर घोष ने सुबह सुबह ऐलान कर दिया। फटाफट तैयार हो जाऔ, सब लोग।
हल्का फुल्का नाशता करने के बाद सभी कैम्टीफाल की ओर रवाना हुए। रास्ते में चिप्स खाते, जूस पीते नौंक झोंक करते रहे। कैम्टीफाल पहुंच कर डाक्टर घोष ने कहा चंदगी, अब उतर जा सीडियां, नीचे जन्नत है भाई।
डाक्टर नीचे यदि जन्नत है, तो क्या हूरे भी मिलेगी?” चंदगी ने घोष के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
तभी तो कह रहा हूं, जन्नत है तो हूरे भी हैं।
मजाक करने की आदत नही गई, तेरी डाक्टर।
मजाक नही कर रहा हूं, देख ले जन्नत और हूरें।सीडियां उतरते हुए चंदगी और घोष कैम्टीफाल तक पहुंच गए और घोष ने फॉल में नहाती लडकियों और महिलाऔं की ओर इशारा करते हुए कहा।
बुढापे में जवानी आ रही है। कुछ तो शर्म कर।
तू शर्म कर, मेरी तो शादी भी नही हुई है। अभी तो मैं जवान हूं।कह कर डाक्टर घोष और चंदगीराम एक तरफ बैठ कर प्रकृति की सुंदरता निहार रहे थे। ऊपर से गिरता झमाझम पानी और पानी में इठलाते बच्चे, युवा, प्रोढ और वृद्ध। कोल्ड ड्रिंक्स बेचने वालों ने बोतलों के क्रेट्स फॉल के नीचे ठंडे होने के लिए रखे थे। डाक्टर घोष ने कपडे उतारे, सिर्फ कच्छे में ही नहाने फॉल में गया और वहीं से आवाज दी अबे आ भी जा, शर्मा मत।

चंदगीराम आगे सिर्फ पानी तक गया, अंदर फॉल तक नही गया। पायजामा घुटनों तक ऊपर किया और पानी में पलने लगा। जो नहा नही रहे थे, वे चंदगीराम की तरह पानी में चल रहे थे। कुछ देर बाद चंदगीराम और चंपावती एक पत्थर के ऊपर बैठ गए। सूरज, सरिता, डाक्टर घोष और नौकर सभी चट्टानों के पास फॉल का मजा ले रहे थे। सभी प्रसन्न थे। दोपहर को सभी ने कपडे बदले और खाना खाने के लिए एकत्रित हुए। तीन बजे सभी धनोलटी के लिए रवाना हुए। रात में रोज की भांती अलाव के आस पास सभी बैठे और खाना का लुत्फ लेने लगे। सभी ने निर्णय लिया कि एक सप्ताह धनेलटी रहने के बाद कल मसूरी के लिए रवाना हुआ जाए।  

जगमग

दिये जलें जगमग दूर करें अंधियारा अमावस की रात बने पूनम रात यह भव्य दिवस देता खुशियां अनेक सबको होता इंतजार ...