Tuesday, March 14, 2017

पुराना शौंक


सर्दियों के रविवार की सुबह गुनगुनी धूप में कुर्सी पर बैठे सोहन लाल समाचारपत्र पढ़ने लगे। तीन वर्ष का पौत्र सांवल उछालता हुआ दादा सोहन लाल के कंधों पर बैठ गया। दादू की चंपी करता हूं कह कर सांवल ने दादा सोहन लाल के बाल खींच लिए।
"बदमाश आधे बाल तो पहले ही गायब हो चुके हैं और बाकी के बचेखुचे तू उखाड़ देगा। नीचे उतर बदमाश तेरी तो पिटाई हो जाये।" सोहन लाल ने सांवल को कंधे से नीचे उतारा।
सांवल हंसता हुआ फर्राटे भर कर कमरे में चला गया। उसके जाने के बाद समाचारपत्र फिर से पढ़ने लगे। पढ़ने के बाद चश्मा और अखबार दोनों कुर्सी पर रख कर आंखें मूंद कर ग़ज़ल गुनगुनाने लगे।

हम भी दरिया हैं हमें अपना हुनर मालूम है।
जिस तरफ भी चल पड़ेंगे रास्ता हो जाएगा।।

सोहन लाल ग़ज़ल गुनगुना रहे थे उन्हें मालूम ही नही पड़ा की धर्मपत्नी सरला कब उनके समीप बैठ गई। सोहन लाल धीमे स्वर में गुनगुना रहे थे। उनके स्वर में रस है इसलिए सरला भी ग़ज़ल का आनंद ले रही थी। ग़ज़ल समाप्त हुई और सोहन लाल ने आंखें खोली। सरला को देख कर बोले।
"कब आई?"
"तुम्हारे गायकी को सुनने गई। आज तो बहुत मूड में हो। सुरीली आवाज में गुनगुना रहे हो। कुछ और सुनाओ।"
पत्नी की फरमाइश पर सोहन लाल ने कुछ और गीत और ग़ज़ल सुनाई। सोहन लाल की मधुर आवाज सुन कर बेटे और बहुएं भी कुर्सी खींच कर सोहन लाल के इर्दगिर्द बैठ गए। बहुओं ने सोहन लाल को गाते पहली बार सुना था। अब तक तो उन्होंने सोहन लाल को व्यापार में डूबे इंसान की तरह देखा था।

एक घंटे बाद सोहन लाल ने महफ़िल बर्खास्त यह कह कर की अब नाश्ते का समय हो रहा है कुछ पेट पूजा करवाओ। गाने की महफ़िल सजा दी। मुझे नहाना भी है।
नाश्ते के बाद सरला ने सोहन लाल को कुछ और सुनाने को कहा।
"सरला तुम्हे कोई काम नही है क्या?"
"छुट्टी का दिन है। दुकान जाना नही फिर कुछ आराम से पुराने शौंक पूरे किये जाये। चलो मैं तुम्हारा साथ देती हूं।"
"सरला अब क्या शौंक बुढ़ापे में पूरे करें। जिस समय ये शौंक पूरे करने थे तब तो कर नही सके।"
"तभी तो कह रही हूं। अब व्यापार का कोई बंधन नही। बच्चे अब व्यापार को सही संभाल रहे हैं। आपका बोझ बच्चों ने ले लिया है। अब कोई रोकने टोकने वाला नही। अपना शौंक पूरा करो।"
"अब नही होगा मुझसे। शरीर भी शिथिल होता जा रहा है। चौसठ वर्ष की उम्र है। पोते-पोतियों के साथ खेलते ज़िन्दगी बितानी है।"
"अपना शौंक पूरे नही हुए तो पोते पोतियों के शौंक पूरे करवाने में मदद करो।"
"हां यह तुमने सही सलाह दी सरला।"
"मैं तो हमेशा सही कहती रही हूं।"

दोपहर के खाने के बाद आराम करने के लिए बिस्तर पर लेटे। सरला को तो नींद गई परन्तु सोहन लाल अतीत के झरोखों में खो गए।

पांचवी कक्षा में सोहन लाल पढ़ते थे। स्कूल में संगीत के अध्यापक की नयी नियुक्ति हुई थी जो पांचवी से आठवीं कक्षा तक के विद्यार्थियों को संगीत सिखाते थे। सोहन लाल की रूचि संगीत में हो गई और स्कूल के वार्षिक समारोह में बेहतरीन प्रदर्शन पर पुरस्कार मिला। ख़ुशी-ख़ुशी पुरस्कार की ट्रॉफी लेकर सोहन लाल घर पहुंचे तब मां ने स्नेह से गले लगा लिया। घूम-घूम कर सोहन लाल ट्रॉफी सबको दिखा रहा था। परिवार में सभी खुश थे। अडोस पड़ोस में भी सोहन लाल सबको अपना पुरस्कार दिखा कर ख़ुशी से झूम रहा था।

