Monday, August 29, 2016

ऐसा बना दो प्रभु जीवन मेरा

हर पल में हो प्रभु सिमरन तेरा,
ऐसा बना दो प्रभु जीवन मेरा।

याद तेरी को मैं सदा दिल में बसाऊं,
आठों पहर प्रभु तेरे गीत गाऊं,
नाम तेरा ही होवे सच्चा धन मेरा।
हर पल में हो प्रभु सिमरन तेरा,
ऐसा बना दो प्रभु जीवन मेरा।

ख्वाहिशें जगत की मुझको सताएं,
चिंताएं हरगिज नजदीक आएं,
करता रहूं प्रभु चिंतन तेरा।
हर पल में हो प्रभु सिमरन तेरा,
ऐसा बना दो प्रभु जीवन मेरा।

जग में रहूं पर जग से आजाद रहूं,
सिवा तेरे किसी का मोहताज रहूं,
तेरे ही चरणों में सदा लगे मन मेरा।
हर पल में हो प्रभु सिमरन तेरा,
ऐसा बना दो प्रभु जीवन मेरा।

तेरी याद में मैं ऐसे खो जाऊं,
मैं रहूं बस तू ही तू रह जाए,
सफल हो जाए यह नर तन मेरा।
हर पल में हो प्रभु सिमरन तेरा,
ऐसा बना दो प्रभु जीवन मेरा।

परंपरागत भजन


Friday, August 26, 2016

माफ़ी


घर में बर्तन कम हों या अधिक, मिलते हैं खड़कने लगते हैं। लुढकते हैं, उनको समेट कर सहेज कर रखा जाता है। थोड़े दिन बाद फिर लुढकते हैं, आवाज करते है। आवाज से सर चकराने लगता है, दर्द होने लगता है, दिल बैठा जाता है। छोटे बर्तन, बड़े बर्तन, मंझले बर्तन, हर किस्म के बर्तन, नए बर्तन, पुराने बर्तन जब उलझते हैं तो दूर तक आवाज जाती है। समझदारी इस में होती है कि उनको फैंका जाए, फिर से एक बार सबके साथ रखा जाए। रसोई में हर प्रकार का और हर किस्म का बर्तन चाहिए। हर बर्तन की अपनी अगल विशेषता और अहमियत होती है, जिसको घर का बुजुर्ग ही जानता है। उसने हर मौसम देखा है और हर मौसम की खासियत की पहचान होती है।

दयाशंकर की उम्र लगभग 90 वर्ष। नाम के अनुरूप दया के अवतार, हमेशा शान्त रहने वाले, सुलझे स्वभाव के इंसान। उम्र के हिसाब से आराम करते हैं। सेहत ठीक है परन्तु सुनते थोड़ा ऊंचा हैं। 90 की उम्र में शरीर थोड़ा कमजोर हो गया है पर आवाज में कड़कपन बरकरार है। उनसे बात करके हर कोई यही कहता है कि बुड्ढे में दम है। पुराने समय का खाया पिया अब काम रहा है, वरना आजकल तो चालीस पार होते ही निढाल हो जाते हैं। दिन में तीन-चार चक्कर मंदिर के लगा लेते हैं। मंदिर जाने का मुख्य कारण मंदिर के पुजारी के साथ मित्रता है। गपशप कर लेते हैं पुजारी के साथ। पुजारी की उम्र लगभग पचपन के आसपास, लेकिन उम्र का अंतर दोनों की मित्रता में आड़े नही आई।

दुर्गादेवी की उम्र लगभग चौरासी, दयाशंकर की पत्नी। सेहत थोड़ी ढीली रहती है। थोड़ा झुक कर चलती है परन्तु स्वभाव में बिलकुल विपरीत। एक दम कड़क मिजाज। नाम के अनुसार रंग गोरा, सुन्दर चेहरा और स्वभाव चंडी जैसा उग्र। दयाशंकर की भी हिम्मत नही पड़ती थी पत्नी दुर्गादेवी से बहस करने में।

उम्र के अंतिम पड़ाव में भी अक्सर तीन-चार दिन बाद दयाशंकर और दुर्गादेवी में बहस हो जाती थी। दुर्गादेवी पति दयाशंकर पर हावी हो जाती और दयाशंकर घर के बाहर टहलने लगते या फिर मंदिर जा कर पुजारी से गपशप करते।

