Wednesday, March 01, 2017

अहंकार


नाम राजहंस, उम्र चौंतीस वर्ष, पेशा सॉफ्टवेयर इंजीनियर, वेतन दो लाख रूपए महीना। बढ़िया जीवन शैली, घर समाज में इज्जत। सब कुछ मिल गया इस छोटी सी उम्र में।

नाम हर्षा कुमारी, उम्र उसकी भी चौंतीस वर्ष, पेशा सॉफ्टवेयर इंजीनियर, वेतन ढाई लाख रूपए महीना। बढ़िया जीवन शैली, घर समाज में इज्जत।

दोनों अपनी-अपनी कंपनी में इस छोटी उम्र में शीर्ष पद पर पहुंच गए। समय से पहले काम समाप्त करने का जनून दोनों में है। नही सुनने की आदत नही दोनों को और अहंकार से परिपक्व।

दोनों अविवाहित। परिवार का दबाव दोनों पर विवाह करने के लिए किन्तु कैरियर की खातिर दोनों चौंतीस तक विवाह के बंधन में नही बंधे। महत्वकांशा और अहंकार कूट-कूट कर दोनों के जिस्म और दिमाग में भरे हुए थे। अपने सामने किसी को कुछ नही समझना उनकी फितरत बन चुकी थी। यह तो स्वभाविक है जब बिन मांगे मोती मिल जाएं।

इसी स्वभाव के कारण रिश्तेदारी और कंपनी के सहपाठियों में विवाह की बात नही बनी। हम तो घर-ऑफिस तक सीमित होते है परंतु यह जो हमारी आदतें और हमारा स्वभाव होता है उनकी गति बहुत तीव्र होती है और दूर-दूर तक बिना टिकट पहुंच जाती हैं। राजहंस बंगलुरू में और हर्षा कुमारी हैदराबाद में कार्यरत हैं। एक वैवाहिक वेबसाइट के माध्यम दोनों का विवाह हो गया। चट मंगनी और पट विवाह। दोनों परिवार खुश कि आखिर दोनों को पसंद का जीवन साथी मिला। विवाह से पहले दोनों ने सिर्फ एक चीज देखी। वेतन और कंपनी में पोस्ट। दोनों विभाग प्रमुख थे, उनके ऊपर सिर्फ मुख्य कार्यकारी अधिकारी।

दोनों के परिवार दिल्ली में रहते थे, इसलिए विवाह दिल्ली में संपन्न हुआ। पंचतारा होटल में शानदार विवाह संपन्न हुआ। दोनों परिवारों ने दिल खोल कर अपने अरमान पूरे किये। सारे इंतेजाम परिवार वालों ने कर रखे थे। दोनों तो सिर्फ विवाह से तीन दिन पहले ही आये और विवाह के तुरंत बाद हनीमून के लिए श्रीनगर के लिए रवाना हो गए।
दो दिन श्रीनगर, पहलगाम और समीप की हसीन वादियों में राजहंस और हर्षा कुमारी डूब गए।

"राज वाकई धरती का स्वर्ग यहीं है।" रात के समय बिस्तर पर हर्षा ने कहा।
"बिलकुल सही है, जाने का मन ही नही कर रहा है।"
"जाना तो है। ड्यूटी भी तो करनी है।"
"हां बहुत काम बाकी पड़ा है।"
"फिर हैदराबाद कब शिफ्ट हो रहे हो?" हर्षा ने राज से पूछा।
"यही तो मैं तुमसे पूछना चाह रहा हूं कि बंगलुरू कब चल रही हो। घर बसाना है।" हर्षा के प्रश्न पर राज ने हर्षा से प्रश्न किया।
"राज तुम क्या कह रहे हो?"
"हर्षा अब विवाह हो गया है, बंगलुरू में अपना घर है, वहीँ रहेंगे। तुम बंगलुरू में नौकरी ढूंढ लो।"
"मैं क्यों बंगलुरू में रहूं?" तुम हैदराबाद में नौकरी ढूंढो।"
"विवाह के बाद पत्नी पति के घर रहती है।"
राजहंस की बात काटती हुई हर्षा ने कहा "तुम कौन से युग में जी रहे हो। मेरा वेतन ढाई लाख रुपये है और तुम्हारा सिर्फ दो लाख रुपये। तुम्हे मेरे साथ रहना होगा। तुम्हे मालूम है ना मैं विभाग प्रमुख हूं। मैं नौकरी नही छोड़ सकती। तुम्हे हैदराबाद रहना होगा।" हर्षा ने दो टूक कह दिया।
"तो मैं भी तो विभाग प्रमुख हूं। मैं क्यों नौकरी छोडूं? तुम्हे बंगलुरू में मनचाही नौकरी मिल जाएगी।" राज की आवाज तेज हो गई।
"आवाज तेज नही करो। मैं भी ऊंची आवाज कर सकती हूं। मुझे नही सुनने की आदत नही है। मैं हैदराबाद ही रहूंगी।"
"मुझे भी ऊंची आवाज पसंद नही है हर्षा। मैं बंगलुरू में रहूंगा।"
"तो रहो तुम बंगलुरू में। मैं तो हैदराबाद में रहूंगी।"
"फिर विवाह क्यों किया?"
"मेरी मति भ्रष्ट हो गई थी।" कह कर झट से हर्षा होटल के कमरे से बाहर आई और होटल प्रबंधक से दूसरा कमरा लिया। रात दोनों ने अगल कमरे में बिताई। होटल प्रबंधक हैरान हो गया कि हनीमून जोड़े को क्या हो गया? हुआ कुछ नही सिर्फ दोनों के अहंकार टकरा गए। मैं क्यों दूसरे की बात मानू जब घर और ऑफिस में एक साम्राज्य चलता है। गृहस्थी में तो मिलजुल कर चलना पड़ता है। अपना जीवन परिवार को पूरा समर्पित करना पड़ता है। सफल वैवाहिक जीवन की यही कुंजी है जिसके बारे में दोनों अंजान थे।  खैर दोनों को झुकने की आदत नही थी। अपनी मर्जी पर अब तक की ज़िंदगी जी थी।

अहंकार के टकराव के बीच अगले दिन दोनों हवाई मार्ग से दिल्ली वापस आये। दोनों अगल-अगल सीट पर बैठे और कोई बात नही की। एयरपोर्ट उतर कर दोनों अपने परिवार से मिलने घर नही गए। एयरपोर्ट से ही हर्षा कुमारी ने हैदराबाद की टिकट बुक कराई और राजहंस ने बंगलुरू के लिए और दिल्ली एयरपोर्ट से सीधे हैदराबाद और बंगलुरू के लिये रवाना हो गए।

थोड़े दिन बाद आपसी रजामंदी से तलाक संपन्न हो गया।



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