सोहन लाल की यह खुशी सिर्फ शाम तक थी। रात को उसके पिता और ताऊ दुकान से वापस आये। सोहन लाल ने बहुत प्रसन्नता से ट्रॉफी दिखाईं। पिता और ताऊ को जब यह पता चला कि ट्रॉफी संगीत के लिए मिली है तब दोनों बुरी तरह छोटे से सोहन लाल पर बिगड़ पड़े और सारा गुस्सा सोहन लाल की मां और ताई पर उतार दिया।
"तुम औरतों के लाड प्यार में लड़का सर पर बैठ गया है। हम सारा दिन दुकान पर होते है और व्यापार को बढ़ाने में रात दिन एक कर रहे हैं और तुम औरतों ने इसको भांड बना दिया है। हम व्यापारी लोग हैं। हमारे खानदान का नाम है, इज़्ज़त है। बच्चों को पढ़ने भेजते हैं स्कूल में कि कुछ पढ़ लिख कर हमारे व्यापार में चार चांद लगाएगा और तुम इसे भांड बनाने में लगी हो। शादी विवाह में नाच गा कर पेट भरेगा। हमारे व्यापार की इज़्ज़त है मान मर्यादा है। सब सेठ जी कह कर बुलाते है। छाती चौड़ी हो जाती है सुन कर और तुम इसे भांड मिरासी बनाना चाहती हो। मिट्टी में मिला दी सारी मान मर्यादा तुम औरतों ने। गाना सुनने का इतना शौंक है बुलवा लेते हैं भांड को। खबरदार आज के बाद इसने या किसी और बच्चे ने गाने गाए। हमने भांड नही बनाना बच्चों को।"
घर की औरतों की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई। कोई चूं नही कर सका। अगले दिन स्कूल पहुंच कर संगीत मास्टर की क्लास ले ली और सख्त हिदायत दी कि सोहन लाल को संगीत नही सिखाना।

उस दिन के बाद सोहन लाल सहम गया। संगीत छूट गया। सरस्वती की कृपा सोहन लाल पर बनी रही। अच्छे नंबरों से स्कूल पास करके कॉलेज में दाखिला लिया। स्कूल की पाबंदियां कॉलेज में नही थी। खुले वातावरण में सोहन लाल एक बार फिर संगीत के करीब गया। कॉलेज प्रतियोगिता में सोहन लाल को फिर पुरस्कार मिला लेकिन सोहन लाल ने उसका जिक्र घर पर नही किया। अपनी अलमारी में छुपा कर रखा। घर से बाहर संगीत के कार्यक्रमों में भाग लेता। सोहन लाल चोरी छिपे संगीत के कार्यक्रमों में हिस्सा लेता और घर में किसी को भनक नही लगने देता। अपने संगीत साथियों को उसने घर कभी नही बुलाया इस कारण घर में किसी को भनक नही लगी कि सोहन लाल का संगीत से जुड़ाव है। संगीत से लगाव और उससे जुड़ने का अवसर विश्विद्यालय में बहुत मिला जिस कारण सोहन लाल ने स्नातक डिग्री के बाद दो विषयों ने उच्च स्नातक की पढाई संगीत के चक्कर में कर डाली।

आखिर पढ़ाई की भी सीमा ताऊ और पिता ने समाप्त कर दी। उसे अपने खानदानी  व्यापार से जुड़ना पड़ा। पूरी मार्किट में गर्व से पिता और ताऊ ने सोहन लाल का परिचय करवाया। उनको सोहन लाल की दो उच्च स्नातक डिग्री पर गर्व था क्योंकि मार्किट में कम पढ़े लिखे ही व्यापार कर रहे थे। जिनके बच्चे अधिक पढ़े, वे या तो विदेश चले गए या अपना नया व्यवसाय चुना। खानदानी व्यापार में सोहन लाल ही आया। सोहन लाल के लिए एक शानदार बढ़िया ऑफिस बनाया गया और शीघ्र सरला के साथ विवाह हो गया।
विवाह के बाद सोहन लाल ने अपनी संगीत के प्रति रूचि सरला को बताई और सख्त हिदायत भी दी कि इसका कोई जिक्र घर में करे। बंद कमरे में अक्सर सोहन लाल पत्नी सरला को गीत सुनाया करते।

संगीत के क्षेत्र में जाने की सोहन लाल की इच्छा थी परंतु उसमें संघर्ष था और पिता , ताऊ की नाराजगी। दूसरी ओर खानदानी व्यापार जिसमें केवल कदम रखना था। मजबूरन दूसरा रास्ता चुना और संगीत को अलविदा कह दिया। एक डर भी था यदि संगीत में भविष्य नही बना तब वह क्या करेगा? उसके परिवार की नजर में गायक, संगीतकार सभी भांड थे।

वक्त बीतता गया। ताऊ और पिता जी परलोक सिधार गए। सोहन लाल ने व्यापार में व्यस्त रहने के कारण अपने शौंक को बलि पर चढ़ा दिया। अब उसके बच्चे बड़े हो गए और व्यापार का उत्तरदायित्व संभाल लिया। खाली समय में अब सोहन लाल को पुरानी बातें याद आने लगी। संगीत की दबी रूचि फिर से जागृत हो गई और फुर्सत के समय गुनगुनाने लगते।

शाम के समय सरला ने पूरे परिवार को एकत्रित किया और अलमारी में छुपा कर रखी संगीत की उपाधियां बच्चों को दिखाई।

सोहन लाल ने बच्चों को संबोधित कर कहा "उस समय गाना बजाना अच्छा नही समझा जाता था परंतु अब लोगों का नजरिया बदल गया है। टीवी  चैनल पर संगीत की प्रतियोगिताएं होती है और सबको इज़्ज़त की नजर से देखा जाता है। मैंने खुद का शौंक छोड़ा और बच्चों को भी इस दिशा में नही जाने दिया। अब पोते पोतियों को नही रोकूंगा। उनके शौंक पूरे होने दूंगा।"

कह कर सोहन लाल गुनगुनाने लगे। सरला भी साथ देने लगी और बच्चे झूमने लगे।


Post a Comment

बोझ

सुबह काम पर जाने का बोझ है सारा दिन काम करने का बोझ है शाम को तेरी इंतजार का बोझ है रात को ग़मों का बोझ है ...