दयाशंकर और दुर्गादेवी के चार बच्चे, दो लड़के और दो लड़कियां। फिर उनके बच्चे और आगे उनके बच्चे। लड़के और लड़कियों के पोते-पोती। चौथी पीढ़ी अपनी आंखों के सामने फलते फूलते देख रहे दोनों।

उम्र के अंतिम पड़ाव में मनुष्य अकेला हो जाता है। शारीरिक क्षमता कम हो जाती है, जिस कारण आराम अधिक होता है, काम हो नही पाता। शरीर भले चले, दिमाग की रफ्तार और अधिक तेज हो जाती है। सारा दिन दुर्गादेवी को शिकायत रहती है कि बच्चे सुनते नही। आवाजें लगाते रहो, कोई इधर से भाग जाता है तो कोई उधर से निकल जाता है। पोते-पोतियां सब बिगड़े हुए है। उनका क्या कसूर, जब मां-बाप ही सुनते नही तो तीसरी पीढ़ी क्या सुनेगी। वो देखो पिद्दी से तीन-तीन चार-चार साल के चिढ़ा कर भाग जाते है। हाथ जाएं तो मार-मार कर बर्था बना दूं। दुर्गादेवी की चाहत रहती थी कि सब हाथ जोड़ कर उनके आगे-पीछे चक्कर लगाते रहें और बिना उसके पता भी हिले, परन्तु यह कहां सम्भव है। पौत्र-पौत्रवधुएं कहां हाथ जोड़ कर आगे पीछे चक्कर लगा सकते हैं। आजकल हर लड़की नौकरी करती है, इसलिए घर के कार्य तो मुश्किल से होते है दुर्गादेवी के हुक्म के गुलाम बनना असंभव है। जब दुर्गादेवी पड़पौत्र को पकड़ लेती है तब पढ़पौत्रवधु नाराजगी जाहिर करती है। कई बार तू-तू मैं-मैं बहस हो चुकी है। दुर्गादेवी तीसरी पीढ़ी और चौथी पीढ़ी पर तो अब हावी नही हो पाती थी, सारी भड़ास पुत्रवधु पर निकलती थी।
पुत्र रमेश और पुत्रवधु रश्मि चुप ही रहते। किस की सुने और किस का पक्ष लें। एक तरफ मां-बाप और दूसरी ओर बच्चे। जब खुद दोनों दादा-दादी बन गए तब खमोश रहना ही बेहतर समझा। परन्तु एक ओर जवान खून जो हर कुछ फौरन और अपने हक में चाहता है और दूसरी और दुर्गादेवी जो अंतिम पड़ाव में भी उग्र रहती और समझती कि उसकी उपेक्षा हो रही है। जब एक घर में इतने बर्तन हों तो टकराव तो स्वाभाविक ही है।

"मेरी सब्ज़ी कहां है?" दुर्गादेवी तमतमाती हुई रसोई में आई।
रश्मि उस समय खाना बना रही थी। "पूरी कटोरी सब्ज़ी की है।"
"दो चम्मच भी नही है।" दुर्गादेवी ने कटोरी का ढक्कन हटा कर कहा।

रश्मि ने कटोरी देखी। हालांकि रश्मि को याद था कि उसने पूरी कटोरी सब्ज़ी की भरी थी। अब वह दो चमच्च तो नही, हां उसमें सब्ज़ी दो चमच्च कम थी। रश्मि सोचने लगी कि सब्ज़ी कम कैसे हो गई। बात को तुरन्त संभालते हुए बोली।

"अम्मा, आपको जितनी सब्ज़ी चाहिए, ले लीजिए। सब्ज़ी के साथ अब दाल और चावल भी बन कर तैयार हो गए हैं। गरम-गरम हैं।"
"मुझे तेरी सब्ज़ी नही चाहिए, रख अपने पास अपने दाल और चावल। मैं अपनी सब्ज़ी खुद बना लूंगी। मर नही गई हूं। हट गैस के आगे से।"

झगड़े के डर से रश्मि गैस के आगे से हट गई। दुर्गादेवी अपनी सब्ज़ी बनाने लगी। तभी पौत्रवधु पायल गई।
"अम्मा कटोरी मुंह तक भरी हुई थी, गिरती जा रही थी, मैंने उसमे से दो चमच्च सब्ज़ी कम कर दी। एक कटोरी और ले लो। गिराने की क्या आवश्कयता है।" पायल की आवाज में तेजी थी।

"बढ़ो से बात करने की तमीज नही है। मां-बाप ने लड़ना सिखाया है। बढ़ो से कैसे बात करनी है, यह नही सिखाया।" पायल को दुर्गादेवी ने पलट कर जवाब दिया।
"देखो अम्मा, मेरे घर वालों को बीच में मत घसीटो। इसमें तमीज कहां से गई। रसोई में सब्जी, दाल-चावल सब बने पड़े है। जो इच्छा हो, खाओ। अभी की क्या, कल सुबह के लिए भी सब्ज़ी बनी हुई है।" पायल और जोर से बोली।
"हमने आज तक बासी रोटी, सब्ज़ी नही खाई है। हमेशा ताजी बना कर खाते है। तुम्हारी बासी रोटी, सब्जी नही खानी। हट तेरे हाथ का कुछ नही खाना।" कह कर दुर्गादेवी अपने और दयाशंकर के लिए सब्जी बनाने लगी।

रश्मि ने बात को संभालने के लिए खुद रसोई से बाहर गई और पायल को भी बाहर चलने को कहा। पायल वही खड़ी रही। तब रमेश ने पायल को रसोई से बाहर आने को कहा कि वह अम्मा दुर्गादेवी को कुछ कहे, जो कर रही हैं, करने दो। झगड़ा नही करना।

इसी तरह रमेश अक्सर घर में होने वाले झगड़ों को शांत करता था। परन्तु रमेश ने नही चाहा कि झगड़ों का दुखद अंत हो। उसकी ख्वाहिश हमेशा रही कि शांति बनी रहे। हर सुबह प्राथना में रमेश के मुख से सिर्फ इतना ही निकलता " प्रभु शांति, प्रभु शांति, शांति शांति, प्रभु प्रभु, प्रभु शांति।"
कुदरत को इंसान की ख्वाहिश से कोई सरोकार नही। उसने तो उल्टा करने की ठानी है। अगले दिन सुबह के आठ बजे रमेश ऑफिस जाने से पहले नाश्ता कर रहा था। दुर्गादेवी तमतमाती हुई रमेश के पास आई, वह रात की बात को भूली नही थी।

"मेरी एक बात सुन ले, तू अच्छा नही कर रहा है।"
"अम्मा, क्या हुआ?"
"सब कुछ मालूम है फिर भी अनजान मत बन।"
"अम्मा, अभी मैं ऑफिस जा रहा हूं, थोड़ा जरुरी काम है। रात को बात करते हैं।"
"तूने रश्मि और पायल को बहुत छूट दे रखी है। मेरी कटोरी से सब्जी निकाल लेती है। मुझे खाता नही देख सकती है।"

अपना नाम सुनते ही पायल बीच में बोल पड़ी। "अम्मा, झूठ मत बोलो। मैंने सब्ज़ी नही निकाली थी। कटोरी ऊपर मुंह तक भरी हुई थी, नीचे गिर रही थी। सब्ज़ी गिर जाए क्या?" कह कर पायल दुर्गादेवी के आगे खड़ी हो गई।
"आगे से हट, तेरे से बात नही करनी। मैं अपने बेटे से बात कर रही हूं।" कह कर दुर्गादेवी ने पायल को हाथ से हटाया।
"अम्मा, मुझे मारो मत।"
"चल हट आगे से, तेरे से बात कौन कर रहा है। मैंने अपने बेटे से बात करनी है।"
रमेश को शायद किसी अनहोनी का अंदेशा हो गया। उसने बात टालने के लिये कहा। "अम्मा, मुझे आज जल्दी ऑफिस जाना है। ऑफिस से वापिस कर बात करूंगा।"
"बात अभी होगी।"

रमेश कुछ कह पाता, उससे पहले अम्मा दुर्गादेवी और पायल के बीच तू-तू, मैं-मैं शुरू हो गई। बीच में रश्मि भी कूद गई। रमेश का बेटा प्रशांत भी बहस में सम्मलित हो गया। एक दूसरे पर आरोप लगने लगे। रमेश और दयाशंकर मूक प्राणी की तरह चुपचाप तमाशा देख रहे थे। रमेश ने शांति बनाने का प्रयास किया परन्तु असफल रहा। हाथों से एक दूसरे को पीछे करने के प्रयास में पायल और अम्मा दुर्गादेवी अग्रसर थी। अम्मा दुर्गादेवी का मन तो जवान था, युवा पायल से जम कर टक्कर ले रही थी, परन्तु कमजोर वृद्ध शरीर लड़खड़ाया और अलमारी से टकरा कर फर्श पर गिर गया।

"हाय मैं मर गई।" अम्मा जोर से बोली।
अम्मा को गिरते देख रमेश फ़ौरन उठा और सहारा दे कर अम्मा दुर्गादेवी को उठाने की कोशिश की।
"अम्मा उठो, बिस्तर पर लेट जाओ।" रमेश ने अम्मा को सहारा दिया। अम्मा नाराज हो गई। "मुझे हाथ नही लगायेगा। मैं यहीं मर जाऊंगी।"
"अम्मा ऐसे नही कहते। उठने की कोशिश करो। मैं सहारा देता हूं।" रमेश ने अम्मा को उठाने की असफल कोशिश की। अम्मा दुर्गादेवी दर्द से बेहाल हो गई। अम्मा के कूहले की हड्डी चटक गई, जिस कारण दर्द हो रहा था, परन्तु अम्मा का गुस्सा और अकड़ कम नही हुई। रमेश ने प्रशांत को आवाज दी। "प्रशांत, मदद करो। अम्मा को सहारा दे कर उठाओ और बिस्तर पर लिटाओ।" अम्मा दर्द से परेशान थी पर उठने की कोशिश नही कर रही थी। रमेश ने रश्मि को आगे आने को कहा फिर रमेश, प्रशांत और रश्मि ने मिल कर अम्मा दुर्गादेवी को उठा कर बिस्तर पर लिटाया।
रमेश ने पिता दयाशंकर से अनुरोध किया "बाबूजी, अम्मा को अस्पताल ले चलते हैं, कार में बैठने में दिक्कत होगी। एम्बुलेंस बुला लेते है और अस्पताल चल कर डॉक्टर को दिखा देते हैं। एक्सरे और दूसरे टेस्ट से पता चल जायेगा कहीं हड्डी खिसक गई हो।"

दयाशंकर राजी हो गए पर दुर्गादेवी की नाराजगी कम नही हुई।

"मैं कही नही जाऊंगी। यहीं मारूंगी मुझे कोई हाथ लगाये। सुनो तुम महेश, गीता, रीता को बुलाओ। उनको भी पता चले कि मेरी दुर्दशा किसने की।" दुर्गादेवी की आवाज गूंज रही थी।

महेश रमेश का बड़ा भाई, पड़ोस में रहता था। खबर सुन कर आधे घंटे में गया। दुर्गादेवी की हालत देख अपने बेटों को भी बुला लिया। एम्बुलेंस बुलाई गई और दुर्गादेवी महेश संग अस्पताल गई। दोनों बेटियों गीता और रीता, जो दूसरे शहर रहती थी, उनको भी खबर कर दी गई।

दुर्गादेवी की जांच के बाद पता चला कि कूहले की हड्डी टूट गई है, क्योंकि दुर्गदेवी को दिल कमजोर है, अतः ऑपरेशन करके कूहले की हड्डी को जोड़ा नही जा सकता। दुर्गदेवी को अब बिस्तर पर ही रहना होगा और दर्द निवारक दवाइयों का ही आसरा है। डॉक्टर की राय में हड्डी स्वयं प्राकृतिक रूप में जुड़ सकती है परन्तु इसकी संभावना कम है और समय कितना लगेगा, कुछ कह नही सकते। महेश दुर्गदेवी को अस्पताल से अपने घर ले गया। दो दिन बाद दोनों बहनें भी गई। दयाशंकर अपने घर रमेश के घर ही रहे। वे थोड़ी देर के लिए महेश के घर जाते और दुर्गादेवी के पास बैठ कर वापस जाते। तीन-चार दिन बाद दुर्गादेवी की तबियत बिगड़ी और अस्पताल में दाखिल इलाज के लिए करवाया। दुर्गादेवी की तबियत बिगड़ने पर डॉक्टर ने जवाब दे दिया कि अब दुर्गादेवी अधिक दिन की मेहमान नही हैं। महेश, गीता और रीता ने दुर्गादेवी की मरनासन्न हालात के लिए पायल को जिम्मेदार ठहराया। उन सब ने पुलिस में पायल के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाने के लिए दयाशंकर पर दबाव डाला।

पड़ोस में अफवाहों का बाजार गर्म हो गया कि अब पायल को कोई नही बचा सकता। बड़ी आधुनिक और मॉडर्न बनती फिरती थी। अपनी खूबसूरती पर इठलाती थी और सब पर रौब डालती थी, अब मजा आएगा जब जेल की चक्की पीसनी पड़ेगी। पायल के कान में जब ये बातें पड़ी तो उसके होश उड़ गए। कांपते हुए रश्मि और रमेश के पास पहुंची।

कांपते और थरथराती हालात में देख रमेश ने पूछा। "तबियत ठीक नही लग रही है।"

रश्मि ने अडोस-पड़ोस में उड़ती बातों के बारे में बताया। कुछ सोच कर रमेश ने सलाह दी कि पायल बाबूजी दयाशंकर से मांफी मांगे। अम्मा दुर्गादेवी के साथ झगडे में जानबूझ कर पायल ने धक्का नही दिया। बढ़ते झगडे में पायल का जोर से हाथ लगा और अम्मा गिर गई। झगड़े में आदमी होश खो देता है और जोश से काम करता है। गलती अम्मा और पायल दोनों की थी। अब जो होगा, उसका सामना दृढ़ता से करना पड़ेगा।

अगली सुबह जैसे ही बाबूजी दयाशंकर उठे, पायल और रश्मि दोनों ने बाबूजी के पैर पकड़ कर मांफी मांगी।
दया की मूर्ति दयाशंकर ने दोनों रश्मि और पायल को आशीर्वाद दिया। "मरना और जीना किसी के हाथ में नही है। यह सब ईश्वर के हाथ में है। सब के जीवन की डोर ईश्वर अपने हाथ में रखता है। हमारा पूरा जीवन भी उसके हाथ में है, क्या बोलते है वही ईश्वर बुलवाता है। सब कुछ तय होता है यहां तक समय और तरीका भी तय होता है। लगता है दुर्गादेवी का अंतिम समय है। सोचा नही था ऐसे झगड़े से होगा। ईश्वर को जो मंजूर है, वही होगा। मुझे तुम दोनों से कोई शिकायत नही है।"

बाबूजी दयाशंकर ने पायल को मांफ कर दिया। महेश, गीता और रीता ने पायल के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवाने के लिए फिर से दबाव बनाया परन्तु दयाशंकर ने पुलिस में शिकायत करने से मना कर दिया।

"जो ईश्वर की इच्छा है, वही होगा मगर मैं नही चाहता कि किसी को पुलिस तंग करे। मेरे सब बच्चे एक समान हैं। मैं किसी के साथ पक्षपात नही करूंगा। बच्चों की गलती पर बड़ो का फर्ज है कि उनको मांफ किया जाये। गलती सबसे होती है, तुम्हारे बच्चे भी करते है, लेकिन इतना बड़ा कदम मैं नही उठाऊंगा कि मेरे बच्चों की जिंदगी तबाह हो जाये। पुलिस में जाने से दुर्गादेवी की तबियत सुधरने वाली नही है। हां यह जरूर है कि रमेश का परिवार बिखर जाएगा। जेल भी हो सकती है। मैं नही चाहता कि कोई जेल जाए। जो हो गया उसको मैं रोक नही सका परन्तु जिसको मैं रोक सकता हूं, मैं करूंगा। क्षमा सबसे बड़ा दान है। मैं तुम सबसे कहूंगा कि क्षमा करना सीखो। बदले की भावना में परिवार टूटता है। क्षमा से जुड़ा रहेगा।" कह कर बाबूजी दयाशंकर शांत हो गए।

दयावान दयाशंकर ने पायल को मांफ कर दिया। मांफी के बाद रमेश और रश्मि निश्चिन्त हो गए।

दुर्गादेवी की तबियत बहुत बिगड़ गई। डॉक्टर ने कहा कि चाहे तो वे उनको घर ले जा सकते है। उनका जीवन अधिक से अधिक दो या तीन दिन। दुर्गादेवी महेश के घर गई। सारा परिवार उनके इर्द-गिर्द रहा। कभी-कभी सांस जाती थी। शरीर नही हिलता था। रमेश दो दिन और दो रात अम्मा दुर्गादेवी के सिरहाने बैठ गीता और गरुण पुराण पड़ता रहा। तीसरे दिन अम्मा दुर्गादेवी के प्राण पखेडू उड़ गए। अंतिम संस्कार के बाद दयाशंकर रमेश के साथ रहने घर वापस गए।







जगमग

दिये जलें जगमग दूर करें अंधियारा अमावस की रात बने पूनम रात यह भव्य दिवस देता खुशियां अनेक सबको होता इंतजार ...